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Tuesday, 27 January, 2026
होममत-विमतराहुल गांधी को गृह मंत्री अमित शाह से ज्यादा सहकारिता मंत्री अमित शाह की चिंता क्यों करनी चाहिए

राहुल गांधी को गृह मंत्री अमित शाह से ज्यादा सहकारिता मंत्री अमित शाह की चिंता क्यों करनी चाहिए

सहकारिता मंत्रालय युद्धस्तर पर काम कर रहा है. भले ही सहकारी समितियां राज्य सूची में आती हों, लेकिन केंद्र इस क्षेत्र को सुव्यवस्थित और फिर से मजबूत बनाने की पूरी कोशिश कर रहा है.

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अमित शाह कई लोगों के लिए कई मायने रखते हैं. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के लिए वह विपक्ष के लिए ही संकट हैं. उनका मानना है कि शाह ऐसे नेता हैं जो मोदी के बाद के दौर में भी उन्हें सत्ता में बनाए रखने का तरीका जानते हैं. वहीं, विपक्षी नेताओं के लिए वह साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति के उस्ताद हैं. उनकी नाराज़गी राजनीतिक नैतिकता को लेकर नहीं है—या उसकी कमी को लेकर भी नहीं. असल गुस्सा इस बात का है कि वे खुद इस कला को उतनी कुशलता और अंदाज़ में नहीं अपना पा रहे हैं. उनके लिए शाह राज्य का प्रतीक हैं—उसकी व्यापक शक्ति और अधिकार और ‘व्यवस्था’ लागू करने की उसकी भूमिका, जिसके आगे हर किसी को अपने अस्तित्व के लिए झुकना पड़ता है.

2022 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के दुरुपयोग के लिए अमित शाह को जिम्मेदार ठहराया था. बनर्जी ने कथित तौर पर विधानसभा मे कहा था, “मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री यह सब कर रहे हैं. सीबीआई और ईडी उनके अधीन नहीं हैं…सब गृह मंत्रालय के अधीन हैं.”

सीबीआई कार्मिक, पेंशन और लोक शिकायत मंत्रालय के तहत काम करती है, जो प्रधानमंत्री के पास है. ईडी वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में है, लेकिन विपक्ष की इस धारणा का क्या किया जाए कि सरकार अमित शाह चला रहे हैं? वे पूरी तरह गलत भी नहीं हैं, लेकिन यह सब प्रधानमंत्री की सहमति के बिना नहीं हो सकता. आखिरकार, शाह सिर्फ पीएम मोदी के सबसे भरोसेमंद साथी ही नहीं हैं—जो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी के दाहिने हाथ के रूप में कई कठिन दौर से गुज़रे—बल्कि वह गृह मंत्री भी हैं, जिस पद को सरकार में नंबर दो पर माना जाता है, कुछ अपवादों को छोड़कर और वे एक सख्त गृह मंत्री हैं. जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करना और उसे केंद्र शासित प्रदेशों में बांटना, नागरिकता संशोधन कानून, ब्रिटिश दौर के आपराधिक कानूनों को बदलना और नक्सलवाद के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ाई—ये कुछ उदाहरण हैं. उनके आलोचक उनकी कई नाकामियां भी गिना सकते हैं—जैसे मणिपुर, लेकिन इसके पीछे अक्सर राजनीतिक मजबूरी रही, न कि इच्छाशक्ति या सख्ती की कमी.

फिर भी सवाल यह है कि शाह गृह मंत्रालय को सबसे अहम मंत्रालय क्यों नहीं मानते? पिछले साल सहकारी समितियों से जुड़ी महिलाओं के एक समूह से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि जब वह गृह मंत्री बने, तो लोगों ने उनसे कहा कि उन्हें बहुत अहम मंत्रालय मिला है और यह बड़ी बात है. आखिरकार, इसे सरदार पटेल ने संभाला था. शाह ने महिलाओं से कहा था, “लेकिन जिस दिन मुझे सहकारिता मंत्री बनाया गया, मुझे लगता है कि उस दिन मुझे गृह मंत्रालय से भी बड़ा मंत्रालय मिला.”

भारत टैक्सी

सहकारिता मंत्रालय की स्थापना जुलाई 2021 में हुई थी और अमित शाह इसके पहले मंत्री बने. इससे पहले, कृषि मंत्रालय में एक संयुक्त सचिव सहकारी संस्थाओं का काम देखते थे. सहकारिता के प्रति शाह के लगाव की एक पृष्ठभूमि है. गुजरात के मनसा गांव में, जब तक उनके गांव में एक डेयरी नहीं आई थी, वहां केवल पांच पक्के घर थे. पांच साल के भीतर, ज्यादातर घर पक्के हो गए. यह शाह के अपने बयान के मुताबिक है. यानी, उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दौर में ही सहकारी आंदोलन का लोगों के जीवन पर पड़ने वाला बदलावकारी असर देख लिया था. 36 साल की उम्र तक, वे अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बन चुके थे.

सहकारिता के प्रति शाह का यह लगाव शायद यह पूरी तरह नहीं समझा पाता कि देश के गृह मंत्री, जो लगभग पूरी सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को चलाते हैं—प्रधानमंत्री से एक और जिम्मेदारी क्यों लेते हैं, वह भी सहकारिता जैसे दिखने में छोटे मंत्रालय की, लेकिन यही अमित शाह को अमित शाह बनाता है. मंत्रालय बनने के चार साल से थोड़ा ज्यादा समय में, सहकारिता मंत्रालय धीरे-धीरे एक ऐसे ताकतवर औज़ार के रूप में उभर रहा है, जो जीवन के हर क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं की भूमिका को बढ़ाने और मजबूत करने की क्षमता रखता है. देश में 8.44 लाख सहकारी संस्थाएं हैं, जिनसे 30 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं. मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, एक हालिया सर्वे में पाया गया है कि करीब 92 प्रतिशत सहकारी संस्थाएं किसी न किसी रूप में सक्रिय हैं. बस इतना हुआ कि गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर, बाकी जगहों पर वे लंबे समय तक व्यवस्था की उपेक्षा के कारण नज़रों से ओझल हो गई थीं.

सोचिए, इतने बड़े क्षेत्र को अगर सरकार का संरक्षण और प्रोत्साहन मिले, तो केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह राजनीतिक और चुनावी समर्थन का कितना बड़ा आधार बन सकता है. केंद्र समर्थित सहकारी कैब सेवा ‘भारत टैक्सी’ को ही देख लीजिए, जिसे एक जनवरी को दिल्ली-एनसीआर में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया. इसके बाद इसे राजकोट में शुरू किया जाएगा और फिर पूरे देश में फैलाया जाएगा. मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, लॉन्च के महज़ तीन हफ्तों के भीतर ही 6 लाख ड्राइवरों ने इसमें रजिस्ट्रेशन कर लिया है. ओला और उबर के उलट, जो ड्राइवरों से 40 प्रतिशत तक कमीशन लेते हैं, भारत टैक्सी कोई कमीशन नहीं लेती. इसकी वजह से दो बड़ी राइड-हेलिंग कंपनियों को कमीशन मॉडल छोड़कर सब्सक्रिप्शन मॉडल अपनाना पड़ा है. इसका मतलब है ड्राइवरों की जेब में ज्यादा पैसा. आगे चलकर कोई सब्सक्रिप्शन मॉडल या प्लेटफॉर्म फीस आ सकती है, लेकिन वह ओला, उबर और रैपिडो द्वारा वसूले जाने वाले कमीशन की तुलना में बहुत मामूली होगी. ज़रा सोचिए, जब भारत टैक्सी पूरे देश में पूरी तरह शुरू हो जाएगी, तो कितने ड्राइवरों को फायदा होगा. और इसके लिए वे किसे धन्यवाद देंगे? ज़ाहिर है, अमित शाह और बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को.

कैब सर्विस तो बस शुरुआत है. अगली कड़ी में प्लंबर जैसे पेशेवरों के लिए मोबाइल आधारित एग्रीगेटर सेवाएं भी आ सकती हैं. कानूनी सुधारों और डिजिटलीकरण के साथ-साथ, राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 में नवीकरणीय ऊर्जा, कचरा प्रबंधन, स्वास्थ्य और शिक्षा, बायोगैस और इथेनॉल उत्पादन और जैविक व प्राकृतिक खेती जैसे उभरते क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देने की योजना रखी गई है. नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक लिमिटेड ने जैविक उत्पादों को इकट्ठा करने, ब्रांडिंग और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उनकी मार्केटिंग की जिम्मेदारी ली है. सोचिए—जैविक भोजन की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन सही सर्टिफिकेशन नहीं है. अगर सरकार आगे आकर इसे सर्टिफाई और मार्केट करे, तो जैविक खेती करने वाली किसान सहकारी संस्थाएं अगली बड़ी चीज़ बन सकती हैं, जिससे किसान और उपभोक्ता दोनों खुश होंगे. इसका श्रेय किसे मिलेगा? इसका जवाब देना मुश्किल नहीं है.

इसके अलावा, पैक्स यानी प्राथमिक कृषि ऋण समितियों को कॉमन सर्विस सेंटर में बदला जा रहा है. सोचिए, पैक्स गांवों में बीमा, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित 300 से ज्यादा ई-सेवाएं उपलब्ध करा रही हों. सोचिए, किसी ग्रामीण को ट्रेन या फ्लाइट टिकट बुक करने के लिए मेकमायट्रिप जैसे ऐप पर लॉग इन न करना पड़े. 40,000 से ज्यादा पैक्स पहले ही ये सेवाएं देना शुरू कर चुकी हैं.

बीजेपी के लिए ज़मीनी जुड़ाव बनाना

सरकार पहले से ही भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के साथ बातचीत कर रही है कि किसानों की सहकारी समितियों का इस्तेमाल गोदाम और भंडारण के लिए किया जाए. वैसे भी, एफसीआई अनाज भंडारण के लिए ऐसे परिसरों को किराये पर लेता है. ये सहकारी समितियां एफसीआई को वही सुविधाएं दे सकती हैं और किसानों की उपज को रखने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जा सकता है.

कृषि ढांचे से जुड़ी कई अन्य परियोजनाएं—जैसे हायरिंग सेंटर, प्रोसेसिंग यूनिट और उचित मूल्य की दुकानें—दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना का हिस्सा बनने की परिकल्पना की गई हैं, जो सहकारी क्षेत्र में लागू होगी. ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आनंद (IRMA) को बदलकर पिछले साल त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की शुरुआत की गई, ताकि सहकारी क्षेत्र में युवाओं को प्रबंधन से लेकर व्यवसाय और वित्त तक की शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जा सके.

यह समझने के लिए आपको विशेषज्ञों की भी ज़रूरत नहीं है कि यह चार साल पुराना मंत्रालय क्या कर रहा है. यह हैरान करने वाला है. बस राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और प्रेस सूचना ब्यूरो की ‘ईयर एंडर 2025 – सहकारिता मंत्रालय: “सहकार से समृद्धि”’ पर एक नज़र डालिए.

कई लोगों को यह भी एक और नारा लग सकता है, जैसे ‘विकसित भारत 2047’, जिसे हम मतदाता देखें या न देखें, यह कहना मुश्किल है, लेकिन जिस तरह सहकारिता मंत्रालय युद्धस्तर पर काम कर रहा है—भारत टैक्सी तो कई परियोजनाओं में से सिर्फ पहली है—‘सहकार से समृद्धि’ केवल एक नारा नहीं लगता.

एक वरिष्ठ मंत्रालय अधिकारी ने पिछले हफ्ते मुझसे कहा, “अगले पांच से सात वर्षों में सहकारी क्षेत्र में क्रांति आएगी.” और बताया कि चीज़ें इतनी तेज़ी से कैसे आगे बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा, “अमित शाह को सहकारिताओं के बारे में इतना ज्ञान है कि उनके साथ हर बैठक एक सीखने जैसा अनुभव होती है.”

1,700 बहु-राज्य सहकारी समितियों में से 217 में चुनाव पहले ही कराए जा चुके हैं, जिनकी सही तरीके से प्रक्रिया कराने की जिम्मेदारी जिला कलेक्टरों की है. वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी बताया कि भले ही सहकारी समितियां राज्य सूची में आती हों, केंद्र सरकार सहकारी क्षेत्र को सुव्यवस्थित और फिर से सक्रिय करने की पूरी कोशिश कर रही है. अधिकारियों की उम्मीदों को देखें तो शाह का सहकारिता मंत्रालय कुछ ही वर्षों में वह हासिल करने की उम्मीद कर रहा है, जिसे सरकार ने 2022 तक हासिल करने का लक्ष्य रखा था—यानी किसानों की आय को दोगुना करना.

जहां राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेता ग्रामीण भारत को लुभाने के लिए सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भरोसा कर रहे हैं, वहीं शाह इसे एक बिल्कुल नए स्तर पर ले जा रहे हैं. सहकारिताएं उनके लिए आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए बीजेपी के लिए ज़मीनी जुड़ाव बनाने का ज़रिया हैं और टैक्सी ड्राइवरों, प्लंबरों, किसानों और अन्य लाभार्थियों जैसे स्वयंसेवकों की एक पूरी फौज है, जिन्हें जल्द ही साथ जोड़ा जा सकता है.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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