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मुंबई में अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना । गेट्टी
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ट्विंकल खन्ना और अक्षय कुमार  जिस तरह से अपनी राजनैतिक ब्रांडिंग का लाभ  उठाते हैं , उसके मद्देनज़र  उन्हें बॉलीवुड के किम कार्दशियन और कान्ये वेस्ट कहना गलत नहीं होगा. 

ट्विंकल खन्ना और अक्षय कुमार की शादी बॉलीवुड में राजनैतिक रूप से सबसे दिलचस्प है. उनकी वाम – दक्षिण शादी बहुत कुछ राजनैतिक रूप से विभक्त भारत की तरह है. लेकिन भारत या ट्विटर के विपरीत, ऐसा प्रतीत होता है जैसे ट्विंकल और अक्षय ने यह गुत्थी  सुलझा ली हो.

ट्विंकल ग़ज़ब की हैं. उनका सेन्स ऑफ ह्यूमर.  वे उन सारे मुद्दों पर बोलती हैं जो उन्हें प्रभावित करते हैं,  वे पूर्णतया लिबरल हैं और बॉलीवुड में  स्वयं के असफल प्रयासों को लेकर थोड़ा आश्चर्यचकित भी.

अक्षय भारत के हिंदी सुपरस्टार हैं.  उनके पास हिट फिल्मों की एक सूची  तो है ही , वे वर्तमान में मुख्यधारा के सिनेमा में सबसे अधिक भरोसे के योग्य  अभिनेता हैं  और शौचालयों से लेकर मासिक धर्म के  पैड और  सनसनीखेज मर्डर ट्रायल , सब कुछ बेचने में  शामिल हैं.  उन्होंने सफलतापूर्वक किस्सागोई की एक ऐसी कला विकसित की है जिसके माध्यम से वह फासीवादी राष्ट्रवाद को भी स्वीकार्य बना देते हैं. उन्होंने दरअसल मनोज कुमार द्वारा खाली किये गए शून्य को भरने में सफलता पायी है.

किसी भी और दुनिया में ये दोनों एक दुसरे के धुर प्रतिद्वंदी होते. दरअसल, वे स्पेक्ट्रम के   विभिन्न बिंदुओं पर इस तरह  स्थित हैं कि उनकी तुलना भी बेमानी हो जाती है. जैसा कि ट्विंकल ने हाल के एक  साक्षात्कार में कहा था,  वे दोनों ऐसे हैं जैसे एनडीटीवी और रिपब्लिक टीवी एक ही कमरे में एक साथ फुल वॉल्यूम पर चल रहा हो. इसके बावजूद वे विवाहित हैं. और वे इसमें सफल भी हो रहे हैं.


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उनके व्यक्तिगत  विचारधारात्मक दृष्टिकोणों तक पहुँचने की  उनकी यात्रा लगभग एक-दूसरे के जैसी ही  है. अक्षय का राष्ट्रवाद 2007 के आरंभ में नमस्ते लंदन के साथ शुरू हुआ और हॉलिडे: ए सोल्जर इज़ नेवर ऑफ ड्यूटी  के साथ 2014 में और परवान चढ़ा  जबकि ट्विंकल की पहली पुस्तक मिसेज़ फन्नीबोन्स  ने उन्हें 2015 में पॉप-लिट प्रसिद्धि के शीर्ष तक पहुंचा दिया. अक्षय ने ऐसे नायकों की बाढ़ ला दी जिनका हम बेझिझक समर्थन कर सकें. उन्होंने यह ऐसे समय में किया जब भारतीय सिनेमा ‘ग्रे’ चरित्रों के माध्यम से एक नए विमर्श को शुरू करना चाह रहा था. वहीँ ट्विंकल ने अपने पाठकों को बुद्धिमान और  तेज़  तर्रार सामग्री पेश की जो अनावश्यक कचरे को हटाकर असली महिलाओं को चरित्रों के तौर पर प्रस्तुत करता है. वे दोनों अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं लेकिन उनकी मार्केटिंग ज़रूर ज़बरदस्त है.

इन दोनों ने भारत के सेलेब्रिटी ‘स्टेटस क्वो’ से अलग अपनी एक  पहचान बनायी है. अराजनैतिक या फिर लोकलुभावन राजनीति न करके उन दोनों ने अपने रूख़ का ज़ोरदार और खुले ढंग से समर्थन किया है.

जहाँ ट्विंकल आज़ादी और उसके खो जाने की बात करती हैं, अक्षय एबीवीपी  के झंडे के साथ हौसलाअफ़ज़ाई करते नज़र आते हैं. उन दोनों को अपना दर्शक वर्ग भली भाँती पता है और वे खुलकर उसका मनोरंजन करते हैं. हालाँकि उन दोनों को ही यह पता है कि  वे किसके समर्थन में खड़े हैं और किसका प्रतिनिधित्व करते हैं.  एक सेलिब्रिटी जोड़ी जो शायद अक्षय और ट्विंकल की ही तरह  राजनीतिक है, वह है  किम कार्दशियन और कान्ये वेस्ट की जोड़ी.  उन  दोनों ने ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ बातचीत की लेकिन अविश्वसनीय रूप से अलग-अलग तरीके से.


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ट्विंकल और अक्षय की ही तरह, किम कार्दशियन  और वेस्ट दोनों ही अपने  विश्वासों से मज़बूती से जुड़े रहने के लिए  लिए अपने पर्याप्त संसाधनों और साख का भरपूर इस्तेमाल करते हैं.  उनके जैसे ही, वे अपने विचारों का पूर्ण प्रतिबद्धता से पालन करते हैं. वे खुद से  ‘अपेक्षित’ चीज़ों के दबाव में नहीं आते. बेशक  वे राजनीतिक सुलह की संभावना वाली आम धारणा को खारिज करते हैं. ऐसी दुनिया में जो तेज़ी से ध्रुवीकरण की ओर  बढ़ रही है और जहाँ  सह-अस्तित्व की गुंजाइश कम  है,  वैसे में वे सबूत हैं कि कुछ लोगों में यह  काबिलियत है.

संभव है यह आपके लिए न हो, कम  से कम  मेरे लिए तो नहीं ही है. लेकिन वे अपने खुद के बाज़ारों में बड़े पैमाने पर घुसपैठ करते हैं, अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं को बढ़ावा देते हैं  और इस सब के बावजूद के टीम की तरह काम करने में सफल हैं. यह कई स्तरों पर सराहनीय है, और मुझे दूसरों पर थोड़ा सोचने को मजबूर करता है. ऐसे समय में जब हर कोई विचारधारा को सम्मान और पहचान के तमगे के रूप में देखता है ,क्या मैं व्यक्तिगत तौर पर उन जैसा बन सकती हूँ? क्या मैं राजनीति और उससे सम्बंधित अन्य चीज़ों को अपने घर से बाहर रख सकती हूँ?


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मुझे नहीं पता. मुझे उम्मीद है कि ट्विंकल किसी दिन इसके लिए एक मैनुअल लिखेंगी. मैं एक प्रति खरीदूंगी  (चाहे मैं उनकी हर बात से असहमत ही क्यों न होऊं ).

लेखिका एक कवयित्री हैं.

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