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Saturday, 5 April, 2025
होममत-विमतधारा 40 को हटाना वक्फ बोर्ड पर हमला नहीं, बल्कि बहुत ज़रूरी सुधार है

धारा 40 को हटाना वक्फ बोर्ड पर हमला नहीं, बल्कि बहुत ज़रूरी सुधार है

धारा 40 के तहत, वक्फ बोर्ड के पास यह निर्धारित करने के लिए स्वप्रेरणा से जांच शुरू करने का अधिकार है कि कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं — यह एक अनूठी शक्ति है.

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वक्फ की ज़मीन को अक्सर अल्लाह की संपत्ति कहकर पुकारा जाता है — जिसका उद्देश्य उच्च उद्देश्य की पूर्ति करना और व्यावहारिक रूप से लोगों की सेवा करना है. यही वह सिद्धांत है जिस पर यह टिका हुआ है, लेकिन एक बार जब किसी पवित्र ट्रस्ट को इंसानी हाथों में छोड़ दिया जाता है, तो यह मानवीय दोषों के अधीन हो जाता है. इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि कैसे भगवान के नाम का आह्वान हमेशा करुणा या सामूहिक भलाई की ओर नहीं ले जाता है — बल्कि लापरवाही, सत्ता के खेल या यहां तक ​​कि लाभ को सही ठहराने के लिए किया जाता है.

भारत में वक्फ बोर्डों की कहानी जाने-माने पैटर्न पर चलती है. समुदाय की सेवा के इरादे से दान की गई ज़मीन — चाहे वह शिक्षा के ज़रिए हो, मस्जिदों को बनाए रखने के लिए, कब्रिस्तान के लिए ज़मीन देने या आर्थिक रूप से वंचितों की सहायता करने के लिए — अक्सर भ्रष्टाचार, खराब शासन और प्रणालीगत विफलता के मामले के रूप में समाप्त हो गई है.

बीते कुछ साल में, अतिक्रमण, अवैध बिक्री और बोर्ड के सदस्यों द्वारा संपत्ति के दुरुपयोग में मिलीभगत के कई दस्तावेज़ दर्ज किए गए हैं.

सिर्फ कुप्रबंधन नहीं

व्यवहार में, वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन बड़े पैमाने पर अशरफ मुस्लिम अभिजात वर्ग के हाथों में रहा है, जिसमें व्यापक समुदाय का न के बराबर या कहे कि प्रतिनिधित्व ही नहीं है — विशेष रूप से पसमांदा और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग जो भारतीय मुसलमानों का बहुमत बनाते हैं. सामूहिक उत्थान के लिए एक संसाधन के रूप में अभिप्रेत होने के बावजूद, अधिकांश आम मुसलमानों की इस बात पर कोई राय नहीं है कि इन ज़मीनों का प्रबंधन कैसे किया जाता है या उनसे किसे फायदा होता है और पूरे समुदाय के सामाजिक-आर्थिक हाशिए पर होने को देखते हुए, इस अलगाव को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. सैद्धांतिक रूप में, वक्फ को राज्य कल्याण योजनाओं पर गरीब मुसलमानों की निर्भरता कम करनी चाहिए थी — फिर भी, कई लोग बुनियादी ज़रूरतों के लिए पूरी तरह से राज्य पर निर्भर हैं.

भारत में मुसलमानों की स्थिति की जांच करने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा 2005 में गठित सच्चर समिति ने इस फर्क को जाना. 2006 में पेश इसकी रिपोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि वक्फ बोर्डों द्वारा उत्पन्न राजस्व उनके नियंत्रण में विशाल संपत्तियों की तुलना में अनुपातहीन रूप से कम था. समिति ने अनुमान लगाया कि उचित सुधारों और कुशल उपयोग के साथ, वक्फ ज़मीन संभावित रूप से सालाना 12,000 करोड़ रुपये उत्पन्न कर सकती है — एक चौंका देने वाली संख्या, खासकर वर्तमान अनुमानित राजस्व केवल 200 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की तुलना में हो. यह फर्क न केवल कुप्रबंधन का संकेत देता है, बल्कि यह अवास्तविक संभावनाओं की ओर भी इशारा करता है, एक ऐसी प्रणाली जो स्कूलों, समुदाय और घरों का समर्थन कर सकती थी, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा में फंसी हुई है.

वक्फ अधिनियम 1995 के तहत, अतिक्रमणों से धारा 54 के तहत निपटा जाना था, जिसमें वक्फ ज़मीन से अवैध कब्जाधारियों को हटाने के लिए कानूनी प्रक्रियाएं निर्धारित की गई थीं. हालांकि, सच्चर समिति की रिपोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि न केवल वक्फ संपत्तियों से राजस्व सृजन चिंताजनक रूप से कम था, बल्कि अतिक्रमण एक सतत और बढ़ती चुनौती थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कम से कम 58,889 वक्फ संपत्तियां अतिक्रमण का सामना कर रही हैं और 13,000 से अधिक मुकदमेबाजी में उलझी हुई हैं. यह संख्याएं एक ऐसी प्रणाली के बारे में बहुत कुछ बताती हैं जो समुदाय की सेवा के लिए बनाई गई थी, लेकिन अक्सर अपनी नींव की रक्षा करने में विफल रही है.

हालांकि, सबसे ज़्यादा चर्चित कानून वक्फ अधिनियम की धारा 40 थी, जिसने वक्फ बोर्डों को संपत्तियों को वक्फ के रूप में पहचानने और घोषित करने का अधिकार दिया, भले ही उन्हें आधिकारिक तौर पर इस तरह दर्ज न किया गया हो. शायद इसका उद्देश्य भूले हुए या बिना दस्तावेज़ वाले बंदोबस्तों की सुरक्षा करना था, लेकिन समय के साथ, इस प्रावधान ने मुश्किल सवाल खड़े करने शुरू कर दिए — इसलिए नहीं कि इससे अतिक्रमण से निपटने में मदद मिली, बल्कि इसलिए कि इसका इस्तेमाल विवादित या खराब दस्तावेज़ वाली ज़मीन पर स्वामित्व जताने के लिए किया गया.

वर्तमान वक्फ सुधार बहस धारा 40 के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है, जो चुपचाप वक्फ अधिनियम का सबसे विवादित हिस्सा बन गई है. संसद में, इस पर सिर्फ बहस ही नहीं हुई, बल्कि AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे सचमुच फाड़कर फेंक दिया. वह पल भले ही नाटकीय रहा हो, लेकिन इसने इस धारा को लेकर गहरी चिंताओं को दर्शाया.

धारा 40 के तहत, वक्फ बोर्ड को यह निर्धारित करने के लिए स्वप्रेरणा से जांच शुरू करने का अधिकार है कि कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं — यह शक्ति केवल उसे ही प्राप्त है, तथा अन्य समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी अन्य धर्मार्थ या धार्मिक बोर्ड को नहीं दी गई है.

धारा-40 के बचाव में तर्क वजनदार नहीं है. कई वक्फ संपत्तियां अनौपचारिक रूप से उपहार में दी गई थीं, सामुदायिक रूप से इस्तेमाल की गई थीं, या बस कभी भी उनका दस्तावेजीकरण नहीं किया गया था — खासकर औपनिवेशिक काल के दौरान जब रिकॉर्ड अक्सर अपूर्ण या अस्तित्वहीन होते थे. धारा 40 का उद्देश्य सुरक्षा प्रदान करना था, जो अन्यथा खो जाने या चुपचाप कब्जा लिए जाने की संभावना को सुरक्षित रखने का एक तरीका था.

लेकिन यहीं से तनाव दिखना शुरू होता है. वक्फ बोर्ड एक अदालत नहीं है और फिर भी उसे एक गंभीर घोषणा करने की अनुमति है — जो संपत्ति की कानूनी स्थिति को प्रभावित करती है.

हां, फैसले को चुनौती दी जा सकती है, लेकिन हाई कोर्ट में लड़ाई को ले जाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से दूसरे पक्ष पर आती है — अक्सर ऐसे व्यक्ति जिनके पास बहुत कम संसाधन या जागरूकता होती है.


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आगे बढ़ना

धारा 40 को और भी अलग बनाने वाली बात यह है कि भारत में किसी भी अन्य धार्मिक संस्था को — चाहे वह हिंदू हो, ईसाई हो या सिख — किसी भी संपत्ति को अपने धार्मिक ट्रस्ट का हिस्सा घोषित करने का वैधानिक अधिकार नहीं है और इस विशिष्टता को तेज़ी से असंतुलन के रूप में देखा जा रहा है. यह स्वाभाविक रूप से एक बड़ा सवाल उठाता है — कानून के समक्ष समानता के बारे में.

धार्मिक दान संस्था को इतना शक्तिशाली उपकरण सौंपना कोई छोटी बात नहीं है और जबकि शक्ति अच्छे इरादे से सौंपी जाती है, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है. जब सावधानी से लागू किया जाता है, तो धारा 40 वह कर सकती है जिसके लिए इसका उद्देश्य था — ऐसी संपत्तियों की रक्षा करना जो अन्यथा समुदाय की पहुंच से दूर जा सकती है, लेकिन जब लापरवाही से या इससे भी बदतर, राजनीतिक रूप से उपयोग किया जाता है, तो यह बहुत अनुचित लगने लगता है.

और यही चिंता का विषय है. इस शक्ति का दुरुपयोग न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई मजबूत व्यवस्था नहीं दिखती. कोई सख्त सुरक्षा उपाय नहीं, कोई वास्तविक निवारक नहीं. जब आप इस तरह के अनियंत्रित प्राधिकार को एक ऐसे ढांचे में रखते हैं जो पहले से ही कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार से जूझ रहा है, तो इससे ज्यादा भरोसा नहीं पैदा होता.

मेरे हिसाब से, धारा 40 को हटाना वक्फ पर हमला नहीं है, बल्कि एक ज़रूरी सुधार है. अनावश्यक शक्ति को हटाना किसी संस्था को कमजोर करने के समान नहीं है; कभी-कभी, इसे वापस उद्देश्य पर लाने का यही एकमात्र तरीका होता है. लगातार पीछे की ओर देखने के बजाय — बिना रिकॉर्ड वाली ज़मीन का पता लगाने की कोशिश करना, दूसरों के जीवन को प्रभावित करने वाले विवादों को फिर से भड़काना — आगे बढ़ना समझदारी हो सकती है. अब ध्यान बेहतर प्रबंधन, अधिक पारदर्शिता और एक ऐसी प्रणाली पर होना चाहिए जो वास्तव में उस समुदाय की सेवा करे जिसके लिए इसे बनाया गया था.

एक बात जो मुझे अभी भी पूरी तरह से समझ में नहीं आई है — वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को नियुक्त करने का प्रस्ताव क्यों? इसे समावेशिता, शायद पारदर्शिता की ओर एक कदम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन मुझे पता है कि किसी अन्य धार्मिक या सामुदायिक ट्रस्ट में ऐसा प्रावधान नहीं है. हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में स्पष्ट किया कि वक्फ संस्थानों के धार्मिक पहलुओं को प्रबंधित करने वालों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने का कोई प्रावधान नहीं है. उन्होंने कहा कि ये बदलाव केवल परिषद और प्रशासनिक बोर्ड पर लागू होते हैं, धार्मिक मामलों को सीधे संभालने वालों पर नहीं.

मूल रूप से, वक्फ सुधार के इर्द-गिर्द बातचीत सिर्फ ज़मीन, कानून या बोर्ड के बारे में नहीं है — यह भरोसे के बारे में है. संस्थाओं, शासन और इस विचार में भरोसा कि समुदाय के कल्याण के लिए बनाई गई कोई चीज़ अभी भी उस उद्देश्य को पूरा कर सकती है. धारा-40 भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन असली इम्तेहान अभी बाकी है. क्या ये सुधार पारदर्शिता और बेहतर प्रबंधन लाएंगे या सिर्फ गहरे संरचनात्मक मुद्दों को संबोधित किए बिना सत्ता को एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित करेंगे? कानून में खंडों को फिर से लिखना आसान है; वर्षों की उपेक्षा और दुरुपयोग से दबी प्रणालियों को फिर से बनाना कहीं ज़्यादा कठिन है.

(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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