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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह. (फोटो: अरुण शर्मा/हिंदुस्तान टाइम्स वाया गेटी इमेजेज)
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बंगाल के मालदा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चुनावी रैली कर रहे है. लंबे समय से भाजपा की कोशिश रही है कि वो बंगाल में रथ यात्रा निकाल सके पर ममता सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी. फिर मालदा में अमित शाह के हैलिकॉप्टर की लैंडिग की अनुमति पर भी विवाद हुआ.

पर आखिर क्या कारण है कि तृणमूल कांग्रेस शासित पश्चिम बंगाल में भाजपा को इतनी रुचि है और क्यों ममता भाजपा को बंगाल से दूर रखना चाह रहीं हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दावा कर चुके है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल की 42 में से 22 सीटें आगामी लोकसभा चुनाव में जीतेगी. ये दावा कितना चौंकाने वाला है इसका अंदाज़ा इस बात से होता है कि पार्टी को 2014 में राज्य की केवल 2 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी.

पर भाजपा की नज़र पूरे पूर्वोत्तर भारत पर है और बंगाल के किले को भेदने में मदद वामदल और कांग्रेस के राज्य में पतन होने से मिल रही है. भाजपा को चाहे 2014 में दो सीटें ही मिली हों पर उसका राज्य में वोट प्रतिशत बढ़ कर 16.8 प्रतिशत हो गया था.

वहीं तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटें 2014 में जीती थी. पार्टी ने 2006 से वामदल को जो बंगाल के 30 साल के शासन के बाद उखाड़ा, आज सीपीआईएम वापिस सत्ता में लौटने का सपना भी नहीं देख सकती. उसका काडर छिटक गया है और उसकी बूथ मैनेजमेंट की कला में तृणमूल ने महारत हासिल कर ली है. जो वाम काडर का डर दिखता था वही अब ममता की पार्टी के काडर का दिखता है. यानि बंगाल की राजनीति में फिलहाल तृणमूल पार्टी और बनर्जी की लोकप्रियता के ज़्यादा घटने के कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं.

भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में गए चंदन मित्रा भी 22 सीटों के अमित शाह के दावे को खारिज करते है. वे इसे असंभव टारगेट बताते है. पर भाजपा नेताओं की माने तो आरएसएस की जड़े राज्य में मज़बूत है और पार्टी राज्य में धीरे-धीरे अपनी ज़मीन तैयार कर रही है.

फिर भी भाजपा का वोट बैंक उत्तर और ग्रेटर कोलकाता क्षेत्र में ही ज़्यादा था. और आज भी ये राज्य में मध्य वर्ग की पार्टी बनी हुई है. हालांकि पार्टी की कोशिश है कि नीचे तबके में अपनी पहुंच बढ़ाए. पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के भाजपा से दशक पुराने गठबंधन को तोड़ने की घोषणा के बाद उत्तर की चार सीटों पर सीधे असर डालेगा. यह जनमोर्चा का प्रभाव क्षेत्र है और उसके बिना कोई पार्टी यहां चुनाव नहीं जीत सकती.

साथ ही तृणमूल कांग्रेस के मां माटी मानुष की काट भाजपा को अभी भी नहीं मिली है. भाजपा, ममता बनर्जी पर लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप भी लगा रही है. वहीं हिंदुत्व का पार्टी स्वयं इस्तेमाल करने की भरपूर कोशिश कर रही है. राज्य में काली पूजा, राम नवमी, हनुमान जयंती जैसे कई आयोजनों में पार्टी के शस्त्र रैली, जलसे आदि निकालने को लेकर विवाद रहे है.

पर क्या राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और मोदी के नाम पर बंगाल के किले में भाजपा सेंध लगा पायेगी? या उसको भी मुस्लिम वोट में सेंध की ज़रूरत होगी. पार्टी का मानना है कि 2018 में पंचायत चुनाव में बंगाल में ममता ने 2 करोड़ मतदाताओं को बाहर रखा, 34 प्रतिशत सीटों में कोई कंटेस्ट ही नहीं हुआ. अगर इसके आधे भी 2019 के चुनावों में मत डालते है तो नज़ारा बदला हुआ होगा. पार्टी जानती है कि उत्तर प्रदेश और बिहार की उसकी दिक्कतों के मद्देनज़र बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां अगर वो सफल होती है तो अगले चुनाव में 200+ के ध्येय को पूरा करने का उसका लक्ष्य यथार्थ में बदल सकता है. ममता बनर्जी को भी पता है कि उसका राज्य में दुश्मन नं 1 अब भाजपा है – वाम और कांग्रेस नहीं हैं.


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