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Friday, 3 April, 2026
होममत-विमतअमेरिका बाज की तरह बातें करता है, लेकिन गोली चलने पर मुर्गी की तरह डर जाता है—इतिहास यही दिखाता है

अमेरिका बाज की तरह बातें करता है, लेकिन गोली चलने पर मुर्गी की तरह डर जाता है—इतिहास यही दिखाता है

अमेरिकियों को सिर्फ ऐसे युद्ध पसंद हैं जो वीडियो गेम की तरह लड़े जाएं, जहां वे दुश्मन के हज़ारों सैनिकों और आम लोगों को मार दें, लेकिन जहां कोई अमेरिकी न मरे.

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मुझे नहीं लगता कि किसी को डैन क्वेले याद होंगे, जो जॉर्ज बुश के राष्ट्रपति काल के दौरान अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे और ठीक से पढ़े-लिखे भी नहीं माने जाते थे, लेकिन ईरान में अमेरिका की गलत कार्रवाई आगे बढ़ने के साथ मैं उनके बारे में बहुत सोच रहा हूं.

कई अमेरिकी कंज़र्वेटिव नेताओं (जैसे डॉनल्ड ट्रंप) की तरह क्वेले भी एक अमीर और प्रभावशाली परिवार से थे. वे हिम्मत, ताकत, शक्ति और युद्ध की भाषा बोलते थे. उनके समर्थकों को यह बहुत पसंद आता था, जब तक यह सामने नहीं आया कि बहादुर उपराष्ट्रपति ने सेना में भर्ती से बचने का रास्ता निकाल लिया था और वियतनाम युद्ध में लड़ने से पीछे हट गए थे (ट्रंप की तरह).

क्वेले ने इंडियाना नेशनल गार्ड में सुरक्षित पद ले लिया था और उन्होंने कभी अपनी जान जोखिम में नहीं डाली और न ही लड़ने के लिए अपने देश से बाहर गए. ट्रंप ने भी सेना में भर्ती से बचा लिया था, लेकिन उन्होंने कहा था कि उन्हें ‘हड्डियों में समस्या (bone spurs)’ है.

क्वेले पर कायर होने का आरोप लगा और उस समय एक आम मज़ाक था: “अगर आप एक बाज और एक मुर्गी को मिलाएं तो क्या मिलेगा?” जवाब: “क्वेले मिलेगा.”

मुझे नहीं लगता कि ट्रंप क्वेले हैं या यहां तक कि बटेर (quail) भी; वे उससे कहीं ज्यादा खतरनाक और अप्रत्याशित हैं. तुलना किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि खुद अमेरिका से है. क्वेले की तरह अमेरिका भी ताकत और बहादुरी की भाषा बोलता है, लेकिन जब गोलियों का सामना करने की बात आती है, तो वह खुद के लिए किसी भी खतरे से बचता है. ताकत के साथ हिम्मत नहीं दिखती.

बाज से मुर्गी तक

अमेरिका से इतनी दूर रहकर हम कभी-कभी यह समझ नहीं पाते कि अमेरिका कितना सुरक्षित है. चाहे कोई भी युद्ध हो, अमेरिका की मुख्य ज़मीन कभी खतरे में नहीं होती. उसकी सीमाओं पर कभी दुश्मन की सेना जमा नहीं होती. उस पर कभी बमबारी नहीं होती. उस पर हमला संभव नहीं है. यह सब उसकी भौगोलिक स्थिति के फायदे हैं. (पर्ल हार्बर हमले से भ्रमित न हों. पर्ल हार्बर हवाई में है, जो अमेरिका की मुख्य ज़मीन से लगभग 2,500 मील दूर है.)

इसलिए अमेरिका बिना किसी डर और अपनी आम जनता के लिए बिना खतरे के युद्ध कर सकता है. यही कारण है कि वह दूर-दराज के युद्धों (वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक) में शामिल रहा है, जहां अमेरिकी बमवर्षकों ने पूरे शहर तबाह कर दिए, यह जानते हुए कि दुश्मन उसके शहरों के साथ ऐसा नहीं कर सकता.

इस तरीके में सिर्फ एक बड़ा खतरा है. किसी भी युद्ध में सैनिकों की मौत होती है और अमेरिकियों को युद्ध में मरना पसंद नहीं है. वियतनाम युद्ध में कई सालों में लगभग 60,000 अमेरिकी सैनिक मारे गए और इस युद्ध ने अमेरिकी समाज को हमेशा के लिए बदल दिया, सामाजिक बदलाव शुरू हुए और सेना में अनिवार्य भर्ती खत्म कर दी गई.

इसलिए अमेरिकियों को सिर्फ ऐसे युद्ध पसंद हैं जो वीडियो गेम की तरह लड़े जाएं, जहां वे दुश्मन के हज़ारों सैनिकों और आम लोगों को मार दें, लेकिन जहां कोई अमेरिकी न मरे.

यह फिर वही डैन क्वेले वाली कहानी है. अमेरिकी बाज की तरह होते हैं. जब तक उनकी अपनी सुरक्षा खतरे में न हो. जैसे ही उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ती है, वे मुर्गी बन जाते हैं.

अमेरिकी नेता यह समझते हैं. इसलिए कई कंज़र्वेटिव उम्मीदवार यह कहकर चुनाव जीतते हैं कि वे दूर देशों के युद्धों में अमेरिकी सैनिक नहीं भेजेंगे. वे हमेशा वादा करते रहे हैं कि सैनिकों के शव ताबूत में भरकर वापस नहीं आएंगे.

यह ट्रंप के राष्ट्रपति चुनाव अभियान का भी एक अहम मुद्दा था. अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी बार-बार यही बात दोहराई.

तो फिर राष्ट्रपति ट्रंप, जिन्होंने न सिर्फ अलग-थलग रहने का वादा किया था बल्कि यह भी कहा था कि “मैंने जितने युद्ध रोके हैं उतने किसी ने नहीं रोके” और इसी वजह से नोबेल शांति पुरस्कार की मांग भी की थी, अचानक अपने देश को ऐसे युद्ध में क्यों ले गए जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है और जो अमेरिका में लोकप्रिय भी नहीं है? (सिर्फ 28 प्रतिशत अमेरिकी इस युद्ध का समर्थन करते हैं; 59 प्रतिशत इसके खिलाफ हैं.)

इसके कई कारण हैं. बल्कि ज़रूरत से ज्यादा कारण हैं क्योंकि अमेरिकी अधिकारी हर हफ्ते कम से कम पांच नए कारण बताते हैं. इनमें से कोई भी बहुत भरोसेमंद नहीं लगता, इसलिए यह मानने से बचना मुश्किल है कि यह “वैग द डॉग” जैसी स्थिति है—1990 के दशक की फिल्म के नाम पर, जिसमें मुश्किल में फंसा अमेरिकी राष्ट्रपति एक सेक्स स्कैंडल से ध्यान हटाने के लिए बेवजह सैन्य कार्रवाई का आदेश देता है.

मेरा मानना है कि ट्रंप के सलाहकारों ने उनसे कहा होगा कि एपस्टीन फाइल्स से ध्यान हटाने का सबसे अच्छा तरीका इज़रायल के साथ मिलकर ईरान पर बमबारी करना है. यह कुछ ही दिनों में खत्म हो जाता और वे खुद को बड़ी जीत हासिल करने वाला नेता दिखा सकते थे.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ, कम से कम आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि ईरान ने समझ लिया कि वह अमेरिकी मुख्य ज़मीन पर जवाबी हमला नहीं कर सकता, इसलिए उसने अपने सबसे मजबूत हथियार का इस्तेमाल किया—तेल और उसे ले जाने वाले रास्तों पर नियंत्रण—ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जा सके. इसका असर हम बाकी लोगों पर पहले पड़ेगा, आम अमेरिकियों पर थोड़ा देर से पड़ेगा, लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़ रही हैं, ट्रंप अब चिंता करने लगे हैं.

ईरान को इतना भरोसा क्यों है कि वह अमेरिका के हमले का सामना कर सकता है? क्योंकि उसे पता है कि अमेरिका एक हाथ पीछे बांधकर लड़ रहा है. अगर आप अपनी ही जनता की राय से इतना डरते हैं कि ज़मीन पर सैनिक नहीं भेजते, तो किसी मजबूत दुश्मन के खिलाफ युद्ध जीतना मुश्किल होता है. यह सोच कि ईरान जल्दी हार मान लेगा, गलत साबित हुई है. अब ट्रंप को दिखाना होगा कि वे सिर्फ बाज की तरह बातें ही नहीं करते, बल्कि मुर्गी की तरह पीछे भी नहीं हटते. (ट्रंप के आलोचक लंबे समय से उनके व्यवहार के लिए TACO शब्द इस्तेमाल करते हैं: Trump Always Chickens Out.)

ट्रंप के तीन तुरुप के पत्ते

यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि ट्रंप जैसे बदलते स्वभाव वाले व्यक्ति अब क्या करेंगे; वे अक्सर खुद ही अपनी बात का विरोध कर देते हैं, कई बार एक ही वाक्य में, लेकिन उनके पास मोटे तौर पर तीन विकल्प हैं.

पहला, कई स्तरों पर चल रही शांति वार्ता से कुछ नतीजा निकल आए और वे सम्मान के साथ इस संघर्ष से बाहर निकल जाएं.

दूसरा, वे वैसे ही बाहर निकल जाएं और जीत का दावा कर दें.

तीसरा, वे आखिरकार कम से कम कमांडो मिशन के लिए ज़मीन पर सैनिक भेजें और उम्मीद करें कि ज्यादा नुकसान न हो.

ट्रंप और उनके सहयोगियों ने संकेत दिया है कि तीनों विकल्प खुले हैं, लेकिन यह साफ है कि वह पूरी जीत, जिसका उन्होंने कभी वादा किया था—ईरान को आयतुल्लाह और उनके समर्थकों के शासन से मुक्त करना—अब संभव नहीं लगता.

इन तीन विकल्पों में से भारत के लिए वही बेहतर है जिससे युद्ध खत्म हो जाए. सिर्फ इसलिए कि अमेरिकियों का ध्यान जेफ्री एपस्टीन के द्वीप पर जो भी हुआ उससे हट जाए, भारत या दुनिया के बाकी हिस्सों को नुकसान नहीं उठाना चाहिए.

जहां तक हमारी बात है, हम तभी चैन से बैठ सकते हैं जब अमेरिकी “मुर्गियां” वापस अपने घर लौट जाएं.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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