scorecardresearch
Thursday, 18 July, 2024
होममत-विमतफर्ज़ी मेलोड्रामा और फालतू समाचार बहसों से तंग आ गए? शुक्र मनाइए कि आपके पास दूरदर्शन मौजूद है

फर्ज़ी मेलोड्रामा और फालतू समाचार बहसों से तंग आ गए? शुक्र मनाइए कि आपके पास दूरदर्शन मौजूद है

हम सास-बहू, पुरुषों और आलीशान हवेलियों और डेली सोप ओपेरा के रोना-धोना से थक गए हैं, जो सच में तब से आगे नहीं बढ़े हैं जब स्मृति ईरानी ने तुलसी की भूमिका निभाई थी. डीडी नेशनल पर ‘छोटकी-छटंकी, जहां चांद है और जानकी’ को देखिए.

Text Size:

दूरदर्शन नेशनल (डीडी) में कुछ बेहद आरामदायक बात है और उसका एक कारण यह है कि जितना ज्यादा वो खुद को बदलने की कोशिश करता है, उतना ही वो वैसा ही बना रहता है.

इसलिए, भले ही ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा…’ की आत्मा को झकझोर देने वाली देशभक्ति की जगह ‘हर घर तिरंगा…’ या ‘भारत मां…’ ने ले ली है, लेकिन यह अभी भी ‘देश का पहला चैनल’ है, जो ‘देश का अपना चैनल’ बनने के लिए अभी भी यह सब कर रहा है.

कम से कम डीडी नेशनल तो यही दावा करता है. ठीक है, यह पूरी तरह से अखिल भारतीय चैनल नहीं बन पाया है, लेकिन यह कोशिश करता है: आपको ‘7 सिस्टर्स’ को समर्पित शो और कहां मिलेगा — जिसे पूर्वोत्तर राज्यों के रूप में जाना जाता है? हमारे किसी भी राष्ट्रीय समाचार टेलीविजन चैनल पर नहीं, निजी डीटीएच-केबल चैनल पर नहीं, न ही स्ट्रीमिंग ओटीटी चैनल पर.

लेकिन त्रिपुरा, मिजोरम, असम, नागालैंड – और निश्चित रूप से मणिपुर, जहां जातीय हिंसा ने राज्य की नींव को हिलाकर रख दिया है, के बारे में जानने से अधिक बेहतरीन क्या हो सकता है?

डीडी नेशनल के इसी नाम के नए शो में ‘छोटकी छटंकी’ द्वारा मांग की गई महिलाओं को “दुनिया से लड़ने की शक्ति” देने का अथक प्रयास आपको और कहां मिलेगा?

नया: दूरदर्शन नेशनल ने 15 अगस्त को कुछ नई और कुछ पुरानी चीज़ों के साथ खुद को नया रंग दिया है. हमारे सर्वकालिक पसंदीदा ‘चित्रहार’ (दिन में दो बार) — जो 1982 में शुरू हुआ था जिसमें हिंदी फिल्मों के गाने शामिल थे — ‘जानकी’ के साथ-साथ, एक समृद्ध परिवार के बारे में एक सीरीज़ जो अपने पहले बच्चे के तौर पर एक लड़का चाहता है और इसे पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

और क्या आपको पता है? यह ठीक है, यह मज़ेदार है. यह तब तक काम करता है, जब तक दर्शक साथ खेलने को इच्छुक हैं.


यह भी पढ़ें: BJP की महिला नेता मणिपुर, नूंह हिंसा से ज्यादा एक काल्पनिक ‘फ्लाइंग किस’ से हो जाती हैं परेशान


अब कोई मेलोड्रामा नहीं

हम तंग आ चुके हैं. हम थक गए हैं. हम नकली मेलोड्रामा से निपट चुके हैं, जो समाचारों के लिए होता है, जहां सुर्खियों में कहा जाता है कि ‘प्रधानमंत्री ने लाल किले से दहाड़ा’ (टाइम्स नाउ) और उन्मादी विस्फोट जो समाचार बहस को परिभाषित करते हैं — दोनों अगले साल जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, बढ़ जाएंगे.

हम स्टार प्लस, सोनी, ज़ी, कलर्स आदि पर सास-बहू, पुरुषों और आलीशान हवेलियों, डेली सोप ओपेरा के रोना-धोना से भी थक गए हैं, जो सच में उस समय से आगे नहीं बढ़े हैं जब केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने 2000-2008 के बीच क्योंकि सास भी कभी बहू थी’  में मां, बहू बदला लेने वाली देवी आदर्श पत्नी तुलसी की भूमिका निभाई थी.

और जबकि स्ट्रीमिंग चैनलों पर कई सीरीज़ बहुत बेहतरीन हैं, वहां बहुत अधिक हिंसा, असभ्य भाषा और मासूमियत के बिना एक गंभीर वास्तविकता भी है.

डीडी नेशनल पर, हम अतीत की बातों को याद करके राहत महसूस करते हैं: ‘चित्रहार’ में पुरानी फिल्मों के पुराने गाने जहां तनुजा के साथ राजेश खन्ना ने रोमांस किया है, जया भादुड़ी के साथ संजीव कुमार ने रोमांस किया है…वाहह..

और तो और, आपको ‘बॉम्बे टॉकीज़’ में पुरानी फिल्में भी देखने को मिलती हैं: पिछले कुछ दिनों में, मैंने ‘केसरी’, ‘गदर एक प्रेम कथा’, ‘कर्मा’ (दिलीप कुमार के साथ), और ‘लव कुश’…जितेंद्र और जया प्रदा अभिनीत देखी. हे भगवान, आपने आखिरी बार जंपिंग जैक के साथ कब समय बिताया था?

मनोरंजन चैनलों ने फिल्मों को पूरी तरह से त्याग दिया है— उन्होंने सिनेमा को स्ट्रीमिंग चैनलों पर छोड़ दिया हैय फिर भी, वहां भी, आप नई तस्वीरों की चमक के नीचे एक सुनहरी-पुरानी तस्वीर नहीं पा सकते हैं.

दूरदर्शन नेशनल ‘आवारा’, ‘आराधना’, या ‘अनामिका’ को नहीं दिखा सकता, लेकिन फिर भी, यह हो सकता है और आप चैनल पर पिछली सदी की फिल्में देख सकते हैं. यह बहुत बड़ी बात है: हममें से बहुत से लोग उन फिल्मों को देखकर प्राप्त सुख-या दर्द-को फिर से जीने की लालसा रखते हैं.


यह भी पढ़ें: हरियाणा से लेकर ट्रेन में ‘आतंक’ तक, पीड़ितों के मुस्लिम होने पर TV समाचार उनकी पहचान से कतराते हैं


काम की बात, फालतू नहीं

दूरदर्शन नेशनल पर नए धारावाहिकों में नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम वीडियो, हॉटस्टार, सोनी लिव, ज़ी 5 की तरह शो की सुंदरता, अच्छा लुक, उनकी चिकनी, चुस्त, अच्छी तरह से लिखी गई पटकथा और डायलॉग्स की कमी है और उस स्तर पर, डीडी नेशनल के पास कुछ सिफारिश करने के लिए कुछ भी नहीं है.

हालांकि, इसके शो के विषय कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं. महिलाओं, युवतियों, युवा लड़कियों को ध्यान के केंद्र में लाने की एक अच्छी कोशिश की गई है – डीडी नेशनल पर मुख्य प्राइम टाइम शो – ‘छोटकी-छटंकी’, ‘जहां चांद रहता है’ और ‘जानकी’ को देखिए.

संदेश सीधा और मजबूत है: महिलाएं, विशेष रूप से युवतियां, बेहतर की हकदार हैं और वे इसे सबसे अनिच्छुक हाथों से छीनने वाली हैं, चाहे कुछ भी हो जाए.

छुटकी जीवंत, बुद्धिमान है और अपनी साइकिल के पहियों को घुमाकर अपने गांव में सड़क किनारे रोमियों से छुटकारा पा सकती है. वह अपने परिवार को महिला सशक्तिकरण के बारे में एक या दो बातें भी बताती है – उसकी दो बहनें हैं जिन्हें लगातार उसकी मजबूत रणनीति की ज़रूरत पड़ती है.

‘जहां चांद रहता है’ में, किरण को साइंस से प्यार है, लेकिन उसके परिवार का मानना है कि एक पत्नी के रूप में अपने भविष्य की तैयारी के लिए उसे बर्तन मांजना और आलू छीलने चाहिए. उसकी महत्वाकांक्षाओं के प्रति उसके पूरे संयुक्त परिवार का विरोध उसे उसकी बाहों में धकेल देगा…ठीक है, आइए इस कथानक को न छोड़ें.

‘जानकी’ को उपनाम दिया जा सकता है, ‘लड़कियों के लिए कोई परिवार नहीं’. इसकी शुरुआत एक बच्ची को उसके पिता द्वारा जंगल में एक मंदिर में छोड़े जाने से होती है. उनके अमीर परिवार में, जन्म के समय भी, लड़के को पहले आना चाहिए. जब तक लड़का पैदा न हो, कोई लड़की वहां बड़ी नहीं हो सकती…

आप कह सकते हैं कि यह भारी-भरकम सामाजिक संदेश है और आप सही हैं…क्योंकि यह है, लेकिन अमेज़ॅन प्राइम की सीरीज़, ‘मेड इन हेवन’ में उपदेश से ज्यादा कुछ नहीं. सच में डीडी नेशनल धारावाहिकों में हल्का होने के साथ-साथ अधिक स्पष्ट स्पर्श भी होता है. ओटीटी शो में कुछ न कुछ गहरा है, चाहे वे कितने भी अच्छे क्यों न हों.

किरण के साथ खुले में रहना, उसके परिवार द्वारा डांटे जाने से पहले पतंग उड़ाना, किसी तरह कम दमनकारी है.

चौंकाने वाली बात

‘स्वराज’ और ‘एस.आई.डी.फर्ज़’ जैसे पुराने शो—पहला क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में, दूसरा अपराधियों के खिलाफ लड़ाई के बारे में — कंटेंट में बहुत खराब हैं. ‘स्वराज’ में अंग्रेज़ अधिकारी ऐसे लगते हैं जैसे वे अमेरिकी हों और एक भारतीय की तरह ही अंग्रेज़ दिखते हैं. उफ्फ…फिर भी, यह 1857 है और भारतीय सैनिक विद्रोह करने वाले हैं… चौंकाने वाली बात है.

‘एस.आई.डी.’ में अविश्वास का स्वैच्छिक निलंबन आपको शो का आनंद लेने की अनुमति देता है — तब भी जब अच्छे लोग उसी आदमी को दूसरी बार मारते हैं. ‘स्वराज या एस.आई.डी.’ में बहा खून तो ज़ाहिर तौर पर यह खून नहीं है, यह लाल रंग का विज्ञापन हो सकता है.

ऐसा आनंद, सिर्फ डीडी नेशनल पर.

(लेखिका का ट्विटर हैंडल @shailajabajpai है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(टेलिस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: भारतीय TV सीरियल्स अभी भी ‘पति छीनने वाली दुष्ट महिलाओं पर अटके हैं’, OTT इस दौड़ में सबसे आगे


 

share & View comments