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Wednesday, 12 June, 2024
होममत-विमतबातें ज्यादा, काम कम: COP27 जैसे जलवायु परिवर्तन के सम्मेलन थके-हारे ही साबित हुए हैं

बातें ज्यादा, काम कम: COP27 जैसे जलवायु परिवर्तन के सम्मेलन थके-हारे ही साबित हुए हैं

पिछले 50 वर्षों में हुए सम्मेलनों का रिकॉर्ड पर्यावरण के भविष्य को लेकर निराशा ही पैदा करने वाला है लेकिन लक्ष्य तय करने के लिए सम्मेलनों की ओर से दबाव न बने तो और भी कम काम होगा.

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पर्यावरण को लेकर जो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होते रहते हैं उनके बारे में प्रायः पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि उनमें क्या होगा. महायुद्ध की आशंकाएं जताई जाती हैं, बहुत कुछ कहा जाता है, सम्मेलन को विफल होने से बचाने के लिए अंतिम समय में कुछ वादे किए जाते हैं और थके-हारे प्रतिनिधि घर लौट जाते हैं. उसके बाद काम कम ही होता है.

लक्ष्य तय करने के लिए सम्मेलनों की ओर से दबाव न बने तो और भी कम काम होगा. इसी वजह से, पिछले 50 साल में हुए सम्मेलनों (पर्यावरण पर पहला सम्मेलन 1972 में स्टॉकहोम में हुआ था) का रिकॉर्ड आपको पर्यावरण के भविष्य को लेकर निराशा ही पैदा करने वाला है.

फिर भी, यह सोचना गलत होगा कि कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. काफी कुछ हुआ है, बेशक वह बेहद सुस्त रफ्तार से हुआ है, जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को और खासकर गरीबों को भुगतना पड़ेगा.

दुनिया की जो हालत है वह उसकी तुलना दिल्ली से की जा सकती है, जो अपने आसपास के इलाकों के साथ खुद जाड़े के मौसम में जहरीली गैस का चैंबर बन जाती है. इस संकट का अंदेशा दशकों से किया जा रहा था और सुधार के कुछ उपाय भी किए गए लेकिन आज की हकीकत यह संकट ही है.

जब क्लब ऑफ रोम ने 1972 में ‘लिमिट्स टु ग्रोथ’ किताब प्रकाशित की थी तो यह किताब खूब बिकी थी लेकिन इसके केंद्रीय संदेश की कई लोगों ने आलोचना भी की थी. इस किताब ने प्रदूषण और संसाधनों के विनाश की ओर ध्यान खींचा था लेकिन उसी साल हुए स्टॉकहोम सम्मेलन को कई विशेषज्ञों ने, खासकर पश्चिम वालों ने तवज्जो नहीं दी थी. हालांकि उसमें 100 से ज्यादा देशों ने भाग लिया था मगर केवल दो शासनाध्यक्ष ही आए थे— मेजबान देश के शासनाध्यक्ष और इंदिरा गांधी. लेकिन उन्होंने यह बयान देकर उस आयोजन के लिए गलत संदेश दे दिया कि गरीबी प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह है.

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बहरहाल, वह नया रास्ता बनाने वाला आयोजन था. उसकी 20वीं वर्षगांठ पर 1992 में रियो डि जनेरियो में जो ‘अर्थ समिट’ हुई उसने जलवायु परिवर्तन की अंतरराष्ट्रीय संधि की रूपरेखा तय की. और कई सम्मेलनों के बाद 1997 में क्योटो संधि हुई, जिसने तीन दर्जन विकसित देशों को अपने यहां कार्बन उत्सर्जन 1990 के आधार स्तर से नीचे लाएं. इसकी पुष्टि में आठ साल लग गए और तब तक यानी 2008 तक उत्सर्जन के लक्ष्य समय-समय पर तय किए जाते रहे.
हर लक्ष्य छूटता गया और आधार वर्ष बदलता गया और ज्यादा सम्मेलन होते रहे— कोपेनहेगन-2009, पेरिस-2015 आदि. अब लक्ष्य के साथ सिद्धांत को भी खारिज कर दिया गया, सबसे अहम यह कि प्रदूषण करने वाले मुख्य पक्षों पर ही नुकसान को सीमित करने की जिम्मेदारी है. कुछ लोग तो अब इस विचार पर भी नाक-भौं सिकोड़ते हैं.

सवाल है कि हम कहां आ पहुंचे हैं? धरती का औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा की घातक सीमा के रास्ते पर 80 फीसदी आगे बढ़ चुका है. इस खतरनाक रेखा को पार करने के बाद भी उत्सर्जन जारी रहेगा, इसलिए औद्योगिक युग से पहले के औसत तापमान से 2 डिग्री ज्यादा की सीमा भी पार हो सकती है.

वातावरण पर कार्बन के कुल बोझ की सीमा का दो तिहाई रास्ता दुनिया पार कर चुकी है. इसलिए जलवायु परिवर्तन का संकट आ चुका है. करोड़ों लोग, खासकर गरीबों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. दुनिया के कई हिस्से रहने लायक नहीं रह जाएंगे. प्रजातियों के विनाश की गति तेज होगी. सरकारों को पता चलेगा कि उनके पास पारिस्थितिकीय, आर्थिक और मानवीय संकट का मुकाबले करने के संसाधन नहीं रह गए हैं. यह संकट को और जटिल बना देगा.

अच्छी बात यह है कि कई अमीर, औद्योगिक युग के बाद अर्थव्यवस्थाओं ने अपने यहां उत्सर्जन के स्तर को नीचे लाना शुरू कर दिया है. भारत समेत कई देशों ने आर्थिक गतिविधियों में ऊर्जा के उपयोग को कम किया है, जबकि उपयोग की जाने वाली ऊर्जा स्वच्छतर होती जा रही है. ‘शून्य’ का लक्ष्य अभी दशकों दूर है लेकिन शून्य का लक्ष्य तय करने की अपरिहार्य रूप से जटिल प्रक्रिया भी देर से की गई खोज है.

इन 50 वर्षों के सबक क्या हैं? पहला यह कि सम्मेलनों में बड़बोली बातों के बावजूद, जैसा कि अब शर्म अल-शेख में की गई, इस तरह की बैठकें सुई को यदाकदा आगे बढ़ाती हैं हालांकि यह बहुत देर से किया गया बहुत कम काम होता है. कभी-कभी सुई पीछे की ओर घूमने लगती है, जो कि यूक्रेन जैसे युद्ध के कारण होता है, कोयला विरोधी देशों को ताप विद्युत केंद्रों को फिर से चालू करने को कहा जाता है. दूसरे, बार-बार के वादों के बावजूद, कोई भी अमीर देश गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए मदद के रूप में पर्याप्त पैसा नहीं देने वाला, हालांकि गरीब देशों ने यह समस्या नहीं पैदा की.

तीसरे, बहुत कम लोग उस जीवन शैली को (खानपान की आदतों से शुरू करके) बदलने को तैयार हैं जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है. यह नहीं होगा तो तकनीक कुछ समाधान तो दे सकती है मगर पूरा नहीं. अंत में, ‘ग्रोथ’ के विनाशक पहलू का निपटारा तब तक नहीं हो सकता जब तक राष्ट्रीय हिसाब-किताब को पुनः परिभाषित नहीं किया जाता ताकि उसमें प्राकृतिक संपत्तियों को पहुंचाए गए नुकसान का हिसाब उसमें शामिल हो. कैंब्रीज के दिग्गज पार्थ दासगुप्ता की अध्यक्षता वाली कमिटी ने 2013 में इस तरह की परिभाषा और हिसाब-किताब की सिफारिश की थी. उसकी रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय की फाइलों में गुम हो गई है.

(अनुवाद: अशोक | संपादन: कृष्ण मुरारी)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(बिजनेस स्टैंडर्ड से विशेष प्रबंध द्वारा)


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