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चित्रण : सोहम सेन
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वह समय बीत चुका है और उस समय की याद भी भूलती जा रही है, जब लोकतंत्र में राजनेता सभी नागरिकों से संवाद करते थे. जब वे कुर्सी के लिए निर्वाचित होते थे तब सबके हितों का ख्याल रखते थे, जिनमें वे लोग भी होते थे जिन्होंने उनको वोट नहीं दिया. सार्वजनिक पद को पब्लिक ट्रस्ट माना जाता था. अब वे केवल अपने ‘जनाधार’ या वोट बैंक की बात करते हैं, बाकी सब उनके लिए बेमानी हैं.

डोनाल्ड ट्रंप को लाखों लोग उन्माद फैलाने वाला मूर्ख और नस्लवादी कहते हैं. लेकिन वे जितने ज्यादा उन्मादी नज़र आते है, उनके समर्थक उन्हें उतना ज्यादा पूजते हैं. बाकी लोग जाएं हवा खाने. अगर तुम मुझे वोट नहीं देते, तो मुझसे कुछ उम्मीद भी मत रखो!

उदाहरण के लिए नरेंद्र मोदी की भाजपा को ले लीजिए. सत्ता के लिए यह हिंदू वोटों को भुनाती है. इसलिए वह किसी मुसलमान को न तो लोकसभा चुनाव के लिए टिकट देती है और न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए, जहां मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा है, और फिर भी वह दोनों चुनावों में भारी जीत हासिल करती है. वह मुसलमानों और अधिकतर दलितों को सत्ता से दूर रख  सकती है क्योंकि सवर्ण यानी उच्च और मझोली जातियों का बहुमत उसके साथ है. इसलिए 10 प्रतिशत आरक्षण सवर्णों के लिए एक बड़ा तोहफा है, जो उनकी सरकार जाते-जाते दे गई है.

तो, राहुल गांधी किस जनाधार से संवाद कर रहे हैं? अपने जनाधार को वे किस तरह परिभाषित करते हैं? क्या उन्हें मालूम है कि उनके समर्थक कौन हैं? आप केवल पिटी-पिटाई बातें और मोदी-विरोध ही देश के सामने नहीं परोस सकते!


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हमें मालूम है कि 2014 में केवल 31 फीसदी मतदाताओं ने मोदी के पक्ष में वोट दिया था और आप यह मान कर चल सकते हैं कि उन्हें नापसंद करने वालों या उनसे असहमत लोगों की संख्या अब बढ़ गई होगी. मोदी पर राहुल के अथक हमलों से ऐसे लोग जरूर काफी खुश और उत्साहित होते होंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि ऐसे लोग उन्हें वोट भी देंगे. अगर मोदी के प्रति आक्रोश ही आपकी कसौटी है, तो आप फिलहाल उपलब्ध कई विकल्पों में जिन्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं उन्हें ही चुनेंगे. बंगाल में ममता बनर्जी, यूपी में सपा/बसपा, बिहार में लालू, केरल में वामदल, तेलंगाना में केसीआर, ओड़ीशा में नवीन पटनायक, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, आदि-आदि.

राहुल की इस मोदी केंद्रित मुहिम से  मोदी की छवि को इतनी चोट पहुंचती है कि जनता उन्हें चुनाव में पटखनी दे देती है, तो इससे क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे काँग्रेस को जिता देंगे? आज तो इसकी संभावना कम ही दिखती है, क्योंकि ‘मोदी सबसे बुरे हैं’ का सीधा जवाब यह नहीं है कि ‘काँग्रेस सबसे अच्छी है’.

1989 तक कांग्रेस का जनाधार इतना बड़ा था कि वह सब कुछ जीत सकती थी.  उस जनाधार में निचली जातियां, अल्पसंख्यक, जनजातियां, ब्राह्मण, कुछ मझोली जातियां और सबसे गरीब लोगों का बहुमत शामिल था. भाजपा तब शहरी व्यापारियों, और हिंदू मध्यवर्ग तक सीमित थी. तभी इंदिरा गांधी जनसंघ/ भाजपा को ‘बनिया पार्टी’ कहकर उपहास किया करती थीं. उसे उन्होंने शायद ही कभी हिंदू पार्टी कहा हो.

इसका अर्थ यह हुआ कि जब तक वे मजबूत थीं, भाजपा कांग्रेस को कभी ‘मुसलमानों की पार्टी’ नहीं कह सकी, जबकि ‘पोटा’ को रद्द करने के साथ शुरू हुए भ्रमित यूपीए वाले दशक ने मोदी को यह कहने का मौका दे दिया. 1989 में जब राजीव गांधी इस जनाधार को खोने लगे थे तब काँग्रेस ने अपने बाकी वोटों और भाजपा विरोधी ताकतों को एकजुट करके अपनी सत्ता बचाई थी. लेकिन अब, 2014 के बाद उसे अपनी वापसी के लिए इससे ज्यादा कुछ करना पड़ेगा.

बड़ी परीक्षा के अब करीब 100 दिन रह गए हैं, कांग्रेस के पास शायद पंजाब को छोड़कर किसी भी राज्य में प्रतिबद्ध वोट बैंक नहीं है. पूर्वी-मध्य क्षेत्र में जनजातियों के उसके वोट में भाजपा ने हिस्सेदारी कर ली है. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, असम जैसे अहम राज्यों में मुसलमानों ने, तो और जगहों पर दलितों ने भी विकल्प चुन लिये हैं, शहरी मध्यवर्ग, खासकर 25 के आसपास की उम्र के बड़े समूह अभी भी मोदीमय हैं. ऐसे में आप मोदी से नाराज सभी समूहों को अपने तम्बू के नीचे लाकर नया वोट बैंक नहीं बना सकते. आप मोदी को नुकसान तो पहुंचा सकते हैं लेकिन उससे होने वाला फायदा कई दोस्तों-दुश्मनों में बंट जाएगा.

ऐसी स्थिति में राहुल 2010-14 के दौरान केजरीवाल द्वारा अपनाए गए फार्मूले को अपना रहे हैं. अन्ना हज़ारे का उपयोग करते हुए और आरएसएस नुमा प्रचार शैली का इस्तेमाल करते हुए केजरीवाल ने यूपीए, खास तौर से कांग्रेस की साख को ध्वस्त करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. यह इतनी कुशलता से किया गया था कि खुद कांग्रेस वाले भी भ्रष्टाचार के आरोपों से खुद को बचाने की उतावली में फंस गए थे.

इसका श्रेय भाजपा और विवेकानंद फाउंडेशन को देने का फैशन तो है लेकिन कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई में मुख्य हथियार तो केजरीवाल ही थे. वे युवा, भरोसेमंद, ईमानदार नज़र आते थे, और माना जाता था कि वे चालू राजनीति की लफ़्फ़ाजियों और ढोंगों से बंधे नहीं हैं. उन्होंने कांग्रेस के लिए ‘सब चोर हैं’ वाली छवि गढ़ डाली थी. कांग्रेस को खारिज करने के लिए उन्होंने जिन मतदाताओं को तैयार किया उनमें से अधिकतर उनके पाले में नहीं गए, क्योंकि उन्होंने इसके लिए आधार नहीं तैयार किया था. उन्हें सिर्फ दिल्ली में फायदा मिला. दूसरी जगहों पर वे ऐसे मतदाताओं का रुख मोदी की तरफ करने में ही सफल हो पाए थे.

विकल्पहीन, शुद्ध नकारात्मक राजनीति के यही खतरे होते हैं. इसके लिए आपको पहले तो लक्ष्य के तौर पर एक आधार तय करना पड़ता है. खतरा यही है कि राहुल कहीं इसी हश्र तक न पहुंच जाएं. बाग़ी की भूमिका बहुत जोशीली, असरदार लग सकती है लेकिन इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि लोकतंत्र में आप इस भूमिका में किसी का नुकसान तो कर सकते हैं मगर न तो सत्ता हासिल कर सकते हैं और न किसी को सत्ता दिला सकते हैं.

हिंदी पट्टी के तीन अहम राज्यों में राहुल की कामयाबी ने, जो खूब सुर्खियां बटोर चुकी है (खासकर ट्विटर पर), उनके बौद्धिक समर्थकों तथा मोदी-द्वेषी वाम-उदारपंथी टीकाकारों की कल्पनाओं को पर लगा दिए हैं. लेकिन उनके वोट गिनती के ही हैं. और जो लाखों री- ट्वीट या फेसबुक पर जो ‘लाइक’ दर्ज किए गए हैं, उन्हें ईवीएम मशीनें गिनती नहीं हैं. किसी छापामार युद्ध में जिस तरह होता है, उसी तरह राहुल आगे बढ़ते हुए अपनी चाल कुशलता से बदल तो रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि इसका रणनीतिक परिणाम क्या है? इसका हासिल क्या है?


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मुस्लिम पार्टी के ठप्पे को मिटाने के लिए राहुल टीवी कैमरे के सामने मंदिरों के दौरे करते रहे हैं, अपनी जनेऊ दिखाते रहे हैं और अपना उच्च ब्राह्मण गोत्र भी बताते रहे हैं. इसी के साथ, उनकी पार्टी तीन तलाक, सबरीमला, सवर्णों को आरक्षण जैसे चालू सेकुलर-उदारवादी मुद्दों पर चुप्पी सी साधती रही है. इस तरह की उसकी उलझन नागरिकता से संबंधित कानून में भयंकर संशोधन (जो भारत के ‘यहूदीकरण’ को कानूनी जामा पहनाता है) के मुद्दे पर लोकसभा से उसके वाकआउट में भी उजागर होती है. यहां बहस यहूदीवाद को लेकर नहीं हो रही है. इजराइल ने खुद को विचारधारा के आधार पर एक यहूदी राष्ट्र घोषित किया है. भारत ने इससे उलटा किया, उसने विचारधारा मुक्त धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाया. आज उसे चुनौती दी जा रही है, और कांग्रेस वाकआउट करने के सिवा कुछ नहीं कर पा रही है. असम और दूसरी जगहों के हिंदू-मुसलमान इसे देख रहे हैं.

यह भाजपा के लिए मुफीद है. उसका जनाधार यही चाहता है. वह जब ‘अवैध’ प्रवासियों को दीमक कहती है तब उसके समर्थक ताली बजाते हैं. जब वह संविधान में संशोधन करके यह ‘स्पष्ट’ करती है कि उनमें दीमक तो केवल मुसलमान है, तब वे झूम उठते हैं. कांग्रेस को तो यही नहीं पता है कि उसका जनाधार क्या है, और अगले एकाध महीने में जब चुनाव अभियान शुरू हो जाएगा तब वह अपना जनाधार क्या बनाएगी?

विशुद्ध, बेलगाम मोदी विरोध चाहे उसमें कितना भी आक्रोश क्यों न हो- न तो एक विचारधारा बन सकती है और न चुनावी विकल्प. यह आपकी सबसे ज्यादा मदद यह कर सकता है कि मोदी को इतना नुकसान पहुंचा दे कि उनकी सीटों की संख्या 200 से नीचे पहुंच जाए. लेकिन क्या इससे आपकी सीटों की संख्या 100 के पार चली जाएगी? भारत के नक्शे पर गौर से नज़र डालें और राज्य-दर-राज्य गिनती करें. मई तक लोग भाजपा से बुरी तरह नाराज भी हो जाएं तो भी कई राज्यों में वे गलती से भी शायद कांग्रेस को विकल्प के तौर पर न चुनें. यही सबसे कड़वी सच्चाई है राहुल गांधी के लिए.

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