नेपाल के चुनाव नतीजों के शुरुआती संकेत बताते हैं कि नई पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी देशभर में बढ़त बनाए हुए है, जबकि पुराने दल—नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूएमएल और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी—उसके पीछे चल रहे हैं.
यह चुनाव युवाओं की आकांक्षाओं और पुराने नेताओं की जगह युवा नेतृत्व लाने की मांग के मुद्दे पर लड़ा गया. 5 मार्च को हुए मतदान में कुल 58.07 प्रतिशत वोटिंग हुई. यह 2008 में देश के पहले लोकतांत्रिक चुनाव के बाद से सबसे कम मतदान है.
तुलनात्मक रूप से कम मतदान होने की एक वजह मिडिल ईस्ट का संकट भी हो सकता है. खाड़ी देशों में लाखों नेपाली रहते हैं, इसलिए ध्यान उनके मतदान में भाग लेने से ज्यादा उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर था. इसके लिए मेजबान देशों के साथ बातचीत की जा रही थी. इस बार पोस्टल बैलेट की सुविधा भी नहीं दी गई, इसलिए विदेशों में रहने वाले नेपाली वोट नहीं दे सके.
विदेश में रहने वाला यही समुदाय नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता, नेतृत्व की विफलता, भ्रष्टाचार और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठाता रहा है. यही बातें आगे चलकर जेन ज़ी आंदोलन के जरिए भी सामने आईं.
अच्छी बात यह रही कि चुनाव शांतिपूर्ण और सभी को शामिल करने वाला रहा. इसमें नई और पुरानी पार्टियों के साथ-साथ स्वतंत्र उम्मीदवारों ने भी हिस्सा लिया. यह अंतरिम सरकार के जनादेश को समय पर पूरा करने में प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की भूमिका को भी दिखाता है.
साथ ही, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का नेपाली राजनीति में नई जगह बनाना—खासकर उन पार्टियों के सामने जो 1950 के दशक में आधुनिक नेपाल की शुरुआत के समय से मौजूद हैं—यह एक नए नेपाल की शुरुआत का संकेत देता है.
अब नेतृत्व को युवाओं की जरूरतों को समझना होगा, जिनमें विकास, बेहतर शासन, पारदर्शिता, रोजगार और बिना भेदभाव के बराबर अवसर शामिल हैं.
बालेन्द्र शाह, जिन्हें आम तौर पर बालेन कहा जाता है, अगर आरएसपी सीटों की दौड़ में आगे रहती है तो वे अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं. उनके जरिए नेपाल को अब तक का सबसे युवा नेता प्रधानमंत्री पद पर मिल सकता है.
बालेन की लहर
इसमें कोई शक नहीं है कि बालेन नेपाल के सबसे लोकप्रिय युवा नेता हैं, जिनकी सिंह दरबार तक पहुंचने की संभावित यात्रा किसी परियों की कहानी से कम नहीं हो सकती.
एक इंजीनियर से रैपर बने बालेन ने भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के मुद्दों पर लोगों की भावनाओं को जगाया और 2022 में काठमांडू के मेयर के पद तक पहुंच गए. उन्होंने पारंपरिक पार्टियों के बड़े उम्मीदवारों को भारी अंतर से हराया.
जेन ज़ी आंदोलन के बाद बालेन एक बार फिर अंतरिम नेता के लिए लोकप्रिय पसंद बनकर उभरे. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म डिसकॉर्ड पर लोकप्रिय वोट के लिए उनका नाम कार्की के साथ रखा गया था.
हालांकि, अंतरिम भूमिका छोड़ना मुश्किल रहा होगा, लेकिन ऐसा लगता है कि बालेन ने चुनाव लड़ने का एक रणनीतिक फैसला लिया. इस कदम से उन्हें चुनावी जनादेश और चुनी हुई संसद के समर्थन के साथ पांच साल का कार्यकाल मिल सकता है.
फिर भी चुनाव के दौरान कुछ संदेह भी थे, जब पूरा अभियान सिर्फ युवाओं और उनकी मांग—बालेन को देश का शीर्ष नेता बनाने—तक सीमित हो गया. “बालेन चाहिए” या “We want Balen” एक शहरी और युवाओं से जुड़ी घटना लग रही थी.
इसे सोशल मीडिया का हाइप भी बताया गया, जिसे पश्चिमी मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और जेन ज़ी को बालेन के साथ जोड़कर पेश किया. इस तरह की छवि पर कुछ आलोचना भी हुई.
संभावित गठबंधन
बालेन की लोकप्रियता के बावजूद, यह संभावना ज्यादा है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को साफ बहुमत न मिले.
यहीं पर नेपाली कांग्रेस को फायदा मिल सकता है, जिसके नेता गगन थापा, 49 साल के नेता हैं और उन्होंने भी युवा वोटरों से अच्छा जुड़ाव बनाया है. पार्टी का सात दशक पुराना वोटर आधार उसके लिए फायदेमंद हो सकता है.
अगर आएसपी और नेपाली कांग्रेस को सीटों का आंकड़ा सही लगता है, तो दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन हो सकता है. नेपाल में सत्ता साझेदारी पर आधारित गठबंधन सरकार पहले भी बनती रही है, इसलिए यह कोई नई बात नहीं होगी.
बालेन और गगन दोनों ही मजबूत व्यक्तित्व हैं, इसलिए उनके लिए साथ काम करना आसान नहीं हो सकता—कुछ वैसा ही जैसा नेपाल ने केपी ओली और पुष्प कमल दाहाल (प्रचंड) के साथ देखा था.
दिलचस्प बात यह है कि प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी इस बार सिंगल डिजिट सीटों की ओर झुकती दिख रही है, इसलिए वे उस गठबंधन में शामिल होना चाहेंगे जो अंतिम गिनती में सरकार बना सके.
वे पहले भी कई बार खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए राजनीतिक समीकरण बदलते रहे हैं, जिसमें ओली के साथ हाथ मिलाना भी शामिल है. इस बार भी वे ऐसी ही स्थिति में हो सकते हैं.
अक्सर आखिरी डबल डिजिट सीटें ही प्रचंड को अहम मोलभाव की ताकत देती हैं. 2022 में, सिर्फ 32 सीटें होने के बावजूद, जबकि सीपीएन-यूएमएल के पास 78 सीटें थीं, प्रचंड सीपीएन-यूएमएल और आरएसपी के साथ गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री बन गए थे.
हालांकि, इस बार वे शायद मुख्य नेतृत्व की मांग न करें, लेकिन अंतिम नतीजे आने के बाद सत्ता में बने रहना उनका लक्ष्य रहेगा.
साथ ही, मधेशी होने के कारण बालेन को स्थानीय मधेशी पार्टियों का समर्थन भी सरकार बनाने में मिल सकता है.
आगे की चुनौतियां
अगर आरएसपी अकेले या गठबंधन में सरकार बना लेती है, तो बालेन के नेतृत्व में उस पर काम करने का मजबूत जनादेश होगा.
सबसे पहला काम होगा अपने चुने हुए नेताओं से अपनी संपत्ति घोषित करने को कहना और पहले दिन से पारदर्शिता सुनिश्चित करना. हालांकि यह आसान नहीं रहा है और पहले भी सरकारें ऐसा करने की कोशिश कर चुकी हैं.
दूसरा बड़ा काम होगा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, जो बालेन के नेतृत्व का मुख्य मुद्दा रहेगा.
तीसरा काम होगा रोजगार पैदा करना और मिडिल ईस्ट, ईस्ट एशिया, ओशिनिया और अमेरिका में रहने वाले बड़े नेपाली प्रवासी समुदाय के हितों की रक्षा करना. इसी प्रवासी समुदाय ने सोशल मीडिया पर बालेन की लहर को मजबूत किया.
संघर्ष से जूझ रहे मिडिल ईस्ट में फंसे लाखों नेपाली लोगों की स्थिति को संभालना बालेन का प्रधानमंत्री कार्यालय में पहला काम हो सकता है.
जेन ज़ी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाना और कथित हत्याओं में पुलिस की भूमिका की जांच भी एक अहम काम होगा.
इस संबंध में अंतरिम सरकार ने पूर्व स्पेशल कोर्ट जज गौरी कार्की की अगुवाई में एक जांच आयोग बनाया था, लेकिन चुनाव को देखते हुए उसकी रिपोर्ट को रोक लिया गया. उस रिपोर्ट को सार्वजनिक करना युवाओं की बड़ी मांग बन सकता है.
घरेलू मुद्दों के अलावा बालेन के सामने एक और बड़ा काम होगा—नेपाल के दो पड़ोसी देशों भारत और चीन के साथ संबंधों को फिर से मजबूत करना.
बालेन 2015 के सीमा व्यवधान और 2020 के क्षेत्रीय विवाद के संदर्भ में भारत को लेकर मजबूत राय रखते रहे हैं. अब युवाओं के समर्थन के साथ यह देखना बाकी है कि सोशल मीडिया के पुराने ट्रेंड जैसे #BackOffIndia और #GoBackIndia नेपाल की भारत नीति को कितना प्रभावित करेंगे.
दूसरी ओर, चीन नेपाल के साथ अपने रिश्ते में ‘कोई ऐतिहासिक बोझ न होने’ का फायदा उठाते हुए नजदीकी सहयोग बढ़ाना चाहेगा.
नेपाल ने 35 साल में 30 प्रधानमंत्री देखे हैं और 2008 में लोकतंत्र आने के बाद से 10 से ज्यादा प्रधानमंत्री बदल चुके हैं. देश को अब राजनीतिक स्थिरता की बहुत जरूरत है और नई सरकार को इसे सुनिश्चित करना होगा.
इस चुनाव ने राजशाही को वापस लाने की चर्चा को भी लगभग खत्म कर दिया है. अब आगे लोकतंत्र ही विकसित होगा, भले ही वह कभी-कभी लड़खड़ाए, क्योंकि वह हर वोट की अहमियत को मानता है.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल अफेयर्स पर कॉमेंटेटर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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