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Saturday, 31 January, 2026
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तालिबानी कानून की शरीयत के नाम पर सख्ती: पसमांदा मुस्लिम के तौर पर यह सच मेरे लिए नया नहीं

एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने मुस्लिम समाज के भीतर जाति, पदानुक्रम और असमानता पर वर्षों तक बात की है, अब मैं इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती.

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मुझे साफ-साफ याद है जब मैंने पहली बार सार्वजनिक मंचों पर भारतीय मुस्लिम समाज में मौजूद जातिवाद पर बोलना और लिखना शुरू किया था. प्रतिक्रिया तुरंत आई और निराशाजनक थी. मुझ पर प्रचार करने का आरोप लगा, कहा गया कि मेरा कोई छिपा हुआ एजेंडा है. मुझे गुस्सा नहीं, बल्कि इनकार ज़्यादा हैरान करने वाला लगा.

यह कोई नया या अनजानी बात नहीं थी. इस मुद्दे पर पहले से ही दशकों से बहुत सारा काम लिखा और दर्ज किया जा चुका है. आंबेडकर से लेकर योगिंदर सिकंद तक, ऐसे विद्वान जिनकी सोच वाम-उदारवादी, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष रही है, उन्होंने खुलकर मुस्लिम समाज में जाति प्रथाओं की जांच और आलोचना की है.

फिर भी, समुदाय के भीतर से इस मुद्दे को उठाना ऐसा लगा जैसे कोई वर्जित रेखा पार की जा रही हो, मानो भेदभाव से ज़्यादा समस्या उस असहज सच्चाई को बताना हो.

एक और तरह की प्रतिक्रिया भी थी—सहानुभूतिपूर्ण, लेकिन उतनी ही परेशान करने वाली. समस्या पर बात करने के बजाय, लोग उसे टालने की कोशिश करते रहे. यह कहकर बात खत्म कर दी जाती थी कि मुसलमानों में जाति व्यवस्था सिर्फ “हिंदू समाज का प्रभाव” है, जैसे इससे हमारी जिम्मेदारी खत्म हो जाती हो. चर्चा वहीं रुक जाती थी और भेदभाव झेलने वालों की असली ज़िंदगी की सच्चाई तक बात कभी पहुंचती ही नहीं थी.

अब, जब मैं तालिबान द्वारा लागू किए जा रहे नए आपराधिक कानून के बारे में पढ़ती हूं, जो समाज को खुले तौर पर कठोर पदानुक्रमों में बांटता है, जहां मुल्ला कानून से ऊपर हैं और बाकी लोग उनकी दया पर छोड़ दिए गए हैं, तो मैं सोचने पर मजबूर हो जाती हूं कि इस बार क्या बहाना दिया जाएगा.

क्या इसे भी हिंदू समाज पर ही डाल दिया जाएगा? और अगर हां, तो यह तर्क कहां तक जाएगा? खासकर तब, जब हिंदू समाज ने अपनी तमाम कमियों और विरोधाभासों के बावजूद, कम से कम जाति को एक नैतिक और सामाजिक बुराई के रूप में स्वीकार किया है और उसे खत्म करने की दिशा में—भले ही अधूरे तरीके से, काम जारी रखा है. मुस्लिम समाजों के भीतर पदानुक्रम को उसका सही नाम तक न देना, अब अज्ञान से ज़्यादा जिम्मेदारी से जानबूझकर बचने जैसा लगता है.

संस्थागत असमानता

तालिबान के नए घोषित आपराधिक कानून के अनुच्छेद-9 के तहत, धार्मिक विद्वान यानी मुल्ला, सज़ा से लगभग पूरी तरह सुरक्षित हैं. अधिक से अधिक उन्हें अपराध के लिए सिर्फ “सलाह” दी जाती है. अभिजात वर्ग, यानी अशराफ, को समन या हल्की पूछताछ का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन बाकी सभी के लिए—मध्यम और निचले वर्ग के लोगों के लिए कानून बहुत सख्त है. एक ही अपराध के लिए, मध्यम वर्ग को जेल हो सकती है, लेकिन निचले वर्ग को दोहरी सज़ा मिलती है—जेल और कोड़े.

यह न्याय नहीं है; यह कानून में लिखी गई जाति जैसी व्यवस्था है. या बेहतर शब्दों में कहें तो यह संस्थागत असमानता है—एक ऐसा सिस्टम, जहां ताकत नैतिकता तय करती है और हैसियत जवाबदेही तय करती है. इसे और भी परेशान करने वाली बात यह है कि इन नियमों को न तो सांस्कृतिक बिगाड़ कहा जा रहा है, न ही इतिहास की कोई मजबूरी. तालिबान इन्हें पूरी तरह शरीयत के अनुरूप बताकर सही ठहराता है. न परंपरा. न स्थानीय रिवाज. बल्कि ईश्वरीय मंजूरी.

और यही वह बात है, जिससे हम लगातार बचते रहते हैं. मुस्लिम समाजों के भीतर मौजूद पदानुक्रम, बहिष्कार और असमानता हमेशा बाहर से आई हुई नहीं होती. कई बार इन्हें जानबूझकर बनाया जाता है, सही ठहराया जाता है और धर्म के नाम पर बचाकर रखा जाता है. जब तक हम इसका ईमानदारी से सामना करने को तैयार नहीं होंगे, तब तक किसी भी तरह का इनकार या टालमटोल इस व्यवस्था के सबसे नीचे फंसे लोगों की ज़िंदगी नहीं बदल सकता.

बतौर पसमांदा मुस्लिम, यह मुझे गहराई से बेचैन करता है क्योंकि जब भी ऐसे सिस्टम पर सवाल उठाए जाते हैं, तो हमें कहा जाता है कि यह “संस्कृति” है, या “गलत इस्तेमाल” है, या कोई बाहरी प्रभाव है, लेकिन यहां तालिबान खुले तौर पर कहता है कि ये कानून शरीयत के मुताबिक हैं. जब असमानता को संस्थागत बना दिया जाए और धर्म के नाम पर सही ठहराया जाए, तो गरीबों, हाशिए पर खड़े लोगों और बेबस लोगों के लिए न्याय मांगने की कोई जगह नहीं बचती. यही बात इसे डरावना बनाती है.

आस्था की आड़ में अन्याय

न्याय की बात करें तो दुनिया भर के इस्लामी विद्वानों ने समाज को वर्गों में बांटने वाली ऐसी व्यवस्था की निंदा की है. सिद्धांत रूप में, शरीयत कानून के सामने वर्ग आधारित असमानता को मंज़ूरी नहीं देती.

पारंपरिक इस्लामी न्यायशास्त्र में सज़ा की अलग-अलग श्रेणियां मानी गई हैं:

हुडूद, जिनमें ईश्वरीय कानून द्वारा तय सज़ाएं होती हैं और जिनमें बराबरी सबसे ज़रूरी है; किसास, जो व्यक्ति या परिवार के खिलाफ अपराधों से जुड़ा होता है और समानुपातिक न्याय पर आधारित होता है; ताज़ीर, जहां सज़ाएं कुरान या हदीस में तय नहीं हैं और उन्हें शासक या काज़ी के विवेक पर छोड़ा गया है.

यहीं, यानी विवेक के इसी दायरे में, चीज़ें बिगड़ती हैं.

लेकिन विवेक का मतलब कभी यह नहीं था कि कमज़ोरों के साथ सख्ती और ताकतवरों के साथ नरमी बरती जाए. फिर भी आज हम यही देख रहे हैं.

यह ईश्वरीय न्याय नहीं है—यह ताकत का खुद को बचाना है और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने मुस्लिम समाजों के भीतर जाति, पदानुक्रम और असमानता पर वर्षों तक बात की है, मैं अब इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता.

जब आस्था का इस्तेमाल विशेषाधिकार बचाने के लिए किया जाता है, तो इसकी कीमत हमेशा सबसे हाशिये पर खड़े लोग चुकाते हैं.

दुख की बात यह है कि यह पदानुक्रम सिर्फ तालिबान के नियमों या दूर के देशों में ही नहीं दिखता. मैंने इसे भारतीय मुस्लिम समाज की रोज़मर्रा की प्रथाओं में देखा है.

हम बार-बार कहते हैं कि इस्लाम सभी ईमान वालों को बराबर मानता है, लेकिन शादी के मामले में हकीकत कुछ और ही नज़र आती है. उदाहरण के तौर पर निकाह में कफा’अ का विचार लें, जो पति-पत्नी के बीच सामाजिक और धार्मिक मेल पर ज़ोर देता है. मूल रूप से इसका मतलब परहेज़गारी और चरित्र में समानता था, लेकिन व्यवहार में कुछ उलेमा ने इसे जन्म, खानदान और जाति की बराबरी बना दिया.

मुझे आज भी याद है कि मैंने ऐसे फतवे पढ़े हैं जिनमें कहा गया है कि अगर कोई सैयद महिला किसी गैर-सैयद पुरुष से शादी करती है, तो उसके माता-पिता को वह शादी तोड़ने का हक है. ज़रा सोचिए. एक पसमांदा पुरुष से कहा जाता है कि चाहे उसकी आस्था, शिक्षा या मूल्य कुछ भी हों, वह फिर भी “कमतर” है. दारुल उलूम देवबंद जैसी संस्थाओं ने भी ऐसे विचारों को सही ठहराया है और उन्हें इसमें क्रूरता तक नज़र नहीं आती.

जब हम जुमे के खुत्बों में बराबरी की बातें करते हैं, तो वे सुनने में बहुत सुंदर लगती हैं, लेकिन ज़मीन पर, भेदभाव को धर्म की भाषा में जायज़ ठहराया जाता है और सबसे दर्दनाक बात यह है कि यह सब ईश्वरीय मंज़ूरी का दावा करते हुए किया जाता है.

जब अन्याय आस्था का लिबास पहन लेता है, तो उस पर सवाल उठाना बगावत कहा जाता है और चुप्पी को सहमति समझ लिया जाता है. एक पसमांदा मुस्लिम के तौर पर, मैं इस ज़ख़्म को किताबों से नहीं, अपनी ज़िंदगी के अनुभव से जानती हूं.

आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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