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Thursday, 23 May, 2024
होममत-विमतमौजूदा मंदी कॉरपोरेट घरानों के लिए बहार लाने वाली है और मजदूरों को बंधुआ बनाने की तैयारी

मौजूदा मंदी कॉरपोरेट घरानों के लिए बहार लाने वाली है और मजदूरों को बंधुआ बनाने की तैयारी

बीएस-6 वाहनों के निर्माण की तकनीकी तैयारियां हो रही हैं और बीएस-4 वाहनों के स्टॉक को किसी तरह बेच डालने की कोशिश हो रही है. ऐसे में वे नया उत्पादन क्यों करें, वह भी बीएस 4 का!

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मंदी पर चर्चा इन दिनों बड़े पैमाने पर है. पक्ष और विपक्ष इसको लेकर सुर्खियां बना रहे हैं. कोई ‘ओला-उबर’ को कोस रहा है तो कोई नोटबंदी और जीएसटी का नतीजा बता रहा है. दोनों ही पक्षों से सारी हमदर्दी और इलाज के हकदार बन रहे हैं.

लाखों लोगों के बेरोजगार होने की चर्चा ‘बुलेट न्यूज’ के स्टाइल में ही है आमतौर पर वो भी नहीं. जबकि अंदरखाने कुछ और तस्वीर बनती दिखाई दे रही है. मंदी के फौरी नुकसान को बाद के कई गुना मुनाफे में तब्दील करने की तैयारी हो चुकी है.

मंदी की धुंध हर सेक्टर में है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में ऑटोमोबाइल सेक्टर में है. जबकि आंकड़े बताते हैं कि बीते कुछ अंतराल में इस सेक्टर ने बहुत ज्यादा वृद्धि तो नहीं की, लेकिन ऐसा कोई खास नुकसान भी नहीं झेला.

सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाईल मैनुफैकचरर्स की रिपोर्ट बता रही है कि इस उद्योग ने अप्रैल-मार्च 2019 में यात्री वाहनों, वाणिज्यिक वाहनों, तीन पहिया, दो पहिया और क्वाड्रिसाइकिल सहित कुल 30,915,420 वाहनों का उत्पादन किया, जबकि अप्रैल-मार्च 2018 में यह 29,094,447 था, पिछले साल की इसी अवधि में 6.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी.

पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में अप्रैल-मार्च 2019 में यात्री वाहनों की बिक्री में 2.70 प्रतिशत की वृद्धि हुई. यात्री वाहनों में, पैसेंजर कार, यूटिलिटी व्हीकल और वैन की बिक्री में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में अप्रैल-मार्च 2019 में क्रमश: 2.05 प्रतिशत, 2.08 प्रतिशत और 13.10 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

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कॉमर्शियल वाहनों ने अप्रैल-मार्च 2019 में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 17.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. मध्यम और भारी वाणिज्यिक वाहन 14.66 प्रतिशत और हल्के कॉमर्शियल वाहन अप्रैल-मार्च 2019 में पिछले वर्ष की इसी अवधि में 19.46 प्रतिशत बढ़ गए.

थ्री व्हीलर की बिक्री अप्रैल-मार्च 2019 में पिछले साल की समान अवधि में 10.27 प्रतिशत बढ़ी. थ्री व्हीलर और पैसेंजर कैरियर की बिक्री में 10.62 प्रतिशत और गुड्स कैरियर की अप्रैल-मार्च 2019 में अप्रैल-मार्च 2018 की तुलना में 8.75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

अप्रैल-मार्च 2018 की तुलना में अप्रैल-मार्च 2019 में टू व्हीलर की बिक्री में 4.86 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. टू व्हीलर सेगमेंट के भीतर, स्कूटर में 0.27 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि मोटरसाइकिल और मोपेड में क्रमश: 7.76 प्रतिशत और 2.41 प्रतिशत की वृद्धि हुई.


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अप्रैल-मार्च 2019 में, कुल ऑटोमोबाइल निर्यात में 14.50 प्रतिशत की वृद्धि हुई. जबकि यात्री वाहन निर्यात में 9.64 प्रतिशत की गिरावट आई है. वाणिज्यिक वाहनों, तीन पहिया और दो पहिया वाहनों ने 3.17 प्रतिशत, 49 प्रतिशत और 16.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की.

मतलब साफ है कि समस्या सिर्फ बहुत ज्यादा मुनाफा न कमा पाने की है, ये कुछ कम हुआ है. इसकी वजह न ओला-उबर टैक्सी का बढ़ना है और न ही जीएसटी का खेल. देखा जाए तो ये वास्तव में बड़ा शिकार पकड़ने की तैयारी है.

कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में वाहन पंप मैकेनिकों की एक कार्यशाला हुई. जिसमें इस बात पर चिंता थी कि जल्द बाजार में बीएस-6 वाहन आ जाएंगे. लेकिन मैकेनिकों के पास उनकी मरम्मत का कोई प्रशिक्षण नहीं है. इन मैकेनिकों का ये भी कहना था कि तमाम विकसित देश बीएस-6 से आगे की स्टेज में दाखिल हो रहे हैं, उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा.

ये सच भी है. सरकार ने बीएस-4 से सीधे बीएस-6 वाहनों को 2020 में लाने का ऐलान कर दिया है. बहुत कम समय बचा है निर्माताओं के पास. बीएस-6 वाहनों के निर्माण की तकनीकी तैयारियां हो रही हैं और बीएस-4 वाहनों के स्टॉक को किसी तरह बेच डालने की कोशिश हो रही है. ऐसे में वे नया उत्पादन क्यों करें, वह भी बीएस 4 का!

जाहिर है, उत्पादन बंद करना उनकी आगे की तैयारी का हिस्सा है. उन्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि लोग बेरोजगार हो जाएंगे. वे तो सरकारी नीतियों को कोसकर मजदूरों की हमदर्दी ही हासिल कर रहे हैं. ये क्रम नीचे शोरूम और उससे जुड़ी अन्य इकाइयों तक पहुंचा है.

संभावना तो ऐसी भी है कि जो लोग बीएस 4 वाहन का इस्तेमाल करेंगे, उनको कार्बन टैक्स देने की नौबत आ सकती है, क्योंकि वाहनों से कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए ही एक सीढ़ी छोड़कर छलांग लगाई जा रही है. कुछ विकसित देशों में ये टैक्स लग भी चुका है या लगाने की तैयारी है.

इससे भी अहम बात एक और है. वाहन निर्माता और अन्य उद्यमी 44 श्रम कानूनों की जगह चार श्रम संहिताओं का फायदा उठाने को भी आतुर हैं. बड़े पैमाने पर बेरोजगारी के बाद जब फिर उत्पादन किया जाएगा तो काफी कम मजदूरी पर लोग मिल जाएंगे. तब केंद्रीय श्रम व रोजगार मंत्री संतोष गंगवार की नजर में वे ‘योग्य व कुशल’ हो चुके होंगे.

नए सिरे से रोजगार पाने वालों को तय अवधि रोजगार (फिक्स्ड टर्म इंप्लॉयमेंट) के दायरे में बांधा जाएगा, जिसका राजपत्र मार्च 2018 में पास किया जा चुका है. यानी दिन, महीने की शर्तों पर रोजगार. ऐसे श्रमिकों को निकालने पर कोर्ट से भी राहत पाने का अधिकार नहीं होगा. किसी विरोध के बारे में तो वे सोच भी नहीं सकते.


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ट्रेड यूनियनों को भी ठिकाने लगाने का संशोधन बिल केंद्रीय मंत्रिमंडल में पास हो चुका है. सरकारी इशारे और नियोक्ता के मनमाफिक संचालित होने वाली यूनियनों का ही अस्तित्व बचेगा.

ऐसा होने से होगा क्या? यही कि मजदूरी कम करके, काम के घंटे बेरोकटोक ज्यादा करके उत्पादन की लागत कम करके मुनाफे की दर कई गुना बढ़ाई जाएगी. सार्वजनिक उपक्रम भी निजी हाथों में आकर मुनाफे की दौड़ में शामिल होंगे. श्रमिकों का जीवन स्तर गिरेगा और उनकी आगे की पीढ़ियों के तरक्की के रास्ते काफी कम हो जाएंगे.

मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा निम्न आय वर्ग में शामिल हो जाएगा और फिर मंदी छा जाएगी. इससे एक नतीजा और निकलता है कि मंदी जीएसटी या नोटबंदी से प्रभावित तो है, लेकिन वह कारण नहीं है. ये व्यवस्थागत है. अर्थव्यवस्था की गाड़ी फिर फंसेगी और फिर कल्याणकारी योजना या युद्ध की घोषणाएं करके उद्योगों को जीवनदान देने की निरर्थक कोशिशें की जाएंगी.

(लेखकस्वतंत्र पत्रकार हैं. यह लेख उनका निजी विचार है.)

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