news on shashi tharoor narendra modi and abusive language
कांग्रेस सांसद शशि थरूर. (फाइल फोटो: गेटी इमेजेज)
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अपने को निचले तबके का कहने वाले प्रधानमंत्री मोदी से लेकर अमेरिका में पढ़े शशि थरूर तक की ज़बान का अनियंत्रित होना चिंता का विषय है.

राजनीतिक बहस की भाषा असंसदीय हो चुकी है. और ये ट्रेंड पिछले कुछ सालों से बढ़ा है. सोशल मीडिया के आने और प्रचार के अनेकानेक साधन जैसे जैसे बढ़े हैं, नेताओं की भाषा भी गिरी है. आजकल वाकबाणों का सबसे ज़्यादा सामना प्रधानमंत्री मोदी को करना पड़ता है.

पर अगर आप पिछले कुछ सालों पर नज़र डालें तो मोदी पर कहे गए हर अपशब्द का स्वयं मोदी और उनकी पार्टी ने भरपूर प्रयोग किया है. विपक्ष के बोल एक तरह से उन्हीं पर बूमरेंग हुए हैं.

कई बार तो इससे संशय पैदा होता है कि कहीं ये लोग मोदी के इशारों पर तो काम नहीं कर रहे.


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हालिया बयानों पर थोड़ा नज़र डालते हैं. पहले चलते हैं पिछले लोकसभा चुनावों के आस पास और उससे भी कुछ पहले.

आप को याद होगा कि 2007 में सोनिया गांधी ने मोदी को ‘मौत का सौदागर’ क्या कहा, गुजरात चुनावों की हवा बदल गई थी और उनके इस बयान को हर रैली में मोदी और भाजपा ने दोहराया और जनता की सहानुभूति बटोरी.

पिछले साल गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव में विपक्ष का पलड़ा भारी लग रहा था. युवा नेता हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर आदि ने कांग्रेस में नई जान फूंक दी थी. पर फिर वरिष्ठ कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी की राजनीति को ‘नीच’ स्तर का बताया. और इसके लिए उन्हें चाहे पार्टी से निकाला गया हो पर तब तक मोदी ने विक्टिम कार्ड खेल डाला. हर रैली में वे विपक्षी नेताओं द्वारा उनके खिलाफ कहे गए अपशब्द गिनाते रहें. मोदी अपने भाषणों में कहते हैं, ‘कांग्रेस के नेताओं ने मुझे कभी चायवाला, नीच, पागल कुत्ता, भस्मासुर, रावण, नाली का कीड़ा, सांप-बिच्छू और न जाने क्या-क्या कहा.’

वे रैलियों में पूछते ‘क्या मैं गरीब घर में जन्मा हूं, इसलिए नीच हूं? क्या मैं लोवर कास्ट से आता हूं, इसलिए नीच हूं? कांग्रेस के नेता मुझसे नफरत क्यों करते हैं?’

कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने कहा थी कि ‘वे मादी के टुकड़े टुकड़े’ कर देंगे. रेणुका चौधरी ने उन्हें ‘नमोनाइटिस’ लाने वाला ‘वायरस’ कहा. जयराम रमेश ने उन्हें ‘भस्मासुर’ तो दिग्विजय सिंह ने उनहे ‘रावण’ कह डाला. गुलाम नबी आज़ाद की भी ज़ुबान फिसली और उन्होंने मोदी को ‘गंगू तेली’ बुला दिया. मोदी को प्रमोद तिवारी ने ‘हिटलर, मुसोलिनी और गद्दाफी’ तक कह डाला.

और अपशब्दों की फेरहिस्त केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है. राष्‍ट्रीय लोकदल पार्टी के नेता अजित सिंह ने नरेंद्र मोदी को ‘बकरी’ बुलाया जो अपने भाषणों में मैं…मैं शब्‍द का प्रयोग करते रहते हैं.


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अभिषेक मनु सिंधवी ने मोदी को ‘सीरियल अब्यूजर’ बताया और कहा कि उनकी आदत गाली गलौच करने की है. सिंघवी ने कहा, ‘भाजपा अशिष्ट, अशोभनीय, अपमानजनक बयानों की जननी है. निरंतर आपत्तिजनक बयानबाज़ी करने वाली बीजेपी ने आज तक अपनी किसी भी अभद्र टिप्पणी के लिए माफी नहीं मांगी है.’ उनका आरोप था कि मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘नाइट वाचमैन’, कांग्रेस नेता सोनिया गांधी को ‘जर्सी गाय’ तथा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘संकर बछड़ा’ बताया था. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को ‘दीमक’ करार दिया था.

और अब तो लग रहा है कि एक रणनीति के तहत ये किया जा रहा है. शायद कांग्रेस और विपक्ष को लग रहा है कि कि अपशब्द का इस्तेमाल कर वे मोदी के खिलाफ हवा बना पायेंगे. राहुल गांधी अब चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री को ‘चोर’ बता रहे हैं. राजस्थान की चुनाव रैलियों में ये बात उन्होंने बार बार दोहराई तो अब इस सूची में शशि थरूर भी शामिल हो गये हैं.

शशि थरूर ने अपनी किताब ‘द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’ में किसी अनाम आरएसएस सदस्य को उद्धत करते हुए कहा, ‘मोदी शिवलिंग पर बैठे उस बिच्छू की तरह हैं, जिसे आप हाथ से हटा नहीं सकते और चप्पल से मार भी नहीं सकते.’ वहीं पटना में एक रैली में गुजरात से स्वतंत्र विधायक जिग्नेश मेवाणी ने नौ मिनट के अपने भाषण में मोदी पर छह बार अपशब्द कहे. उन्हें ‘नमक हराम’ बताया.

यानि गाली गलौच की राह चुनावी समर जीतने का औज़ार बन गया है. ऐसा नहीं कि बीजेपी और मोदी को इसमें कम महारत हो- ‘जर्सी गाय’ जैसे संबोधन आज भी सबको याद हैं. पर जिस तेज़ी से अमर्यादित बोल को स्वीकार किया जा रहा है और वे राष्ट्रीय संवाद का हिस्सा हो रहे हैं वो राजनीतिक क्षेत्र में पतन की ओर इशारा करता है. तहज़ीब तेल लेने गई है और बेशर्मी आम हो गई है. कभी आप किसी को सभ्यता से पेश आते सुनेंगे तो आपको वो भी फीका लगेगा.

मोदी की हालिया बयानों पर चुप्पी से अंदेशा हो रहा है कि जब आगामी चुनावों में जब वे प्रचार पर उतरेंगे तो इन सभी बयानों के सहारे अपने पक्ष में हवा बनाने की कोशिश करेंगे. पर क्या उनका विक्टिम कार्ड इस बार चलेगा या फिर उनका जादू अब फीका पड़ रहा है और जनता के बीच उनका अपमान नाराज़गी की जगह जनता के मन की बात की प्रतिध्वनि बन के उभरेगा. नतीजा जो भी हो राजनीति के ये बोल सुखद संकेत तो कतई नहीं देते और शायद आगे चलकर समाचार प्रसारित करने वालों को यह नोट भी लगाना पड़ेगा कि यह यह भाषण केवल वयस्कों के लिए है!


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