Saturday, 25 June, 2022
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क्या 2021 में समलैंगिकों के विवाह को मान्यता और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए सशस्त्र बल में सेवा का रास्ता खुलेगा

कितना अच्छा हो कि न्यायपालिका से व्यवस्था आने से पहले ही केन्द्र सरकार इन मामलों में सकारात्मक कदम उठाते हुये इन समुदायों से जुड़ी समस्याओं का निराकरण करने के लिये ठोस कदम उठाये.

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न्यायपालिका ने समलैंगिक और ट्रांसजैंडर समुदाय के सदस्यों को भले ही गरिमा के साथ जीने सहित अनेक नागरिक अधिकार प्रदान कर दिये हैं लेकिन इन समुदायों का संघर्ष अभी भी जारी है.

अब संघर्ष का मुद्दा समलैंगिक जोड़ों की शादी के पंजीकरण और ट्रांसजैंडर सदस्यों के लिये सशस्त्र बलों में सेवा के मार्ग में आ रही बाधाओं को दूर कराना है.

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति ए के सीकरी की पीठ 15 अप्रैल, 2014 को अपने नालसा बनाम भारत सरकार (National Legal Ser.Auth vs Union Of India & Ors ) मामले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरा लिंग घोषित किया था. न्यायालय ने कहा था कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी दूसरे नागरिकों को मिले सभी अधिकारों और सुविधाओं को प्राप्त करने के हकदार हैं.

इस फैसले के पांच साल बाद सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के (अधिकारों का संरक्षण) कानून, 2019 बनाया जो पांच दिसंबर, 2019 से देश में लागू है. इसके बावजूद, इस वर्ग के लोग अभी भी कई तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं.

ऐसा ही एक मामला केरल की छात्रा हिना हनीफा नाम की ट्रांस महिला का है जो एनसीसी में दाखिला लेना चाहती है कि एनसीसी के कानून इसमें सिर्फ पुरुषों और स्त्रियों के पंजीकरण की ही इजाजत देते हैं. इसी वजह से हनीफा ने केरल उच्च न्यायालय में राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) कानून की धारा 6 को चुनौती दी है.

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इस संबंध में केन्द्र सरकार की दलील है कि सशस्त्र बल और एनसीसी में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को प्रवेश देने का कानून में कोई प्रावधान नहीं है.

केन्द्र और एनसीसी का तर्क है कि एनसीसी का उद्देश्य कैडेट को भविष्य में सशस्त्र बलों के लिये तैयार करना है और सशस्त्र बलों मे ट्रांसजेन्डर व्यक्तियों के प्रवेश के लिये प्रावधान नहीं है, एनसीसी में भी ऐसा नहीं है.

न्यायालय में यह दलील भी दी गयी है, ‘तीसरे लिंग के लिये एक नई डिवीजन का गठन करना केन्द्र सरकार का विशेषाधिकार है. तीसरे लिंग के लिये एक नई डिवीजन गठित करने से पहले केन्द्र सरकार और प्राधिकारियों को संरचनात्मक सुविधाओं और मापदंड की समीक्षा के लिये व्यापक कवायद करनी होगी.’

इस संबंध में यह दलील भी दी गयी है कि ट्रांसजेडर व्यक्ति को एक कैडेट के रूप में पंजीकृत कराने की अनुमति उक्त व्यक्ति को सर्विस सेलेक्शन बोर्ड में शामिल होने का अवसर प्रदान करेगा जिसमे इस समय भारतीय सशस्त्र बलों में ट्रांसजेंडर के प्रवेश के लिये कोई प्रावधान नहीं है.

उच्च न्यायालय ने इस मामले में सुनवाई के दौरान एनसीसी में ट्रांसजेन्डर व्यक्तियों के पंजीकरण के बारे में कोई नीति तैयार करने में विफल रहने के लिये केन्द्र सरकार की आलोचना की थी. न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि दुनिया आगे बढ़ रही है और सरकार 19वीं सदी में ही नहीं रह सकती है.

न्यायालय की यह टिप्पणी बहुत कुछ कहती है लेकिन इस दिशा में कोई भी कदम उठाने के लिये सबसे पहले भारतीय सशस्त्र बलों में ट्रांसजेंडरों के प्रवेश के लिये कानूनी प्रावधान करने की आवश्यकता होगी.

बहरहाल, एनसीसी में दाखिला लेने के लिये हनीफा की कानूनी लड़ाई जारी है. अब देखना यह है कि सरकार कब तक उसे इस अधिकार से वंचित रखेगी.

जहां तक सवाल सशस्त्र बलों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रवेश के लिये कोई प्रावधान नहीं होने का है तो सरकार को ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के (अधिकारों का संरक्षण) कानून के प्रावधानों के मद्देनजर इस ओर ध्यान देना होगा.

केन्द्र सरकार ने हाल ही में जेलों में बंद ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों की सही संख्या की जानकारी रखने के इरादे से राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा तैयार की जाने वाली कारागार आंकड़ों की रिपोर्ट में एक अलग लैंगिक श्रेणी जोड़ने का फैसला किया है.

अगर सरकार जेलों में बंद ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों के बारे में इस तरह का निर्णय ले सकती है तो फिर उसे एनसीसी/ सशस्त्र बलों में इस समुदाय के सदस्यों के प्रवेश का मार्ग सुगम बनाने के लिये कदम उठाना चाहिए. सरकार को ट्रांसजेंडर सदस्यों के लिये सैन्य बलों में संबंधित कानूनी प्रावधानों में संशोधन करके तीसरे लिंग के रूप में एक अलग वर्ग बनाने की आवश्यकता महसूस होती है तो उसे ऐसा करना चाहिए.

अभी कुछ महीने पहले, गृह मंत्रालय ने अर्द्धसैनिक बलों में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों की सेवायें लेने की दिशा में कदम उठाया है और सीमा सुरक्षा बल ने अपने बेड़े में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को शामिल करने में दिलचस्पी दिखाई थी. अगर वास्तव में ऐसा है तो सरकार को इस प्रयास को गति प्रदान करनी चाहिए ताकि एनसीसी में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को प्रवेश लेने में किसी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़े.

दूसरी ओर, समलैंगिक जीवन व्यतीत करने वाले समुदाय के बारे में उच्चतम न्यायालय के सितंबर, 2018 के ऐतिहासिक फैसले के बाद नये सवाल उठ रहे हैं.

उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने 6 सितंबर, 2018 को Navtej Singh Johar vs Union Of India Ministry Of Law प्रकरण में सुनाये गये फैसले में कहा था कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों को भी संविधान कें प्रदत्त मौलिक अधिकारों के तहत गरिमा के साथ जीने का अधिकार है. साथ ही न्यायलाय ने एकांत में परस्पर सहमति से बनाये गये समलैंगिक यौन संबंधों को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अंतर्गत अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था.

चूंकि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से समाज और लोगों के नजरिये में बदलाव पर जोर दिया था और कहा था कि समलैंगिकता एक जैविक तथ्य है और इस तरह के लैंगिक रुझान वाले समुदाय के सदस्यों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव उनके मौलिक अधिकारों का हनन है.

न्यायालय की इस व्यवस्था को समलैंगिक समुदाय ने एक बहुत बड़ी सफलता माना था और इसके बाद उनका अलग कदम समलैंगिक शादी को मान्यता दिलाने के लिये संघर्ष करना रहा है.

चूंकि, हमारे देश में समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं है. स्थिति यह है कि इस तरह के कुछ समलैंगिक जोड़े इस समय अपने विवाह के पंजीकरण के लिये कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे ही कई समलैंगिक जोड़ों की याचिकायें इस समय दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित हैं. इस मामले में न्यायालय ने केन्द्र से जवाब भी मांगा है.


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दो समलैंगिक जोड़ों ने हिन्दू विवाह कानून और विदेशी विवाह कानून के तहत समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता के लिये याचिका दायर कर रखी हैं. ये चाहते हैं कि इन कानूनों की व्याख्या इस तरह से की जाये जिससे समलैंगिक जोड़े भी विवाह के लिये आवेदन कर सकें.

केन्द्र सरकार का मानना है कि यह एक विकट स्थिति है और सनातन धर्म ने अभी तक इस तरह की स्थिति का सामना नहीं किया है. न्यायालय का भी मानना है कि कानून लिंगविहीन है और इस स्थिति में कानून की व्याख्या की आवश्यकता है. उच्च न्यायालय इस मामले में 21 जनवरी को विचार करेगा.

उच्चतम न्यायालय के इन दो ऐतिहासिक फैसलों के बाद ट्रांसजेंडर समुदाय के लिये सशस्त्र बल में नौकरी और समलैंगिक जोड़ों के विवाह को मान्यता देने जैसे सवालों पर केन्द्र और न्यायपालिका की सुविचारित व्यवस्थायें अपेक्षित हैं. कितना अच्छा हो कि न्यायपालिका से व्यवस्था आने से पहले ही केन्द्र सरकार इन मामलों में सकारात्मक कदम उठाते हुये इन समुदायों से जुड़ी समस्याओं का निराकरण करने के लिये ठोस कदम उठाये.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

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