लोकसभा की कार्यवाही के दौरान स्पीकर ओम बिरला को देखना अपने आप में एक अनुभव है. जब वे दाईं ओर, यानी ट्रेज़री बेंचों या सत्ता पक्ष की तरफ देखते हैं, तो उनके चेहरे पर एक पिता जैसी स्नेहभरी मुस्कान होती है. जब वे बाईं ओर, यानी विपक्ष की बेंचों की तरफ देखते हैं, तो वही मुस्कान एक तरह की तिरछी हंसी और सख्त भाव में बदल जाती है, जैसे कि किसी बाल सुधार गृह के अधीक्षक का भाव हो सकता है.
मैं बिरला को दो दशक से ज्यादा समय से जानता हूं—राजस्थान में 2003 से 2008 के बीच वसुंधरा राजे सरकार में संसदीय सचिव रहने के समय से, वे हमेशा से मिलनसार व्यक्ति रहे हैं. मुझे लगता है कि जब वे बाईं ओर देखते हुए सख्त दिखते हैं, तो यह ज़रूरी नहीं कि विपक्ष जिस पक्षपात का आरोप लगाता है, उसी का संकेत हो. बल्कि, एक ऐसे नेता के रूप में, जो 2003 से लगातार विधानसभा और लोकसभा के तीन-तीन चुनाव जीत चुके हैं, उनके चेहरे के भाव विपक्ष से जुड़ी झुंझलाहट और निराशा भी हो सकते हैं. विपक्ष बार-बार चुनाव हारने के बाद भी वही गलतियां दोहराता रहता है, इस उम्मीद में कि किसी दिन किस्मत साथ दे दे. राजनीति की कला और कौशल के माहिर—आज वे कहां हैं और राजे कहां हैं—बिरला का विपक्ष के प्रति दिखने वाला गुस्सा शायद सहानुभूति, चिंता और उससे भी ज्यादा ऊब का नतीजा हो. विपक्ष का स्तर पर खरा न उतरना पीठासीन अधिकारियों को भी परेशान कर सकता है.
गुरुवार को बिरला के पास विपक्ष से नाराज़ होने की और भी वजह थी. उन्होंने खुलासा किया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब के लिए उन्होंने खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लोकसभा न आने का अनुरोध किया था. स्पीकर ने कहा कि उनके पास “पुख्ता जानकारी” थी कि विपक्ष के सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा सकते हैं और कुछ ऐसा कर सकते हैं, जिससे “देश की लोकतांत्रिक परंपराएं टूट जातीं.”
उसी दिन बाद में राज्यसभा में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी’ नारे का बार-बार ज़िक्र करना, विपक्ष की कथित मंशा को लेकर बिरला की “जानकारी” को और मजबूत करता है. सवाल यह है कि देश के प्रधानमंत्री को लोकसभा में खुद मौजूद रहना सुरक्षित क्यों नहीं लगा? यह उनकी सुरक्षा से जुड़ा मामला है. लोकसभा स्पीकर को इसकी जानकारी है. उन्हें विशेष जांच दल (एसआईटी), अगर नहीं तो राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से उच्चस्तरीय जांच के आदेश देने चाहिए. प्रधानमंत्री की सुरक्षा को अफवाहों, अटकलों या राजनीतिक गपशप पर नहीं छोड़ा जा सकता. सच सामने आना चाहिए.
इस बीच, पिछले हफ्ते कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल था. पार्टी के सांसदों को पूरा भरोसा था कि राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा से किए गए कथित “बड़े खुलासों” से टीम मोदी को हिला दिया है. विपक्षी नेताओं ने मुझसे कहा कि ये तथाकथित खुलासे प्रधानमंत्री मोदी की एक मजबूत और निर्णायक नेता की छवि को तोड़ देंगे. उनका कहना था कि चीन के साथ संभावित युद्ध जैसी स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व को फैसला लेना चाहिए था, लेकिन प्रधानमंत्री ने यह जिम्मेदारी तत्कालीन सेना प्रमुख पर छोड़ दी और कहा, “जो उचित समझो, वो करो.”
संसद के अंदर और बाहर राहुल गांधी के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी. उन्हें लगा कि उन्होंने सरकार को घुटनों पर ला दिया है—कम से कम उनको देख कर ऐसा ही लग रहा था. कितनी बार ऐसा देखा गया है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह नेता विपक्ष को बोलने से रोकने के लिए खड़े हुए हों? गांधी ने पहले ही कह दिया था कि प्रधानमंत्री मोदी इतने “डरे हुए” हैं कि वे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने लोकसभा नहीं आएंगे. प्रधानमंत्री नहीं आए और इसका श्रेय राहुल गांधी ले रहे थे. हालांकि, बिरला ने इसकी एक अलग ही वजह बताई.
राहुल गांधी के लिए जाल
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने मान लिया कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे डरते हैं. वह यह बात बार-बार कहते हैं. बस फर्क इतना है कि ऐसा लगता है कि इससे मतदाता भी डर जाते हैं. कम से कम चुनाव के नतीजे तो बार-बार यही बताते हैं. ताज़ा उदाहरण देखिए. क्या गांधी को सच में लगता है कि सरकार जनरल एमएम नरवणे की किताब से जुड़ी विपक्ष की ‘खुलासों’ से घबरा गई थी, जिनकी खबर प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने दो साल पहले ही दे दी थी? अगर सरकार को इस किताब से इतनी परेशानी होती, तो क्या मिजोरम के राज्यपाल और पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के लिए इतना प्रशंसात्मक फोरवर्ड लिखते? उन्होंने किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के लिए यह लिखा है—
“कई घटनाओं और मुद्दों का बहुत गहराई से आकलन इसमें दर्ज किया गया है, जो इसे पढ़ने वालों के लिए बेहतर समझ सुनिश्चित करेगा. मैं बिना किसी हिचक के इस आत्मकथा की सिफारिश करूंगा…उन सभी के लिए जो उन अलग-अलग घटनाओं को समझना चाहते हैं, जिनका उन्होंने सामना किया और सेना में अपनी यात्रा को दोबारा जीना चाहते हैं…उन्हें मेरी भरपूर सराहना.”
जब जनरल नरवणे की किताब मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय भेजी गई थी, तब जनरल वीके सिंह मोदी सरकार में मंत्री थे. हालांकि, अभी तक इस किताब को मंजूरी नहीं मिली है.
और प्रधानमंत्री का कथित “जो उचित समझो, वह करो” संदेश तत्कालीन सेना प्रमुख को देने से उनकी एक मजबूत और निर्णायक नेता की छवि कैसे कमज़ोर होती है? सरकार यह तर्क आसानी से दे सकती थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व सेना प्रमुख को ऑपरेशनल आजादी दी थी. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भी उन्होंने सशस्त्र बलों को जवाब देने की ‘फ्री हैंड’ दी थी.
मेरे हिसाब से ट्रेजरी बेंच ने जनरल नरवणे की किताब के ज़िक्र पर कड़ा विरोध दिखाकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए बस एक जाल बिछाया था. आखिर वे उन्हें सदन में बोलने से रोकने के लिए इतनी कोशिश क्यों करते, जबकि वह बाहर तो बोलते ही? स्पीकर बाद में इसे रिकॉर्ड से हटा भी सकते थे और गांधी सीधे उस जाल में फंस गए—पूरे एक हफ्ते तक कार्यवाही ठप कर दी और सरकार को उन गंभीर मुद्दों पर चर्चा से बचा लिया, जो सच में सत्तारूढ़ पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते थे.
अगर मोदी सरकार को वाकई गांधी के हमलों की परवाह होती, तो वह रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और डीजी (अक्विज़िशन) ए. अंबरासु को दो निजी कंपनियों—अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और लियोनार्डो (पहले अगस्ता वेस्टलैंड)—के बीच सहयोग की घोषणा वाले कार्यक्रम में नहीं भेजती. अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले का मामला अभी अदालत में है. हालांकि, अब कंपनी ब्लैकलिस्टेड कैटेगरी में नहीं है. यह कार्यक्रम उसी समय हो रहा था, जब संसद में गतिरोध चल रहा था. कोई यह दलील दे सकता है कि रक्षा अधिकारियों की मौजूदगी सिर्फ रक्षा क्षेत्र में निजी साझेदारी के समर्थन को दिखाती है, लेकिन उनकी मौजूदगी ही गांधी को उचितता पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त मुद्दा दे सकती थी.
असल में सरकार जानती है कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के मुद्दों की बात आती है, तो प्रधानमंत्री मोदी को राहुल गांधी की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. इन मामलों में मोदी बनाम राहुल कोई मुकाबला ही नहीं है. यह बात गुरुवार को फिर साफ हो गई, जब प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में विपक्ष को आड़े हाथों लिया और विपक्ष के हमलों का जवाब अपनी व्यक्तिगत मुहर के साथ दिया.
फ्लैंकिंग मैनूवर
राहुल गांधी को किसी बड़े दुश्मन से लड़ते समय एक सैन्य रणनीति—फ्लैंकिंग मैनूवर—की स्टडी करनी चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमले कांग्रेस नेता को बीजेपी के खिलाफ अपनी वैचारिक लड़ाई में नायक होने या शहादत जैसा एहसास तो दे सकते हैं, लेकिन इससे कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होता. यह बात बार-बार साबित हो चुकी है. बदलाव के तौर पर गांधी फ्लैंकिंग मैनूवर अपनाने पर सोच सकते हैं—यानी कमज़ोर बिंदुओं पर हमला करना, जैसे बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें या केंद्र के मंत्रालय/मंत्री, अगर उनके काम न करने या गलत काम करने के मामले हों.
मैं एक उदाहरण देता हूं. बीजेपी शासित मध्य प्रदेश सरकार ने मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है. विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रीफिंग की थी और घर-घर में पहचाना जाने वाला नाम बन गई थीं. 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने मोहन यादव सरकार को अभियोजन मंजूरी पर फैसला लेने के लिए दो हफ्ते का समय दिया था. इस मामले में अब भी टालमटोल हो रही है. शाह अब भी मंत्री बने हुए हैं. इस मुद्दे ने अभी तक गांधी का ध्यान नहीं खींचा है.
विपक्ष के नेता संसद में इंदौर में पानी दूषित होने से हुई मौतों का मुद्दा उठाने को लेकर भी ज्यादा उत्साहित नहीं दिखते और ये तो उन कई मुद्दों में से सिर्फ दो हैं, जिनका इस्तेमाल विपक्ष राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर यादव सरकार को घेरने के लिए कर सकता है, लेकिन कांग्रेस की प्रतिक्रिया औपचारिक ही रही है, ज्यादातर मीडिया बयानों और एक्स पोस्ट के जरिए.
अगर गांधी आसपास देखें, तो उन्हें हर बीजेपी शासित राज्य में बात करने के लिए कई मुद्दे मिल जाएंगे. मैंने 12 जनवरी के अपने कॉलम “बीजेपी के मुख्यमंत्री चुनावी जीत से गलत सबक ले रहे हैं” में सिर्फ कुछ उदाहरण गिनाए थे.
इन राज्यों में और भी बहुत-से मुद्दे हैं और केंद्र में भी कई मंत्री और मंत्रालय ऐसे हैं, जिन्हें घेरा जा सकता है—जैसे बहुत प्रचारित इंटर्नशिप योजना की भारी नाकामी.
लेकिन गांधी को शायद ये मुद्दे लड़ाई के लायक नहीं लगते. वह चाहे कुछ भी हो, बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत प्रधानमंत्री मोदी से ही लड़ना चाहते हैं. 55 साल की उम्र में ज़ाहिर है उम्र उनके पक्ष में है. कांग्रेस के वास्तविक प्रमुख और लोकसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर उन्हें सभी सुविधाएं मिली हुई हैं. वह अगले 20-25 साल तक भी लड़ाई जारी रख सकते हैं, बस प्रधानमंत्री मोदी के संन्यास लेने का इंतज़ार करते हुए, लेकिन उनकी पार्टी के ज्यादातर साथी इतना लंबा इंतज़ार करने का समय या धैर्य शायद न रखते हों. उन्हें गांधी से स्नाइपर: द लास्ट स्टैंड फिल्म दिखानी चाहिए. फिल्म के एक किरदार कर्नल मोडीसे का उनके लिए संदेश है— “एक नेता रास्ता जानता है, उसी रास्ते पर चलता है और दूसरों को भी रास्ता दिखाता है. नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि एक कर्म है.”
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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