क्या भारतीय न्यायपालिका अनजाने में ऐसे लोगों को बढ़ावा दे रही है जो ईसाई धर्म अपना लेने के बाद भी सरकारी रिकॉर्ड में खुद को हिंदू बनाए रखते हैं, ताकि सरकार की आरक्षण और दूसरी सकारात्मक नीतियों का फायदा लेते रहें?
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने हाल के एक फ़ैसले में, जिसमें जस्टिस जस्टिस मुकुलिका जवालकर और जस्टिस नंदेश देशपांडे शामिल थे, कहा कि किसी के घर में यीशु की मूर्ति या क्रॉस का निशान होना सिर्फ़ इस बात का सबूत नहीं माना जा सकता कि उसने ईसाई धर्म अपना लिया है.
एक तरह से यह बात सही है, क्योंकि हिंदू अक्सर दूसरे धर्मों के पवित्र चिन्हों का सम्मान करने में आपत्ति नहीं करते. लेकिन अगर ईसाई धर्म अपनाने का सबूत साबित करने के लिए मानक और कड़ा कर दिया जाएगा, तो इसका मतलब है कि अधिकारियों को जांच में और ज़्यादा दखल देना पड़ेगा. चूंकि हर शक वाले मामले में ऐसा करना संभव नहीं है, इसलिए ऐसे लोग जो बाहर से हिंदू और भीतर से ईसाई हैं, उन्हें दोनों तरफ का फायदा मिल सकता है: नए धर्म से मिलने वाले लाभ भी, और उस धर्म से मिलने वाली सरकारी राहत भी, जिसके बारे में वे कहते हैं कि उसी में उनके साथ भेदभाव हुआ.
एक तरफ वे जाति व्यवस्था के लिए हिंदू धर्म की आलोचना कर सकते हैं, दूसरी तरफ वे खुद को जाति व्यवस्था का पीड़ित बताकर नौकरी और शिक्षा में आरक्षण का फायदा लेने के लिए कागज़ों में हिंदू बने रह सकते हैं.
हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि धर्मांतरण के संबंध में और अधिक सबूतों की जरूरत है, जिसमें बपतिस्मा के रिकॉर्ड या इसका प्रमाण पत्र शामिल हैं. इस बात को तो छोड़ ही दें कि सभी ईसाई संप्रदायों में किसी अनुयायी के लिए बपतिस्मा लेना अनिवार्य नहीं होता (जैसे कि क्वेकर्स और साल्वेशन आर्मी में ऐसी कोई शर्त नहीं है), लेकिन आखिर कौन सा चर्च जाति प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्राधिकारी के साथ सहयोग करते हुए यह जानकारी देगा कि किसका बपतिस्मा हुआ है और किसका नहीं?
जिस मामले पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया, उसमें अकोला के एक छात्र ने अकोला जाति जांच समिति के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसका अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया था. समिति ने कहा था कि उसके पूर्वज ईसाई बन चुके थे. छात्र ने कहा कि कोई औपचारिक धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था और वह हिंदू ही है.
एक पुराने मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के एक केस में यह तक कहा था कि किसी व्यक्ति का रोज़मर्रा की ईसाई गतिविधियों और धार्मिक प्रथाओं में शामिल होना भी यह साबित नहीं करता कि उसने ईसाई धर्म अपना लिया है.
पी. मुनीश्वरी, जो हिंदू पल्लन समुदाय से थीं, ने एक ईसाई से शादी करने के बाद अपना अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र खो दिया. शादी के बाद उन्होंने अपने बच्चों को ईसाई तरीके से पालने पर सहमति दी, चर्च जाना शुरू किया और अपने क्लिनिक में क्रॉस का निशान साफ़ तौर पर लगाया.
मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले पर टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार—जिसे जस्टिस संजीब बनर्जी और जस्टिस एम. दुरईस्वामी की दो-जजों की बेंच ने सुनाया था—बेंच ने कहा: “हलफनामे में यह नहीं कहा गया कि उन्होंने अपना धर्म छोड़ दिया है या ईसाई धर्म अपना लिया है. यह भी संभव है कि परिवार का हिस्सा होने के नाते वह अपने पति और बच्चों के साथ रविवार की प्रार्थना में जाती हों, लेकिन सिर्फ चर्च जाने से यह साबित नहीं होता कि किसी ने अपने जन्म के धर्म को पूरी तरह छोड़ दिया है.”
क्या किसी ने सच में यह जांचा कि चर्च जाने के बावजूद उन्होंने हिंदू रीति-रिवाज़ बनाए रखे थे या नहीं? यह पता नहीं है, क्योंकि इसके लिए किसी व्यक्ति की निजी ज़िंदगी में और गहरी जांच करनी पड़ती, और कोई भी राज्य इतने लोगों की निजी ज़िंदगी में इतना अंदर तक नहीं जा सकता.
एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले में एक मिशनरी संगठन के खिलाफ दर्ज कई FIR रद्द कर दीं. ये FIR एक नागरिक की शिकायत पर दर्ज हुई थीं, जिसमें कहा गया था कि लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया. उत्तर प्रदेश में धर्म परिवर्तन विरोधी क़ानून है. इस मामले में बेंच, जिसमें जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे, ने निजता का मुद्दा उठाया. बेंच ने कहा कि क़ानून में धर्म बदलने वाले हर व्यक्ति की निजी जानकारी सार्वजनिक करने की जो शर्त है, उसे और गहराई से देखने की ज़रूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि क्या यह संविधान में मौजूद निजता के अधिकार के साथ मेल खाती है या नहीं. (सुचेता द्वारा लिखे SCC Online ब्लॉग के हवाले से)
विभिन्न हाई कोर्ट के फ़ैसले और सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी व्यवहार में धर्म परिवर्तन को आसान बनाती दिखती है. दोनों हाई कोर्ट के फ़ैसलों में अधिकारियों के लिए यह साबित करना और मुश्किल कर दिया गया कि किसी ने धर्म बदला है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया कि धर्म परिवर्तन की गहरी जांच निजता पर हमला हो सकती है. इसका मतलब यह निकलता है कि राज्य किसी व्यक्ति की आस्था की बहुत गहराई से जांच न करे, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 तक अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता देते हैं.
क़ानून का रुख हिंदू हितों के खिलाफ जाता हुआ दिखाई देता है.
आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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