निक्की भाटी को पीटा गया, आग के हवाले कर अपने ही घर में ज़िंदा जलने के लिए छोड़ दिया गया. जगह थी ग्रेटर नोएडा का सिरसा गांव. शुरुआत में इसे दहेज हत्या का एक और मामला बताया गया, लेकिन जल्द ही कहानी बदलने लगी. क्या ये सच में दहेज की मांग थी? या फिर वजह ये थी कि निक्की और उनकी बहन अपना ब्यूटी पार्लर दोबारा खोलना चाहती थीं, जिसका विरोध पति विपिन कर रहा था? या फिर गुस्सा उसकी इंस्टाग्राम रील्स पर था? वजहें बदलती रहीं, लेकिन हिंसा का सच साफ था.
दिप्रिंट की एक ग्राउंड रिपोर्ट ने बताया कि धीरे-धीरे निक्की की रील्स ही उनकी हत्या की वजह बन गईं. ये सुनने में चौंकाने वाला लग सकता है कि इतनी मामूली बात पर किसी महिला की जान ले ली जाए, लेकिन क्या वाकई ये चौंकाने वाला है? हमारे समाज में औरतें सज़ा पाती हैं जैसे ही वे अपने लिए खींची गई लकीरों से बाहर कदम रखती हैं: अपने ही परिवार के हाथों ‘इज़्ज़त’ के नाम पर मार दी जाती हैं, जींस पहनने पर पीट-पीटकर मार दी जाती हैं, ऑनलाइन वीडियो डालने पर मौत के घाट उतार दी जाती हैं.
कभी ये सज़ा तेज़ और बेरहम होती है. तो कभी लगातार अपमान, तानों और भीड़ के फैसलों के रूप में आती है, जो औरत को आखिरकार खुद अपनी जान लेने पर मजबूर कर देती है.
कड़वी सच्चाई ये है कि ऐसे मामले दुर्लभ नहीं हैं. हां, ये खबरें बनती हैं, गुस्सा भड़कता है, बहस छिड़ती है, लेकिन किसी भी अखबार को उठाकर देख लीजिए, लगभग रोज़ आपको महिलाओं के खिलाफ हिंसा की खबर मिलेगी. ज्यादातर तो हमें अब झकझोरती भी नहीं क्योंकि इतना सामान्य हो चुकी है ये हिंसाएं. हां, हर कुछ महीनों में निक्की जैसे मामले आते हैं, जो राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते हैं और हमें झकझोरते हैं.
लेकिन ये गुस्सा भी तूफान की तरह आता है और चला जाता है. लोग अपनी-अपनी कहानियां चुन लेते हैं—कुछ इसे पितृसत्ता से जोड़ते हैं, तो कुछ कहते हैं कि ये कुछ ‘बुरे लोगों’ की वजह से है, सिस्टम औरतों के खिलाफ नहीं है. प्रशासन तुरंत हरकत में आता है, गिरफ्तारी होती है, बयान जारी होते हैं क्योंकि जनता का गुस्सा ऐसा चाहता है और फिर, उतनी ही जल्दी ये आग बुझ जाती है. एक नई हेडलाइन आती है और हम अगले मामले तक सब भूल जाते हैं—जब तक कोई और मौत हमें उसी पुराने सदमे के चक्र में वापस न खींच लाए.
आक्रोश के पीछे छिपा सच
यह नहीं है कि औरतों को उनकी पसंद की सज़ा देना कोई नया चलन है, या फिर यह कि हम दशकों से पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. फिर भी, 2025 में भी हम इस जकड़ से पूरी तरह आज़ाद नहीं हो पाए. हर आक्रोश के पीछे सवाल यही जलता रहता है—हमारे घरों और सड़कों पर इतना कम बदलाव क्यों आया है? समाज अब तक औरतों को असली स्वायत्तता क्यों नहीं देता? उनकी मौतों को रोज़मर्रा की बात मानकर क्यों स्वीकार कर लेता है?
औरतों की सुरक्षा के लिए हमारे पास कानून तो हैं, लेकिन साफ है कि ये काफी नहीं हैं, समाज के भीतर कुछ और गहरी चीज़ों को बदलने की ज़रूरत है. क्यों बचपन से लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि पूरे परिवार की “इज़्ज़त” उनके कंधों पर टिकी है? क्यों माता-पिता अपनी बेटियों को सशक्त बनाने के बजाय उनकी शादी के लिए लाखों रुपये खर्च करना ही सबसे बड़ा फर्ज़ मानते हैं, ताकि कोई ऐसा पुरुष मिल जाए जो उनका “खयाल रखे”? और क्यों वही माता-पिता अपनी बेटी को मार डालते हैं अगर उन्हें लगता है कि उसकी पसंद ने उन्हें “शर्मसार” कर दिया?
निक्की के मामले में भी रिपोर्ट्स बताती हैं कि परिवार इसे दहेज हत्या के रूप में पेश कर रहा है. शायद यह मान लेना कि उसकी रील्स—सिर्फ खुद को अभिव्यक्त करने का एक साधारण तरीका—उनकी मौत की वजह बनीं, एक ऐसी सच्चाई से सामना करना होगा जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सकते. ऐसे माहौल में “इज़्ज़त” का मतलब गरिमा से नहीं, बल्कि नियंत्रण से होता है, यहां तक कि औरत की मौत के बाद उसकी यादों तक पर भी.
आखिरकार, सब कुछ आकर टिकता है समाज की स्वीकृति पर, जहां सबसे बड़ा अपराध नियमों को तोड़ना है, वहां औरत की आज़ादी के लिए जगह कैसे बन पाएगी? यही अनुपस्थिति असली समस्या है, जो इस पूरी त्रासदी की जड़ में है.
इज़्ज़त, नियंत्रण और मिटा देना
औरतों की पसंद समाज के उस झूठ को बेनकाब कर देती है जिस पर यह टिका है—“इज़्ज़त” असल में नैतिकता या गरिमा नहीं, बल्कि पितृसत्ता का नियंत्रण है. जब कोई औरत खुद तय करती है कि किससे शादी करनी है, क्या पहनना है, शादी छोड़नी है या नहीं तो वह अपनी ज़िंदगी पर अपना हक जताती है. परिवार और बिरादरी इसे बगावत मानते हैं—एक ऐसा अपमान जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाते. उनकी नज़रों में औरत की मौत उस शर्म से बेहतर है जो उसे अपनी शर्तों पर जीने की इजाज़त देने से आती है. एक चुप कर दी गई बेटी, अपनी मर्ज़ी से जीने वाली बेटी से कहीं ज़्यादा “इज़्ज़त” बचा लेती है.
यही वजह है कि यह चक्र अब भी चलता जा रहा है. कानून सज़ा दे सकते हैं, गुस्सा भड़क सकता है, लेकिन गहरी समस्या जस की तस रहती है—एक ऐसा समाज जहां औरतों की स्वायत्तता अब भी सामान्य नहीं है. सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ पढ़ाई, नौकरी या कागज़ पर लिखी स्वतंत्रता नहीं है; इसका असली मतलब है—बिना डर के अपनी पसंद चुनने की आज़ादी. जब तक यह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं बनेगा, हर कानून अधूरा ही रहेगा.
सोचिए, अगर ऐसा समाज हो जो सचमुच औरतों की स्वायत्तता का सम्मान करे, जहां अपनी शर्तों पर जीना बगावत न समझा जाए. तब कितनी ज़िंदगियां बदल जाएंगी. वे औरतें, जिनके बारे में हम आज सिर्फ ‘पीड़िता’ बनकर पढ़ते हैं, ज़िंदा और आज़ाद होतीं. वे अपनी पसंद पर जलाई नहीं जातीं, “इज़्ज़त” के नाम पर मारी नहीं जातीं. ज़ुल्म छोड़कर निकल जातीं, अपने सपने पूरे करतीं और ऐसी ज़िंदगी बनातीं जो किसी मजबूरी से परिभाषित न होती. तब कोई बेटी बोझ न कहलाती.
जब तक औरतों के पास असली स्वायत्तता नहीं होगी, यह त्रासदी खत्म नहीं होगी, बस नाम बदलते रहेंगे, आज निक्की, कल कोई और.
(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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