Tuesday, 5 July, 2022
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प्रेमचंद के ‘नमक का दारोगा’ वाली स्थिति अभी तक बदली नहीं है, सुनीता यादव के प्रकरण को भी उसी नज़र से देखा जाए

सोशल मीडिया का भला हो कि मंत्री के समर्थकों व बेटे से हुई उसकी बातचीत का ऑडियो वायरल होते ही लोग खुलकर सुनीता का सपोर्ट करने लगे.

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देश का मीडिया उत्तर प्रदेश में कानपुर के चौबेपुर थाना क्षेत्र के बिकरू गांव में दुर्दांत विकास दुबे और उसके गुर्गों द्वारा आठ पुलिसकर्मियों की नृशंस हत्याओं, फिर मध्य प्रदेश के उज्जैन में तिलिस्म जैसी गिरफ्तारी के बाद कानपुर में भौंती के पास रहस्यमय एनकाउंटर में उसके खुद के मारे जाने जैसे मामलों में उलझा हुआ था, इसलिए हम गुजरात के सूरत शहर की कर्तव्यपरायण महिला पुलिस सिपाही सुनीता यादव के बारे में यथासमय और ठीक से नहीं जान पाये.

कहने वाले कह सकते हैं कि मीडिया न उलझा हुआ होता तो भी जैसी उसकी हालत हो गई है, उसके चलते वह सुनीता की कर्तव्यपरायणता की खुलकर प्रशंसा शायद ही कर पाता. लेकिन उसके उलझाव के कारण सुनीता की चर्चा कुछ सोशल मीडिया मंचों और अखबारों तक ही सीमित रह गई. अलबत्ता, उनमें से कई ने उसे ‘लेडी सिंघम’ की उपाधि से भी नवाजा.

खबरों के अनुसार गत 8 जुलाई की रात साढ़े दस बजे सुनीता सूरत के मंगध चौक पर ड्यूटी कर थी तो उसने देखा कि राज्य के स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री किशोरभाई कानानी के पांच समर्थक बिना मास्क लगाए घूम रहे हैं. उसने उन्हें रोका, लाॅकडाउन याद दिलाया और नाइट कर्फ्यू में बिना मास्क लगाये घूमने को लेकर एतराज किया, तो उन्होंने मंत्री के बेटे को बुला लिया. लेकिन बेटे द्वारा रौब गालिब करने की कोशिश और उसके साथी के अभद्र व्यवहार के बावजूद सुनीता झुकी नहीं. उलटे कहा कि वह न सिर्फ नाइट कर्फ्यू तोड़ रहा है बल्कि मंत्री की गाड़ी का दुरुपयोग भी कर रहा है, जबकि उसको सबसे पहले नियम का पालन करना चाहिए.

इतना ही नहीं, बेटे ने बाप से बात कराई तो उन्हें भी पूरी बात बताई. राज्यमंत्री ने भी अपने बेटे का ही पक्ष लिया तो पुलिस स्टेशन कॉल करके वहां के इंस्पेक्टर को पूरा मामला बताया गया. इंस्पेक्टर ने भी उसका साथ देने के बजाय माफी मांगने और घर जाने का आदेश दे दिया तो सुनीता ने हारकर अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया.


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भला हो सोशल मीडिया का कि मंत्री के समर्थकों व बेटे से हुई उसकी बातचीत का ऑडियो वायरल होते ही लोग खुलकर उसे सपोर्ट करने लगे. तब मामले की जांच के आदेश दिये गये और मंत्री के बेटे व उसके दो दोस्तों को कर्फ्यू के उल्लंघन में गिरफ्तार कर उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 188, 269, 270 और 144 के तहत भी केस दर्ज किया गया. अलबत्ता, बाद में उन्हें जमानत मिल गई.

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फिलहाल सुनीता का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है और कहा जा रहा है कि वह छुट्टी पर चली गई हैं. हम जानते हैं कि कई बार ऐसी छुट्टियां भी कर्तव्यपरायणता की सजा के तौर पर ही स्वीकृत की जाती हैं.

लेकिन इस मामले को दूसरे पहलू से देखें तो सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इस देश में आम लोगों को छोड़ दीजिए, जिनकी आवाज लगातार दबाई जाती रहती है, तो इशारों और उंगलियों पर नाचने का विरोध करने और महज कर्तव्य निर्वहन में यकीन रखने वाली पुलिस किसी को भी अच्छी नहीं लगती. न पुलिस और प्रशासन के बड़े अधिकारियों को, न सत्ताधीशों को और न ही उनकी नजदीकी का लाभ उठाने वाले प्रभुवर्गों को. इस सिलसिले में किन्हीं एक या दो सरकारों के नाम लेना बेकार है, वे किसी भी दल या विचारधारा की क्यों न हों लेकिन सबसे ताजा मिसालों पर जायें तो न उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इसकी अपवाद है और न गुजरात की विजय रूपाणी सरकार.

तभी तो राज्यमंत्री किशोरभाई कानानी ने सुनीता के कर्तव्य निर्वहन को अन्यथा लिया ही, पुलिस के सीनियर इंस्पेक्टर और अफसर भी उसके साथ नहीं खड़े हुए. उलटे कह दिया कि वहां उसकी ड्यूटी नाइट कर्फ्यू तोड़ने वालों पर निगाह रखने के लिए नहीं बल्कि यह देखने के लिए लगाई गई थी कि कोई हीरा या टेक्सटाइल यूनिट न खुले. बाद में जिस तरह उसे माफी मांगने व घर जाने को कहा गया, उसकी तैनाती की जगह बदली और इस्तीफे के बाद छुट्टी पर भेजा गया, उससे मंत्री के बेटे की यह धमकी प्रकारांतर से सही ही सिद्ध हुई कि वह चाहे तो सुनीता को साल के 365 दिन उसी जगह खड़ा रख सकता है. उसने ऐसी परिस्थितियां तो पैदा ही कर दीं कि सुनीता को अपनी नौकरी दांव पर लगा देनी पड़ी.

अपने विभाग के अन्दर-बाहर वह जिस तरह ‘असुविधा का कारण’ बन गई है, यह मानने के कारण हैं कि उसके चलते आगे पीछे उसकी सारी ‘कुंडली’ खंगाली जाये और कहीं भी उसकी कर्तव्यनिष्ठा तनिक भी कमजोर मिल जाये तो नये सिरे से जांच वगैरह के नाटक के बहाने उसे चलता कर दिया जाये. फिर हम भारतीयों के साथ जुड़ी यह विडंबना उसकी कर्तव्यनिष्ठ सिपाही वाली छवि भी बदल डाले कि पतित और भ्रष्ट तबके चाहे जितने नीचे गिरते रहें, हमारे नायकों को सर्वथा निष्कलंक होना चाहिए. हम जानते हैं कि हमारी इस विडंबना का लाभ अंततः पतित तबकों को ही हासिल होता है, लेकिन हमारा यह नज़रिया है कि बदलने को ही नहीं आता.


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लेकिन सुनीता ने इतना तो जताया ही है कि अभी न सारे कुएं में भांग पड़ी है, जैसा कि कई पतित तबके दावा करते हैं और न वह भारत माता (जिसके जयकारे लगाने के बावजूद वे उसके बारे में ठीक से जानते नहीं हैं) बांझ होकर रह गई है कि निरंकुश सत्ता-संस्कृति के प्रतिरोध की राह एकदम से वीरान होकर रह जाये. हां, यह सारा मामला यह साबित करने के लिए भी पर्याप्त है कि देश के सत्ताधीश और प्रभुवर्ग और तो और कोरोना से जंग को लेकर भी कितने अगम्भीर हैं और उसका संक्रमण रोकने के लिए जरूरी एहतियातों के पालन में कितने ‘ईमानदार’ हैं.

प्रसंगवश, हमारे देश में अरसे से लंबित पुलिस सुधारों को लेकर लम्बी चौड़ी बातें तो प्रायः की जाती रहती हैं लेकिन उसके कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारियों का संरक्षण सुनिश्चित करने के उपायों की बाबत कुछ नहीं कहा जाता. कभी कहा भी जाता है तो नक्कारखाने में तूती की आवाज होकर रह जाता है. इसलिए कि पहले से चले आ रहे ढर्रे को बदलने में किसी भी स्तर पर कोई दिलचस्पी नहीं ली जाती. पुलिस की जानबूझकर गढ़ी और मजबूत की जाती रही खराब छवि की सबसे ज्यादा कीमत भी उसके कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी ही चुकाते हैं. वे कर्तव्य की वेदी पर शहीद हो जायें तो उनके लिए वैसी सद्भावनाओं का शतांश भी नहीं उमड़ता जैसा सेना के जवानों की शहादत के वक्त उमड़ता है.

यही कारण है कि प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानी ‘नमक का दारोगा ’ के दारोगा मुंशी वंशीधर की नियति अभी भी बहुत नहीं बदली है. उसे नमक के घाघ कारोबारी अलोपीदीन को शिकंजे में कसने की सजा भुगतनी ही पड़ती है. पहले मजिस्ट्रेट अपनी तजवीज में उसे उद्दंड, विचारहीन और विवेक व बुद्धि से भ्रष्ट ठहराता है, फिर उसका अंजाम मुअत्तली के परवाने के रूप में सामने आता है. इतना ही नहीं, आखिरकार हालात ऐसे बन जाते हैं कि उसे कांपते हाथों और डबडबाई आंखों से उसी कारोबारी के साम्राज्य की मैनेजरी करनी पड़ती है.

एक देश के तौर पर जब तक हम उसकी या सुनीता यादव की नियति नहीं बदलते, कैसे कह सकते हैं कि हमें अच्छा पुलिस तंत्र पाने का अधिकार है या कि हम उसके लिए डिजर्व करते हैं. लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास ने इस सिलसिले में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी से ठीक ही पूछा है कि देश व प्रदेशों में सिर्फ सरकारें बदलती रहेंगी या कभी सत्ता का चरित्र भी बदलेगा, जो न सिर्फ पुलिस की कर्तव्यनिष्ठा को लेकर फैले नाना संदेहों को दूर करेगा बल्कि प्रभुवर्गों की उस पहुंच का भी उन्मूलन करेगा जो उन्हें किसी पुलिसकर्मी को यह कहकर धमकाने की हिमाकत तक ले जाती है कि वे उसे कहीं भी 365 दिन खड़ा रख सकते हैं.

(लेखक जनमोर्चा अख़बार के स्थानीय संपादक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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1 टिप्पणी

  1. मेरा सिर हमेशा गर्व से ऊंचा और सीना हमेशा उसमें अपार शक्ति के निहित होने के एहसास से चौड़ा हो जाता जब कभी भी आज के इस इतने गिरे हुए और भ्रष्ट सिस्टम में कोई देशवासी, एक साधारण नागरिक की हैसियत से या अपनी ड्यूडी करते हुए, कर्तव्यपरायणता, ईमानदारी, सच्चाई और ऐसे ही- मानवीय जीवन को क़ाएम रखने हेतु ज़रूरी- तत्वों/गुणों का निर्वाह करने का साहस करता है, और ऐसा करने की बड़ी क़ीमत चुकाते हुए एक विशाल से और न भेद पाने जैसे लगने वाले निरंकुश तंत्र में बला का ख़ौफ़ पैदा कर देता है, कि जिस ख़ौफ़ को ढकने के लिए पूरा तंत्र एक जुट होकर लग जाता है। मगर एक दिन न सिर्फ़ अपने भारत देश में बल्कि हर जगह न्याय का राज्य क़ाएम होगा, ऐसा मेरा अडिग और अटूट विश्वास है। सुनीता यादव को निष्ठा से भरे, कई कई सैल्यूट। मैं ख़ुद भी जहां हूं वहां पर उपरोक्त मूल्यों को पालने के तत्पर रहता हूं। धन्यवाद।

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