भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा बड़े स्तर पर कृषि आयात के लिए दरवाजा खोलना है—यह पिछले कई दशकों से भारतीय सरकारों के लगातार रुख के उलट है. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने हमें सस्ते रूसी तेल के आयात को धीरे-धीरे खत्म करने के लिए भी दबाव डाला है—जबकि चीन अपने आयात बढ़ा रहा है.
मोदी सरकार इन समझौतों को अपने नागरिकों को कैसे समझाती है? सच से बचकर, तथ्यों से बचते हुए और सच्चाई को भाषण और विपक्ष के खिलाफ आरोप लगाकर छिपाने की कोशिश करके.
यह सही है, जितना कि किसी “अंतरिम समझौते के ढांचे” के बारे में सही कहा जा सकता है, कि डेयरी, पोल्ट्री, चावल, गेहूं, कपास, मक्का और सोयाबीन जैसे सेक्टर नहीं खोले गए हैं. सीधा खुलापन मुख्य रूप से अमेरिकी सेब और पेड़ पर उगने वाले मेवों (जैसे बादाम और अखरोट) के आयात में हुआ है—यह हिमाचल प्रदेश, कश्मीर और उत्तराखंड के किसानों के लिए खराब खबर है. लेकिन यह दावा जितना दिखाता है, उतना ही छिपाता भी है.
अमेरिकी कृषि आयात के लिए एक पिछला दरवाजा खोल दिया गया है, जो भारत के मक्का, सोयाबीन और ज्वार किसानों के लिए बुरी खबर है. और अगर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की बात मानें, तो भारत के कपास किसानों के लिए भी. भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में “अतिरिक्त उत्पादों” का भी ज़िक्र है, जिनका नाम नहीं बताया गया. व्हाइट हाउस की जल्दी में बदली गई फैक्ट शीट को देखें, तो दाल उगाने वाले भारतीय किसान अगला निशाना हो सकते हैं.
ऐसा क्यों? क्योंकि बिना शुल्क (या कम शुल्क) के सूखे डिस्टिलर ग्रेन विद सॉल्युबल्स (डीडीजीएस), सोयाबीन तेल और रेड सॉरघम के आयात की घोषणा से बड़े स्तर पर ऐसे सामानों के आयात का रास्ता साफ हो गया है, जो मक्का, सोयाबीन और ज्वार के विकल्प हैं या उनसे बने प्रोडक्ट हैं. डीडीजीएस (मक्का से बना एक उत्पाद) और रेड सॉरघम का इस्तेमाल पशु चारे में होता है, जिसकी भारत में अभी कमी है. यह पोल्ट्री और पशुपालन किसानों के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन अगर चारा बिना रोक-टोक आयात होगा, तो देश में उगाए गए मक्का और ज्वार का बाजार छोटा हो जाएगा. इसी तरह, खुले तौर पर सोयाबीन तेल का आयात महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के सोयाबीन किसानों के भविष्य को नुकसान पहुंचाएगा.
दाल के आयात बढ़ने की संभावना सबसे ज्यादा चिंता की बात है. यह सच है कि दाल का आयात नया नहीं है और जब देश में कमी होती है, तब पहले भी आयात होता रहा है. लेकिन जरूरत के समय आयात और लगातार बिना शुल्क आयात की अनुमति देने में फर्क होता है. याद करें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 11 अक्टूबर 2025 को ‘दालों में आत्मनिर्भरता मिशन’ शुरू किया था, जिसमें 11,440 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था और जिसका ध्यान तूर (अरहर), मसूर और उड़द दाल पर था. सिर्फ चार महीने बाद ही इस सेक्टर को बड़े स्तर पर अमेरिकी आयात के लिए खोल देना बहुत अजीब होगा.
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भयानक असर
किसान इसे चुपचाप सहने वाले नहीं हैं. 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार, भारत में 1.7 करोड़ मक्का किसान, 95 लाख सोयाबीन किसान और 70 लाख ज्वार किसान हैं. भले ही कुछ किसान एक से ज्यादा फसल उगाते हों, फिर भी इसका मतलब है कि लगभग 2 करोड़ किसान—और उनके परिवारों के करीब 10 करोड़ लोग—प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र, गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्यों में 98 लाख कपास किसान भी हैं, और वे 2 करोड़ किसान भी हैं जिनके बारे में सरकार ने कहा था कि उन्हें दालों में आत्मनिर्भरता मिशन से फायदा होगा. यह ज्यादातर भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्यों में बड़ी संख्या में वोटर हैं. यही वजह है कि मोदी सरकार ने कृषि में “समर्पण” के विपक्ष के आरोपों पर इतनी तेज प्रतिक्रिया दी है.
मध्यम वर्ग का यह नज़रिया कि “लाड़-प्यार में पले” किसान मुफ्त बिजली, सस्ती खाद, न्यूनतम समर्थन मूल्य और टैक्स-फ्री आय का फायदा लेते हैं, ज्यादातर किसानों की असली जिंदगी से बहुत दूर है. किसानों को कीमत और आय में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है, जैसा बहुत कम लोगों को करना पड़ता है. मौसम उनकी फसल खराब कर देता है, ज्यादा उत्पादन होने पर बाजार कीमत गिर जाती है और खरीद की सही व्यवस्था नहीं होने से चावल और गेहूं के अलावा बाकी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य सिर्फ नाम के रह जाते हैं. अगर अमेरिका से कम कीमत वाले बड़े स्तर के कृषि आयात बढ़ते हैं, तो इसका असर बहुत विनाशकारी हो सकता है.
और ऐसा भी नहीं है कि कृषि बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है. देश की करीब आधी आबादी कृषि पर निर्भर है, जिसकी 2015-25 के दशक में औसत वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) वृद्धि सिर्फ 4.5 प्रतिशत रही. इसी दशक में फसलों से जीवीए वृद्धि (पशुपालन, मछली पालन और वानिकी को छोड़कर) सिर्फ 2.8 प्रतिशत प्रति वर्ष रही, जो पिछले दशक (2004-14) के 3 प्रतिशत से कम है.
किसी भी औद्योगिक अर्थव्यवस्था में, लोगों को कम वेतन और कम उत्पादकता वाले कृषि काम से निकलकर ज्यादा वेतन वाले मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में जाना चाहिए. ऐसा 2004-05 से 2018-19 के बीच हुआ भी, जब कुल कामगारों में कृषि कामगारों की हिस्सेदारी 59 प्रतिशत से घटकर 43 प्रतिशत हो गई थी और सबसे ज्यादा गिरावट यूपीए के समय हुई. लेकिन उसके बाद यह रुझान बदल गया और 2023-24 में कृषि कामगारों की हिस्सेदारी फिर बढ़कर 46 प्रतिशत हो गई. लोगों का वापस खेती के काम में जाना ‘मेक इन इंडिया’ की असफलता को दिखाता है.
एक आदर्श स्थिति में, व्यापार खुलने से उपभोक्ताओं को फायदा होता और सस्ता आयातित खाना मिलता. लेकिन जब आधे उपभोक्ता पहले से ही कम उत्पादकता वाली कृषि अर्थव्यवस्था में फंसे हों, तो उन्हें कीमतों के और ज्यादा उतार-चढ़ाव के सामने छोड़ना अपराध जैसा होगा और विपक्ष का कर्तव्य है कि वह कमजोर पड़ती सरकार पर दबाव बनाए रखे कि वह अपने रुख पर कायम रहे.
लेखक अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य है. व्यक्त विचार निजी हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है.
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