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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायवाती के साथ, फाइल फोटो | पीटीआई
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उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के बीच हुए गठबंधन की संभावित चुनावी सफलता पर राजनीतिक विश्लेषक अरविन्द कुमार का इस न्यूज़ पोर्टल पर 17 जनवरी को प्रकाशित लेख ‘इस बार बीजेपी के ‘जय श्रीराम’ हवा में आसानी से नहीं उड़ेंगे’ पढ़ा. अपने इस लेख में अरविन्द कुमार ने उत्तर प्रदेश में आए आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों के आधार पर बताने की कोशिश करते हैं कि क्यों सिर्फ गठबंधन बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेकने में नाकाफी है.

अरविन्द कुमार के उक्त लेख के प्रत्युत्तर में अजय कुमार यादव ने इसी न्यूज़ पोर्टल पर 21 जनवरी, 2019 को एक जवाबी लेख लिखा है, जिसका शीर्षक है, 1993 में ‘सपा-बसपा से मजबूत थी भाजपा, इस बार हवा में उड़ेंगे ‘जय श्रीराम’!


यह भी पढ़ेंः 1993 में सपा-बसपा से मजबूत थी भाजपा, इस बार हवा में उड़ेंगे ‘जय श्रीराम’!


अजय कुमार यादव विगत वर्षों के चुनावी आकड़ों और मौजूदा बीजेपी सरकार की नीतियों के आधार पर यह बताने की कोशिश करते हैं कि क्यों और कैसे गठबंधन आने वाले चुनावों में सफलता दर्ज करेगा.

अरविन्द कुमार जेएनयू में राजनीति विज्ञान के शोधार्थी हैं. उनको जवाबी लेख लिखने वाले अजय कुमार यादव भी जेएनयू के ही शोधार्थी हैं. इन दोनों के विपरीत मैं सपा-बसपा के गठबंधन का पैरोकार और समर्थक रहा हूं. इसके बावजूद मै अंधभक्त बनकर नहीं, बल्कि विश्लेषक के तौर पर कुछ तथ्य रखना चाहता हूं.

1- लोकसभा चुनाव बनाम विधानसभा चुनाव: राम मंदिर आंदोलन और मण्डल कमीशन आंदोलन के दौर 1993 में हुए जिस गठबंधन की सफलता पर बहस चल रही है, उल्लेखनीय यह है कि वह एक सूबे (राज्य) की राजनीति को दृष्टिगत रखते हुए हुआ था, यानि विधानसभा चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए किया गया था. मौजूदा दौर मे हुआ गठबंधन आने वाले लोकसभा चुनाव को प्राथमिकता में रखते हुआ है, जिसका मुख्य मकसद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को केंद्र की सत्ता से बाहर किया जाना है, यह और बात है कि दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं ने इसे आगे भी इसके जारी रहने का आश्वासन दिया है.

2. गठबंधन के पास कोई राष्ट्रीय एजेंडा नहीं: राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा बनते हुए भी आज गठबंधन के पास मोदी मैजिक को खत्म करने के लिए कोई ठोस नेतृत्व और राष्ट्रीय एजेंडा नहीं दिख रहा है, जिसकी वजह से वर्तमान भाजपा सरकार के कामकाज से असंतुष्ट रहने के बावजूद बड़ी संख्या में मतदाता इस गठबंधन और इसके नेताओं से जुड़ता हुआ नहीं दिखता. मतदाताओं को यह गठबंधन कोई उम्मीद नहीं दिखा रहा है. वो यह नहीं कह रहा है कि सरकार में आने पर क्या-क्या करना चाहता है.

3- विश्वसनीयता का संकट: अगर बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए किसी पार्टी या नेता को वोट दिया जाता है, तो क्या गारंटी है वह पार्टी या नेता केंद्र की सत्ता पर विराजमान ही होगा, जिसे उसने अपना मत दिया. इस बात की भी क्या गारंटी है कि चुनाव बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरण में, नरेंद्र मोदी/बीजेपी विरोध के नाम पर चुना गया नेता नरेंद्र मोदी या फिर बीजेपी को ही समर्थन न कर दे. ऐसा हाल फिलहाल में बिहार में हो चुका है, जहां नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर मोदी/बीजेपी के खिलाफ वोट मांगा, और बाद में लालू प्रसाद यादव को धोखा देकर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली.

4- ज़मीनी एकता बनना बाकी: सपा और बसपा के बीच यूपी में बने इस गठबंधन का मूल उद्देश्य भले ही राष्ट्रीय स्तर पर सरकार बनाना है, लेकिन इसको ज़मीनी स्तर पर मज़बूत बनाने के लिए काफी कुछ करना पड़ेगा. इस गठबंधन की सफलता दोनों दलों के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ता की मेहनत और लगन पर काफी कुछ निर्भर करेगी, क्योंकि उनको अपने पुराने राजनीतिक या व्यक्तिगत विद्वेष भुलाकर अपने शीर्ष नेताओं के आदेश का ईमानदारी से पालन करना है. शीर्ष स्तर के नेताओं में तो यह आसानी से हो जाता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसको लागू करना टेढ़ी खीर साबित होता है.

5- पिछले शासन की बुरी यादें: अगर बसपा के मतदाता की बात की जाये तो उसका एक धड़ा अमूमन यह कहता है कि दलितों के लिए अत्याचार, अपमान, असमानता आदि में कोई कसर अखिलेश राज में भी नहीं छूटी थी. बहुजन महापुरुषों और उनके विचारों के आधार पर बने जनपदों, योजनाओ और विश्वविद्यालयों के नाम में परिवर्तन अखिलेश यादव की ही सरकार में हुए. आठवीं के बालकों तथा उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु गरीब छात्राओं को मिलने वाली ‘सावित्रीबाई बालिका शिक्षा मदद योजना’ को जिस प्रकार अखिलेश राज मे बंद करते हुए दलित उत्पीड़न और तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा दिया गया, इससे दलित मतदाताओं में संदेश गया है कि अखिलेश सरकार भी भाजपा सरकार की ही भांति दलित विरोधी रही है. अपनी इस इस छवि को सही करने के लिए अखिलेश यादव के पास बहुत ही कम वक्त है.


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6. बहुजन आंदोलन की वैचारिक प्रखरता का अंत: आखिरी बात, संपूर्ण भारत समेत उत्तर प्रदेश में मान्यवर साहब कांशीराम ने दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, मुसलमानों, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित तबकों के राजनीतिक उत्थान लिए जो बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्मुनिटीज़ एम्प्लॉयीज़ फेडरेशन (बामसेफ), दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसफोर) तथा बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) बनाई उस सब की स्थापना काल तथा बाद के कुछ वर्षों तक बहुजन विचारधारा खूब फली फूली और सत्ता पा लेने पर यह विचारधारा सफल होती प्रतीत हुई. मान्यवर साहब कांशीराम और अन्य बहुजन पुरोधाओं नें राजनीतिक आंदोलन के लिए बहुजन समाज पार्टी रूपी जो बीज इस भारतीय भूमि पर रोपा था, वह अपने अकुंरण काल से लेकर पूर्ण पौधे के रूप विकसित होकर 2007 में दिखाई पड़ा, जब उत्तर प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार आई. परन्तु सरकार चलाने के दौरान (2007-2012) बहुजन नेताओं ने खासकर सक्षम हुए दलित समाज के नेताओं ने पार्टी संगठन रूपी उस पौधे का कोई खास ध्यान नहीं दिया, जिसकी वजह से यह पौधा एक विशाल छायारूपी वृक्ष बनने से पहले ही मुरझा सा गया. मुरझा जाने की वजह से यह पौधा विगत कई वर्षों से समाज के गरीबों, वंचितों और मज़लूमों को अपनी छाया और सुरक्षा के लिए आकर्षित नहीं कर पा रहा है, और इतना ही नहीं उसकी छाया में बैठे लोग दिन-ब-दिन उठकर जा रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर कमियां गठबंधन चाहे तो दूर हो सकती हैं. लेकिन इसके लिए समय कम हैं और फिर इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी.

(लेखक अंबेडकरवादी सामाजिक न्याय के आंदोलन से जुड़े हुए हैं)


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