Saturday, 2 July, 2022
होममत-विमतममता और नरेंद्र मोदी से बहुत बड़ा है भारत देश और संविधान

ममता और नरेंद्र मोदी से बहुत बड़ा है भारत देश और संविधान

अगर हम ये मान भी लें कि केंद्र सरकार की चिंता चिट फंड घोटाले के आरोपियों को सजा दिलाना है तो भी ये लड़ाई देश के संवैधानिक ढांचे के अंदर ही होनी चाहिए.

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सीबीआई और पश्चिम बंगाल में सरकार के बीच चल रही तनातनी इस समय सुर्खियों में है. हमारी चिंता इस प्रसंग के दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर है, क्योंकि इस विवाद का असर देश की अखंडता और संघीय ढांचे पर हो सकता है. इस मामले में संविधान हमें रास्ता दिखाता है.

सबसे पहले तो ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हम शारदा चिट फंड स्कैम से जुड़े मामले में किसी भी पक्ष को दोषी या दोषमुक्त मानने की स्थिति में नहीं हैं. यदि इस भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोपी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ या तृणमूल छोड़ कर भाजपा में गए नेताओं के खिलाफ जांच या कार्रवाई होती है तो किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?


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भ्रष्टाचार के हर मामले में जांच होनी ही चाहिए. राफेल सहित सभी मामलों में. राफेल में अगर कीमत को लेकर कोई विवाद है और दिवालिया हो रहे अनिल अंबानी को राफेल विमान बनाने वाली दासो का ऑफसेट कॉन्ट्रेक्ट मिला है तो वैसे मामले को शक के दायरे से बाहर लाने के लिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) गठित करने की मांग को भी माना जाना चाहिए, जैसे कि बोफोर्स मामले में हुआ था.

हम वापस अपनी दीर्घकालिक चिंता पर आते हैं. वो है देश की एकता की चिंता. राष्ट्रीय एकता की चिंता! क्योंकि राष्ट्रीय एकता की चिंता का अधिकार केवल सरकारी पक्ष को नहीं है.

ताजा घटनाक्रम से ऐसी आशंका होती है कि कहीं केंद्र सरकार को सलाह देने वाले लोग, चाहे वो भाजपा के हैं या सिस्टम के अंदर के अफसर या सलाहकार, वो सरकार को खुश करने के लिए देश के दीर्घकालिक हितों को नज़रअंदाज़ तो नहीं कर रहे? ये कहना मुश्किल है कि उन्हें सचमुच ये पता ही नहीं होगा कि एक केंद्रीय एजेंसी द्वारा एक राज्य के पुलिस चीफ के विरुद्ध इस किस्म की कार्रवाई के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं.

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इस पूरे प्रकरण में एक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि केंद्र ने अपनी जिस संस्था यानि सीबीआई को कार्रवाई के लिए हरी झंडी दी, उसकी विश्वसनीयता इस समय रसातल में है और इसकी विश्वसनीयता को रसातल में पहुंचाने में सरकार ने भी भूमिका निभाई है. एक ऐसी संस्था, जिसके वरिष्ठता में नंबर दो के अफसर पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप उसी संस्था के शीर्ष अफसर ने हाल ही में लगाए हों, और जो संस्था ऐसे तमाम विवादों से घिरी हो, उसे इस बात की हरी झंडी देना कि वह एक राज्य के सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का घर घेर कर पूछताछ करने पहुंच जाये, कहां तक व्यवहार्य और स्वीकार्य हो सकता है? सीबीआई के लिए इस विवाद का इससे बुरा समय कोई और नहीं हो सकता था.

अगर केंद्र सरकार के सलाहकारों ने संविधान सभा की संघीय ढांचे पर हुई बहसों को विस्तार से न भी पढ़ा हो तो भी अपने स्कूल के समय से पाठ्य पुस्तकों में तो शुरू से पढ़ते रहे होंगे कि विविधताओं से भरपूर इस देश ने, ऐसी विविधताएं जिन पर हम सबको नाज़ है, संघीय ढांचे को क्यों चुना था. इस व्यवस्था में राज्य को केंद्र के अधीन नहीं रखा गया है, बल्कि दोनों के अधिकारों का विभाजन किया गया है और इसके लिए अलग-अलग लिस्ट बनाई गई है.

इसलिए यह मानना बहुत मुश्किल है कि उन्हें ये न मालूम हो कि उनके इस किस्म के रवैये से, जिसे कई लोग केंद्र की दादागीरी का रवैया बता सकते हैं, देश के संघीय ढांचे को नुकसान हो सकता है.

फिलहाल बिना ये चिंता किए कि शारदा चिट फंड स्कैम या रोज़ वैली चिट फंड स्कैम में ममता बनर्जी के पार्टी के लोग या उनके राज्य के सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जिन्हें सीबीआई अपने शिंकजे में कसना चाहती है, दोषी हैं या नहीं – हमारी चिंता सिर्फ ये है कि हमारी राजनीति का स्तर इतना क्यूों गिर गया है कि हम बिना देश-हित की चिंता किए, सिर्फ अपने ओछे राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं?

अगर सिर्फ भ्रष्टाचार की चिंता होती तो केंद्र सरकार अधिक कानून-सम्मत नजर आते हुए भी ये काम कर सकती थी. पांच वर्ष पुराने इस केस में अगर हाल की कार्रवाई राजनीति से प्रेरित नहीं थी तो केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जाकर भी इस मामले में हस्तक्षेप का अनुरोध कर सकती थी. ताजा घटना न सिर्फ जल्दबाज़ी में की गई बदले की कार्रवाई लगती है, बल्कि उसे बहुत आसानी से केंद्र द्वारा एक राज्य के विरुद्ध द्वेषपूर्ण कार्रवाई के रूप में भी पेश किया जा सकता है. और ऐसा किया भी जा रहा है.

ऐसा लगता है कि मौजूदा कार्रवाई का आदेश देने वालों को या इसको हरी झंडी देने वालों को ये अंदाज़ होगा ही कि वो क्या कर रहे हैं! अगर ऐसा है तो क्या ये माना जाए कि उन्होंने अब ये तय कर लिया है कि इस संविधान का नाम जपते-जपते ही इसको अप्रभावी बनाने के प्रयास करने हैं?


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यह भी हो सकता है कि किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने की अदम्य आकांक्षा ने दिल्ली में सत्ता के करीब के लोगों को स्थिति की इस गंभीरता का एहसास ही न होने दिया हो. अगर सचमुच ऐसा है तो फिर इस सरकार के समर्थकों को और भाजपा और संघ में देश की एकता की चिंता करने वाले लोगों को आगे आना होगा और सत्ता पर काबिज गुट के कंधे झिंझोड़ कर ये बात कहनी होगी कि बस अब बहुत हुआ!

उन्हें बताना होगा कि कभी-कभी दीर्घकालिक देश-हित में न केवल पार्टी के हितों की बलि दी जानी चाहिए, बल्कि यदि भ्रष्टाचार को रोकने की भी चिंता है तो उसमें कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए, जिससे देश का संवैधानिक ढांचा बचा रहे. मौजूदा केस में वैकल्पिक रास्ता ढूंढ़ना बेहतर होता.

(लेखक मीडिया विषयों के जानकार हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं.)

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