Monday, 8 August, 2022
होममत-विमतईश-निंदा के विरोध में भारत में पहला कत्ल करने वाले को पाकिस्तान में कैसे शहीद बना दिया गया

ईश-निंदा के विरोध में भारत में पहला कत्ल करने वाले को पाकिस्तान में कैसे शहीद बना दिया गया

इल्मुद्दीन के कबूलनामे में कहीं यह नहीं कहा गया है कि वह पैगंबर की निंदा करने वाली किताब ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशन के बाद भड़के सांप्रदायिक उन्माद से प्रभावित था.

Text Size:

इतिहास के पन्नों पर खूबसूरत लिखावट में, 1929 में किए गए उस कत्ल का कबूलनामा दर्ज है जिसने औपनिवेशिक काल के आखिरी दौर में पूरे पंजाब में उथलपुथल मचा दी थी. यह कबूलनामा उस सनसनीखेज कत्ल की पूरी कहानी बयान कर देता है. यह कहानी है लाहौर के उस युवा बढ़ई की, जिसके किशोरवय प्रेम को ठुकरा दिया गया था और उसने पाप मुक्ति के लिए अनारकली बाज़ार की एक दुकान में घुसकर एक आदमी के दिल में खंजर घोंप दिया था. फोरेंसिक क्षेत्र के फ्रायडवादी मनोवैज्ञानिकों को यह जान कर खुशी होगी कि हत्यारे ने कत्ल करने के लिए छुरा खरीदने की खातिर अपनी मां से एक रुपया लिया था और छुरे को अपनी सलवार के नेफे में छुपा रखा था.

आज उस कत्ल को अलग तरह से याद किया जाता है. लाहौर की मियानी साहब क़ब्रगाह में उस कातिल गाज़ी इल्मुद्दीन शहीद, जिसे उस कत्ल के लिए फांसी दे दी गई थी, की कब्र आज भी उसकी शहादत की याद दिलाती है. उस पाक लड़ाके ने पैगंबर मुहम्मद की निंदा का बदला लेने के लिए कत्ल किया और अपनी शहादत दी थी.

ईश-निंदा का बदला लेने के लिए पाकिस्तान में जिन लोगों ने, जिनमें पंजाब के नेता सलमान तासीर का हत्यारा भी शामिल है, हत्याएं की हैं वे सब इल्मुद्दीन को बड़े सम्मान से याद करते हैं. तासीर के पिता, वामपंथी शायर मुहम्मद दीन तासीर भी लाहौर में इल्मुद्दीन के जनाजे में शरीक हुए थे.

आज भारत जब कन्हैयालाल तेली की हत्या का कारण समझने की कोशिश कर रहा है, उपरोक्त कबूलनामा एक अहम सबक सिखाता है, वह यह कि धर्मांध व्यक्ति का दिमाग जुनून और पागलपन के कगार पर पहुंचा एक स्याह बियावान होता है.

पंजाब पुलिस के इंस्पेक्टरों सईद अहमद शाह, सरदार परताब सिंह और जोवाहर लाल द्वारा तैयार की गई केस डायरी दशकों से लाहौर में पंजाब आर्काइव में पड़ी है और ऑनलाइन भी उपलब्ध है. यह कल्पना करना मुश्किल है कि इल्मुद्दीन के तमाम जीवनीकारों में से किसी को इस दस्तावेज़ का पता नहीं लगा, जो कि एकमात्र कानूनी दस्तावेज़ है जिसमें पढ़ा जा सकता है कि वह अनपढ़ कातिल क्या कहना चाहता था.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

विद्वान हाशिम रशीद ने अपने एक प्रामाणिक लेख में बताया है कि इल्मुद्दीन का मिथल किस तरह गढ़ा गया. उन्होंने कहा है कि जीवनीकारों ने इस दस्तावेज़ की अनदेखी की, तो इसकी एक वजह है. ‘सियासी नजरिए से’ इस दस्तावेज़ के मजमून से ‘एक घपला सामने आ जाता.’ यह सच भी है. समलैंगिक कामुकता की यह विचित्र कहानी उस सम्मानित शहीद के बारे में स्थापित मान्यताओं को खंडित कर देती.’


यह भी पढ़ें: तीस्ता सीतलवाड़ के साथ गिरफ्तार किए गए IPS आरबी श्रीकुमार ‘इसरो’ से ‘गुजरात दंगों’ तक कैसा रहा है सफर


कत्ल का बहाना

इल्मुद्दीन के कबूलनामे से यह जाहिर नहीं होता है कि वह 1924 में प्रकाशित किताब ‘रंगीला रसूल’ को लेकर फैले सांप्रदायिक उन्माद में शामिल था. इस भड़काऊ किताब में पैगंबर मुहम्मद की यौन नैतिकता पर हमला किया गया था. इस पर्चे के लेखक को हाइकोर्ट द्वारा बरी किए जाने पर 1927 में लाहौर में दंगा शुरू होने के पांच महीने पहले इल्मुद्दीन ने बताया था कि वह एक अस्पताल के लिए फर्नीचर बनाने में अपने अब्बा की मदद करने के लिए मुल्तान से लाहौर आया और वहां एक सप्ताह रहने के बाद कोहट में काम करने चला गया.

1928 के लगभग अंत में वह लाहौर वापस आया. उसके कबूलनामे से कहीं यह संकेत नहीं मिलता है कि इससे पहले उसे कोई धार्मिक निर्देश मिला था या किसी धार्मिक आंदोलन से जुड़ा था.

‘रंगीला रसूल’ के लेखक महाशे राजपाल को मुसलमानों के विरोध के बाद 1924 में गिरफ्तार कर लिया गया था. लेकिन उसका मुकदमा 1927 तक चला और हाइकोर्ट ने उसे बरी कर दिया. व्यापक स्तर पर दंगा फैलने के बाद सरकार ने धारा 295-ए लागू कर दी, जिसके तहत ‘किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और कुटिल इरादों से चोट पहुंचाने वाले’ बयानों पर रोक लगा दी गई. इससे पहले जो धारा 153-ए लागू थी उसके तहत समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने पर रोक लगाई गई थी.

इतिहासकर जूलिया स्टीवेंस ने लिखा है कि हिंदू नेता इस नये कानून के प्रति कम उत्साहित थे. लाला लाजपत राय ने इसका समर्थन किया था, लेकिन केवल ‘अति संवेदनशील जमात को संतुष्ट करने’ के ‘कामचलाऊ उपाय’ के रूप में.

ईश-निंदक की अनदेखी

ब्लॉग, किताबों, और फिल्मों जैसे ‘फटाफट इतिहासों’ में इसी बात पर ज़ोर दिया गया है कि इल्मुद्दीन बचपन से मजहब में गहरी आस्था रखता था. इस तरह की फिल्मों की शुरुआत 1978 में हिट हुई फिल्म से हुई जिसमें अति सुंदर हैदर ने लाहौर के उस बढ़ई का किरदार निभाया था. इन सबके ब्योरों में बताया गया है कि 1929 में ईश-निंदा की घटना हुई, और तुरंत इसका बदला लेने का फैसला किया गया. इल्मुद्दीन के कबूलनामे में हालांकि यह सबूत मिलता है कि उसे ईश-निंदा वाले मामले की काफी पहले से जानकारी थी और उसने राजपाल से खुद मिला भी था लेकिन उसने इस मामले में बहुत दिलचस्पी नहीं ली थी.

उसने याद किया है कि वह 1927 में जब लाहौर आया तब उसने सुना था कि ‘अनारकली बाजार के एक हिंदू दुकानदार ने पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ ‘रंगीला रसूल’ नामक एक किताब छापी है, जिसके लिए उस पर मुकदमा चला लेकिन उसे बरी कर दिया गया. इस पर पूरे मुस्लिम समुदाय की भावनाएं भड़क गई थीं.’ इस जानकारी ने इल्मुद्दीन को कोई कार्रवाई करने को उकसाया नहीं.

इल्मुद्दीन ने आगे कहा है, ‘मैंने एक अखबार में छापी इस खबर के बारे में सुना कि लाहौर में कबाब बेचने वाले खुदा बख्श ने उस हिंदू का कत्ल करने की कोशिश की जो फरार हो गया था. खुदा बख्श को सज़ा हो गई.’ ऐसा लगता है, इस जानकारी ने भी इल्मुद्दीन की जिंदगी पर बहुत असर नहीं डाला.

वास्तव में, कबूलनामा यह संकेत देता है कि इल्मुद्दीन ने कत्ल से पहले अपने शिकार को कई बार देखा, और उसे कोई फर्क नहीं पड़ा था. 1928 में उसकी मुलाक़ात अपने दोस्त बस्सा जट्ट से हुई थी, जो अनारकली बाज़ार आया था पोस्टर छपवाने. यह पोस्टर चिरागां के मेले में कुश्ती मुक़ाबले की घोषणा करने के लिए था. इल्मुद्दीन ने कहा है कि ‘बस्सा ने मुझे बताया कि एक हिंदू इसकी दुकान में बैठा है जहां कुछ सिपाही रखवाली के लिए बैठे हैं.’

इल्मुद्दीन ने ‘उस हिंदू’ को बाद में कई बार देखा, कभी 1928 में शबे बारात की शाम, कभी लाहौर चिड़ियाखाने जाते हुए, और तब भी जब वह दीन मुहम्मद के साथ फोटो खिंचवाने के लिए गिरधारीलाल के स्टुडियो गया था. ऐसा लगता है कि हिंसा करने का ख्याल उसके मन में कभी नहीं आया था.


यह भी पढ़ें: उलझे तारों ने उदयपुर हत्याकांड को तासीर के हत्यारे, पेरिस के नाइफमैन को ‘उकसाने’ वाले समूह से जोड़ा


जुनून में अपराध

बल्कि इल्मुद्दीन का कबूलनामा हाजी नाम से पुकार जाने वाले सादिक़ कसाब के साथ उसके ‘दोस्ताना रिश्ते’ पर केंद्रित है. हाजी एक किशोरवय लड़का था जो लाहौर के सिरनवाली बाज़ार में रहता था. ईद से कुछ दिन पहले हाजी ने इल्मुद्दीन से बातचीत बंद कर दी थी और उसके साथ चिरागां वाले मेले में जाने से भी माना कर दिया था. यह मेला मध्ययुग के एक पंजाबी सूफी शायर शाह हुसैन की बरसी के दिन लगता था. इल्मुद्दीन इस बात से भी परेशान हो गया था कि सिरनवाला में रहने वाले एक बढ़ई गुलाम नबी ने यह दावा किया था कि उसने ‘हाजी के साथ लौंडेबाजी की थी.’

कबूलनामे में इल्मुद्दीन ने कहा है कि अगले दिन उसने अपने दोस्त दीन मुहम्मद की पान की दुकान पर हाजी और गुलाम नबी को पकड़ा. इल्मुद्दीन ने कहा है, ‘गुलाम नबी ने साफ माना कर दिया कि उसने मुझसे ऐसा कुछ कहा था. इस पर मैंने उसे तमाचा जड़ दिया. फिर मारपीट शुरू हो गई.

इस झगड़े के बाद हाजी ने मुझसे कहा कि वह मेरी सूरत भी नहीं देखना चाहता और न ही मुझसे बात करना चाहता है. इससे मुझे बहुत सदमा लगा और मुझे लगा कि मैं दुनिया से तौबा कर लूं.’

अगली सुबह इल्मुद्दीन और उसके पेंटर दोस्त जट्ट ने तांगा किया, ‘जिसमें एक मुसलमान का लाल रंग का कमजोर-सा घोड़ा जुता था’. वे दोनों लाहौर की सुनहरी मस्जिद गए, और उसके बाद लाहौर के ‘लाल बत्ती इलाके’ हीरा मंडी गए, ‘जहां हम लाहौर के याकी गेट इलाके के फौजी नाम के शख्स मिले, जिसने हमें पुकारा था.’

तांगे से वापस घर लौटते हुए इल्मुद्दीन ने जट्ट से कहा कि वह हाजी का और अपना कत्ल करने के बारे में सोच रहा है. जट्ट ने हाजी का कत्ल करने के विचार का समर्थन किया लेकिन बोला कि ‘लोग यही कहेंगे कि मैंने अपनी ज़िंदगी एक विलन के लिए बरबाद कर दी.’

इल्मुद्दीन ने पुलिस को बताया कि ‘उस रात जब मैं घर लौटा तो काफी थका हुआ महसूस कर रहा था. मैंने सोचा कि अगर मुझे अपनी ज़िंदगी ही खत्म करनी है तो बेहतर यही होगा कि पाक पैगंबर की शान की खातिर उस हिंदू का सफाया करके यह काम करूं (और शहादत दे दूं).’

सुबह नहा-धोकर इल्मुद्दीन ने नाई की दुकान जाकर दाढ़ी बनवाई और फिर नहाया, और नाश्ते में सत्तू का शर्बत पीया. बाजार में उसने दीन मुहम्मद और हाजी से मुलाक़ात की. ‘मैंने उनसे कहा कि मैं कोहट जा रहा हूं और अगर मैंने कुछ बुरा कहा हो तो मुझे माफ कर देना.’

शहीद का जन्म

पाकिस्तान के अजीम शायर मुहम्मद इक़बाल ने कहा, ‘ओ पढ़े-लिखे लोगों, एक बढ़ई के जवान बेटे ने हम सबको पीछे छोड़ दिया है.’ लेकिन इल्मुद्दीन शहीद बनने को राजी नहीं था. मुकदमे के दौरान उसने खुद को बेकसूर बताया, उसने अपना जो बचाव किया उसका ज़ोर गवाहों के बयानों में विरोधाभासों पर केंद्रित था. स्थानीय गणमान्य लोगों ने हाइकोर्ट में उसकी ओर से वकालत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना को 18,000 रुपये की फीस देकर रखा. और उनका तर्क यही था कि इल्मुद्दीन को उस अपराध में आरोपी बनाना गलत था.

धारा 295-ए लागू होने के बाद से सांप्रदायिक तनाव फैल गया था और कई लोगों को डर था कि राजपाल की हत्या के बाद दंगा फिर भड़क जाएगा.

इल्मुद्दीन को फांसी दिए जाने के बाद, पाकिस्तान के लिए आंदोलन कर रहे बुद्धिजीवियों ने ईश-निंदा के खिलाफ हत्या करने वाले इस शख्स को हाथोहाथ उठा लिया था. फौजी शासक जनरल मुहम्मद ज़िया-उल-हक़ के इस्लामी झुकाव वाले दौर में इल्मुद्दीन को इस्लामी रिपब्लिक के आदर्श नागरिक के रूप में पेश किया गया और उसकी आस्था को उसके वजूद का आधार बताया गया.

एक आधुनिक जीवनीकार ने शहीद के चमत्कारी जिस्मानी गुणों का दावा करते हुए कहा कि ‘जब इल्मुद्दीन के शव को कब्र से निकाला गया वह जस का तास था, उसमें कोई तब्दीली नहीं आई थी.’

सदियों से अस्पतालों के तमाम डॉक्टर और मेडिकल विषयों पर लिखने वाले लेखक उन विचित्र अपराधों के बारे में लिखते रहे हैं जिन्हें वे ‘नैतिक उन्माद’ का परिणाम मानते रहे हैं, ऐसे हताशाजनक काम जो साफ सोच-समझ वाले लोग अपनी उन मनोव्यथाओं से मजबूर होकर करते हैं जो वैसे तो होते हैं लेकिन कर बैठते हैं जिन पर उनका अपना बस नहीं रहता. आज, क्रिमिनल मामलों का कोई वकील इल्मुद्दीन को मनोरोगी साबित करने के लिए कह सकता है कि वह यौन अपराधबोध और अवसाद का शिकार था.

हालांकि इस बीमारी ने एक पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लिया है और इल्मुद्दीन ने जो किया वह उस आग को एक सदी बाद आज भी भड़का सकता है.

(लेखक दिप्रिंट के नेशनल सिक्योरिटी एडिटर हैं. उनका ट्विटर हैंडल @praveenswami है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़े: तेल को लेकर सऊदी अरब के साथ क्या कोई नया करार करेगा अमेरिका, भारत भी बनाए हुए है करीबी नज़र


share & View comments