जब भी सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPF) बिल की बात होती है, तो चर्चा अक्सर बड़े अधिकारियों—जैसे इंस्पेक्टर जनरल, डीआईजी और कमांडेंट—तक सिमट कर रह जाती है. लेकिन इस शोर में यह कड़वी सच्चाई छिप जाती है कि IPS डेपुटेशन का पूरी पैरामिलिट्री फोर्स पर कितना गहरा असर पड़ता है.
इससे प्रमोशन में जो रुकावट आती है, वह सिर्फ शीर्ष पदों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका सीधा असर ज़मीन पर तैनात सब-इंस्पेक्टर, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल तक पहुंचता है. एक बड़ा सवाल, जिसका अब तक साफ जवाब नहीं मिला है, यह है कि डेपुटेशन पर आए हर एक IPS अधिकारी के बदले कितने CAPF जवान अपनी ही रैंक पर अटके रह जाते हैं.
जब कैडर के ढांचे और प्रमोशन सिस्टम को ध्यान से देखा जाता है, तो एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है.
बिल असल में क्या बदलता है
इस असर को समझने के लिए हमें सातवें वेतन आयोग के बाद की व्यवस्था को देखना होगा. पहले CAPF में IPS डेपुटेशन का कोटा तय था: DIG के लिए 20 प्रतिशत, IG के लिए 50 प्रतिशत, ADG के लिए 75 प्रतिशत और DG के लिए 100 प्रतिशत. 2026 का नया बिल DIG स्तर पर IPS डेपुटेशन को पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव रखता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के नज़रिए से यह एक अहम राहत है.
हालांकि, यह बिल एक सख्त कानूनी सीमा भी तय करता है. इसमें IG के लिए डेपुटेशन 50 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है, ADG के लिए इसे घटाकर 67 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि स्पेशल DG और DG के लिए यह 100 प्रतिशत ही रखा गया है. चिंता की बात यह है कि पहले IG स्तर पर 50 प्रतिशत आरक्षण महज़ एक कार्यकारी आदेश था, जिसे बदला जा सकता था. लेकिन अब इसे कानून बना देने से CAPF के पूर्व जवानों और कानूनी विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं. यह बिल जहां DIG स्तर पर प्रमोशन के मौके बढ़ाता है, वहीं IG स्तर पर प्रमोशन की रुकावट को स्थायी कर देता है. यह सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों के उलट है जिनमें इन पदों को धीरे-धीरे खाली करने की बात कही गई थी.
प्रमोशन की सीढ़ी और उसका असर
IPS में राज्यों के बीच तबादले आसान होते हैं, लेकिन CAPF में प्रमोशन पूरी तरह ऊपर की सीट खाली होने पर निर्भर करता है. कांस्टेबल से लेकर IG तक एक सीधी चेन होती है और अगर ऊपर के पद पर बाहर से कोई IPS अफसर आ जाता है, तो नीचे के सभी लोगों का प्रमोशन रुक जाता है. जिसे IG बनना था वह DIG रह जाता है, और जिसे DIG बनना था वह कमांडेंट ही रह जाता है.
CRPF के रिटायर्ड ADG एचआर सिंह ने दिल्ली में CAPF के धरने के दौरान बिल्कुल सही कहा था, “ग्रुप-A स्तर पर प्रमोशन से एक चेन रिएक्शन शुरू होता है, जिससे निचले स्तर के कांस्टेबल भी आगे नहीं बढ़ पाते और उसी रैंक में फंसे रह जाते हैं.”
आंकड़ों में समझें तो, अगर IG के दो पद IPS अफसरों से भर दिए जाएं, तो CAPF के दो अफसर IG नहीं बन पाते. इससे दो DIG, दो कमांडेंट, दो सेकंड-इन-कमांड (2IC), दो डिप्टी कमांडेंट और दो असिस्टेंट कमांडेंट का प्रमोशन रुक जाता है. यह सिलसिला यहीं नहीं थमता.
एक इंस्पेक्टर, एक सब-इंस्पेक्टर, एक ASI, एक हेड कांस्टेबल और एक कांस्टेबल की तरक्की पर भी ब्रेक लग जाता है. कुल मिलाकर, IG के सिर्फ दो पदों की वजह से 10 अलग-अलग रैंकों में 15 प्रमोशन रुक सकते हैं. 10 लाख जवानों वाली इस विशाल फोर्स में, जहां IG के कई पद 50 प्रतिशत तक आरक्षित हैं, सैकड़ों अफसरों और जवानों का करियर लंबे समय तक अधर में अटक जाता है.
जमीनी हकीकत
इस सिस्टम का असली असर चौंकाने वाला है. मसलन, 2010 में CRPF या BSF में भर्ती हुआ कोई असिस्टेंट कमांडेंट 16 साल कठिन और खतरनाक हालात में काम करने के बाद भी अपने पहले प्रमोशन, यानी डिप्टी कमांडेंट, का इंतिजार कर रहा हो सकता है. इसके उलट, 2012 बैच का एक IPS अफसर सिर्फ 14 साल की सेवा में CAPF में DIG बन चुका होता है. एक IPS अफसर आमतौर पर 13 साल में DIG और 18 साल में IG बन जाता है, जबकि CAPF अफसर को इन पदों तक पहुंचने में 30 साल से ज्यादा लग सकते हैं.
इतिहास गवाह है कि CAPF के 34 अफसरों के एक बैच में से सिर्फ दो ही ADG बन पाए. मौजूदा समय में BSF में ADG के चारों पद 1995 से 1997 बैच के IPS अफसरों के पास हैं, जबकि BSF के सबसे वरिष्ठ अफसर, जो 1987 बैच के हैं, अभी भी IG पद पर हैं. 2026 की शुरुआत में जब संसद में CAPF में करीब 93,000 खाली पदों का मुद्दा उठा, तो सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल सही टिप्पणी की थी कि ‘प्रमोशन में रुकावट’ ही जवानों की सबसे बड़ी समस्या है.
जवान क्यों मायने रखते हैं
अभी तक बहस का केंद्रबिंदु गज़टेड अधिकारी रहे हैं, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है, क्योंकि सीमाओं और बस्तर के घने जंगलों में गश्त करने वाला फ्रंटलाइन जवान भी इस डेपुटेशन सिस्टम का उतना ही बड़ा भुक्तभोगी है. जब ऊपर का रास्ता बंद होता है, तो नॉन-गज़टेड अधिकारी भी आगे नहीं बढ़ पाते.
सालों से हेड कांस्टेबल बनने का इंतिजार कर रहे कांस्टेबल या ASI रैंक का इंतजार कर रहे हेड कांस्टेबल अक्सर राष्ट्रीय चर्चाओं से गायब रहते हैं. यह ठहराव सीधे तौर पर उनके मनोबल और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति पर असर डालता है.
बिल की सबसे बड़ी कमी
यह बिल DIG स्तर पर IPS डेपुटेशन को 20 प्रतिशत से घटाकर शून्य करके निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम उठाता है. लेकिन यह रियायत एक अधिक गंभीर ढांचागत समस्या को भी सामने लाती है: कानून बनाकर IG स्तर पर IPS डेपुटेशन को स्थायी रूप से तय कर देना.
एक लचीले एग्जीक्यूटिव ऑर्डर को कानूनी प्रावधान में बदलने से सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश कमजोर पड़ जाता है, जिसमें डेपुटेशन को धीरे-धीरे कम करने की बात कही गई थी. अब इसे बदलने के लिए संसद में नया कानून लाना पड़ेगा. इसी स्थायी रुकावट की वजह से विपक्षी नेताओं ने इस बिल को संसदीय स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की थी, और कई रिटायर्ड CAPF अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले (मई 2025) की अवमानना याचिका भी दायर की है.
संसद को क्या पूछना चाहिए
सांसदों को इस मुद्दे के पूरे दायरे पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें यह सवाल उठाना चाहिए कि बाहरी अधिकारियों की तैनाती के कारण कितने DIG और कमांडेंट का करियर अटका हुआ है. उन अनगिनत निचले रैंक के कर्मचारियों का क्या, जिनका भविष्य इस ऊपरी रुकावट की वजह से थम गया है.
93,000 खाली पदों की समस्या से जूझ रही फोर्स के लिए नेतृत्व के रास्ते को कानूनी रूप से सीमित करना जवानों के मनोबल पर भारी असर डालता है. संसद को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि अपने संवैधानिक महत्व और अदालत में चल रही सुनवाई के बावजूद, इस बिल को समिति की समीक्षा से दूर क्यों रखा गया. IG के दो पद भले छोटे दिखें, लेकिन इनके कारण प्रमोशन में रुकावटों का जो सिलसिला शुरू होता है, वह पांचों CAPF में फैलता है और सीमा पर तैनात जवान से लेकर महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा में लगे हर बलकर्मी को प्रभावित करता है. संसद को सिर्फ ऊपरी स्तर के लिए नहीं, बल्कि इस पूरी श्रृंखला के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा.
तरुण कुमार बनजारे UPSC CAPF 2004 बैच के एक रिटायर्ड गजटेड अधिकारी हैं, जिन्होंने ITBP और भारतीय नौसेना में 27 साल तक सेवा की है. वे @tarundgg के नाम से ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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