Sunday, 26 June, 2022
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UP में क्या कहती है गरीबों के राशन और राशनकार्डों की उच्च और मध्यम वर्गों द्वारा की गई यह लूट

इसी भ्रष्टाचार के चलते बड़ी संख्या में उच्च व मध्य वर्ग के लोगों ने गरीबों वाले राशनकार्ड बनवा रखे हैं, जिनकी बिना पर वे, जैसे गरीबों के लिए बताई जाने वाली दूसरी योजनाओं के वैसे ही, मुफ्त राशन योजना के लाभ भी लूटते रहे हैं.

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उत्तर प्रदेश में केन्द्र व प्रदेश सरकारों द्वारा कोरोनाकाल में गरीबों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई योजनाओं के लाभों की उच्च व मध्य वर्गों द्वारा ‘लूट’ के इन दिनों जैसे मामले सामने आ रहे हैं, वे मानवीय संवेदनासम्पन्न किसी भी व्यक्ति को विचलित करने वाले हैं. यह बताने वाले भी कि हमने अपने देश में कैसा असामाजिक समाज बना डाला है, जिसमें अपनी स्वार्थसाधना में मगन खाये-पिये अघाये लोग इतना भी नहीं सोच पाते कि उसकी कीमत कितने बदहालों को चुकानी पडती है!

बात को समझने के लिए कोई दो साल पीछे जाना होगा, जब देश पर कठिन कोरोनाकाल व्याप रहा था. तभी, मार्च, 2020 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के करीब अस्सी करोड़ राशनकार्डधारक गरीबों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना शुरू की थी, जो शुरू में जून, 2020 तक के लिए ही थी, लेकिन अब कई बार में आगामी सितम्बर तक बढ़ा दी गई है.

क्या सच में 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन मिल रहा है

शुरू में इस योजना को लेकर अच्छी-बुरी कई तरह की बातें कही गई थीं. प्रधानमंत्री ने जहां बारम्बार यह कहते हुए अपनी सरकार की पीठ ठोकी थी कि उसने भीषण राष्ट्रीय संकट की घड़ी में यह योजना संचालित करके एक भी गरीब को भूख से नहीं मरने दिया है, वहीं उनके विरोधी इसको उनकी विफलता का स्मारक बताया करते थे. उनका तर्क था कि इस योजना ने इससे ठीक पहले तक अर्थव्यवस्था की लम्बी छलांग का दावा करते आ रहे प्रधानमंत्री को कम से कम इस अर्थ में पूरी तरह निर्वसन कर दिया है कि उन्हें अस्सी करोड़ देशवासियों को पूरी तरह मोहताज मानकर उनके पेट की फिक्र करनी पड़ रही है.

कई आलोचक व्यंग्यपूर्वक यह भी पूछा करते थे कि देश में स्वर्ग उतार देने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री अचानक अस्सी करोड़ गरीब कहां से ‘ढूंढ’ लाये हैं? वे उन्हें इस बात के लिए भी आड़े हाथों लेते थे कि इस योजना के तहत उन्होंने राशनकार्डधारक गरीबों की ही फिक्र की और राशनकार्ड वंचितों को पूरी तरह उनके हाल पर छोड़ दिया. कई अन्य महानुभावों को इसको लेकर भी गम्भीर संदेह थे कि प्रधानमंत्री के दावे के अनुसार सचमुच अस्सी करोड़ गरीबों तक मुफ्त राशन पहुंच रहा है. वे इसलिए भी उनकी आलोचना किया करते थे कि उनकी सरकार इस योजना को सदाशयतापूर्वक नहीं बल्कि भाजपा के चुनावी लाभ से जोड़कर चला रही है.

तब प्रधानमंत्री के समर्थक उनके द्वारा अन्य कई योजनाओं के लाभों की पात्रों तक डिलीवरी की माकूल व्यवस्था की नजीरें देकर कहते थे कि गरीबों को मुफ्त राशन की आपूर्ति में संदेह की कतई कोई गुंजायश नहीं है. क्योंकि उसे प्रायः सारे देश में ऑनलाइन व भ्रष्टाचारमुक्त करके ‘आधार’ से जोड़ दिया गया है.

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योगी आदित्यनाथ सरकार की चेतावनी 

लेकिन पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार की इस चेतावनी ने उनके ढोल की सारी पोल खोल दी है कि प्रदेश में गरीब होने का ढोंग रचकर बनवाये राशनकार्डों की मार्फत जो अपात्र अमीर अनधिकृत रूप से मुफ्त राशन ले रहे हैं, उन्होंने 20 मई तक अपने राशनकार्ड सम्बन्धित अधिकारियों को सरेंडर नहीं किये तो उनसे न सिर्फ मुफ्त लिये गये राशन की रिकवरी की जायेगी, बल्कि उनके विरुद्ध एफआईआर भी दर्ज करा दी जायेगी.

हालांकि ये पंक्तियां लिखने तक विपक्षी दलों के दबाव में आकर योगी सरकार ने ऐसी कोई चेतावनी या आदेश जारी किये जाने से ही साफ इनकार कर दिया और जो कुछ हो रहा है, उसे राशनकार्डों के सत्यापन की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बता डाला है, लेकिन पिछले दिनों प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे राशनकार्ड सरेंडर करने वालों की भीड़ ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि राशन वितरण में कम सही, राशन कार्ड बनवाने की ऑनलाइन व्यवस्था में भीषण भ्रष्टाचार है.

इसी भ्रष्टाचार के चलते बड़ी संख्या में उच्च व मध्य वर्ग के लोगों ने गरीबों वाले राशनकार्ड बनवा रखे हैं, जिनकी बिना पर वे, जैसे गरीबों के लिए बताई जाने वाली दूसरी योजनाओं के वैसे ही, मुफ्त राशन योजना के लाभ भी लूटते रहे हैं.

प्रसंगवश, उत्तर प्रदेश में इस लूट का आकर्षण दो गुना है, क्योंकि प्रधानमंत्री के साथ प्रदेश सरकार ने भी एक मुफ्त राशन योजना संचालित कर रखी है. इसे लेकर कई लोग यहां तक कहते हैं कि दोनों सरकारें मिलकर गरीबों को राशन की ‘डबल डोज’ दे रही हैं. लेकिन गरीबों वाले राशनकार्ड सरेंडर करने वालों की भीड़ ने पोल खोल दी है कि डबल इंजन सरकारों की यह डबल डोज जितनी गरीबों के पेट की आग बुझाने में काम आई, उससे कहीं ज्यादा मध्य व उच्च वर्गों की लिप्सा के लिए इस्तेमाल हुई है.

गौरतलब है कि वरिष्ठ लेखक पवनकुमार वर्मा ने उसकी इस लिप्सा को लेकर ‘भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्तान’ नामक पुस्तक लिखी है. वे कहते हैं कि यह वर्ग किसी भी नैतिकता या नियम को अपनी अनैतिक लूटों की छूटों के रास्ते की बाधा नहीं बनने देता. गरीबों के राशन कार्डों की ताजा लूट में शामिल होकर भी उसने यही सिद्ध किया है.

विडम्बना यह कि मोदी व योगी सरकारों ने कोरोनाकाल में गरीबों को मुफ्त राशन का ढोल तो खूब पीटा, मगर इस लूट की ओर से आंखें मूंदे रखीं. इसीलिए अब पोल खुली है तो उनसे अपने बचाव में कुछ कहते नहीं बन रहा.

हां जानना जरूरी है कि प्रदेश में 2014 से ही आयकरदाता, वे ग्रामीण हों या शहरी, न गरीबों के राशन कार्ड बनवाने के लिए अर्ह हैं, न ही मुफ्त राशन के पात्र. इसी तरह ऐसे शहरी परिवार, जिनके पास कार आदि चार पहिया वाहन, एयरकंडिशनर, 5 केवीए या उससे अधिक क्षमता का जेनरेटर, 100 वर्गमीटर से अधिक का स्वअर्जित आवासीय प्लाट, उस पर स्वनिर्मित मकान अथवा 100 वर्गमीटर से अधिक का आवासीय फ्लैट, 80 वर्गमीटर से अधिक का व्यावसायिक स्थान या एक से ज्यादा शस्त्र लाइसेंस हो और जिनके समस्त सदस्यों की वार्षिक आय तीन लाख रुपये से अधिक हो, नियमों के मुताबिक गरीबों के राशनकार्ड नहीं बनवा सकते.


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उच्च व मध्य वर्गों द्वारा लूटा गया राशन

इसी तरह गांवों में चार पहिया वाहन, एयरकंडिशनर, पांच केवीए या उससे अधिक क्षमता के जेनरेटर, पांच एकड़ से अधिक सिंचित भूमि, एक से ज्यादा शस़्त्र लाइसेंस और दो लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले परिवार भी गरीबों वाले राशनकार्ड के अधिकारी नहीं माने जाते.

लेकिन पिछले दिनों सप्लाई आफिसों में राशनकार्ड सरेंडर करते महानुभावों की बातें सुनकर उसे इस सरकारी दावे से जोड़ दिया जाये कि कई जिलों में लक्ष्य से ज्यादा राशन कार्ड बनाये जाने के बाद भी सारे गरीबों के राशनकार्ड नहीं बन सके हैं, तो समझना कठिन नहीं रह जाता कि गरीबों के राशनकार्ड वही अमीर ले उड़े थे.

अयोध्या में तो ऐसे एक साहब कहते मिले कि उन्हें दहेज में एयर कंडिशनर मिल गया है, इसलिए अमीर हो गये हैं और राशन कार्ड सरेंडर करने आये हैं.

प्रयागराज जिले में, दूसरे नगरों, कस्बों व तहसीलों के अलावा, जिला मुख्यालय पर हर रोज चार सौ से ज्यादा लोगों ने अपने राशनकार्ड सरेंडर किये. उसके लूकरगंज में एक युवक ने यह पूछे जाने पर कि जब उसके कार भी है और महंगा फोन भी तो वह गरीबी की रेखा के नीचे वाला राशनकार्ड बनवाकर मुफ्त राशन क्यों ले रहा था, कहा कि कार उसके पापा की है और मोबाइल मम्मी के नाम पर खरीदा है, उसके पास अपना कुछ नही है, लेकिन अब उसे राशन कार्ड की आवश्यकता नहीं है.

साफ है कि उसे एफआईआर और रिकवरी के डर सता रहे थे. न सताते तो उसका यह कुतर्क आगे भी काम करता रहता. एक अन्य नौकरीपेशा सज्जन का तर्क तो और भी अजबोगरीब था: क्या करते, कोरोना के दौरान मेरा परिवार बहुत गरीब हो गया था! एक व्यवसायी तो दावा कर रहा था कि उसे पता ही नहीं था कि वह अपने राशनकार्ड पर जो मुफ्त राशन ले रहा है, वह गरीबों के लिए है.

फिलहाल, अयोध्या या प्रयागराज जिले तो बटलोई के चावल यानी मिसाल भर हैं. अमीरों द्वारा गरीबों के मुफ्त राशन और राशनकार्डों की लूट के मामलों में प्रदेश के दूसरे जिलों का हाल भी कुछ अलग नहीं है. तिस पर सरकार इसे लेकर इतनी देर से जागी है कि उसका कोई हासिल नहीं है.

(कृष्ण प्रताप सिंह फैज़ाबाद स्थित जनमोर्चा अखबार के स्थानीय संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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