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Wednesday, 4 March, 2026
होममत-विमत‘PM मोदी नाराज़ हैं’ वाला नैरेटिव एक कम्युनिकेशन डिजास्टर है, BJP की ऑप्टिक्स टीम पकड़ खो रही है

‘PM मोदी नाराज़ हैं’ वाला नैरेटिव एक कम्युनिकेशन डिजास्टर है, BJP की ऑप्टिक्स टीम पकड़ खो रही है

‘मोदी नाराज़ हैं’ वाली हेडलाइनों पर चर्चित हलकों की एक खास प्रतिक्रिया आ रही है: ‘तो सोनिया नाराज़ हैं.’

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पिछले हफ्ते हेडलाइनों में लिखा गया कि प्रधानमंत्री नाराज़ हैं और जवाबदेही चाहते हैं. यह सब आठवीं क्लास की एक किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले हिस्से पर चल रहे बड़े विवाद के बीच सामने आया. “कौन देख रहा है ये सब?” एक सरकारी सूत्र ने गुस्से में मोदी के यह शब्द एनडीटीवी को बताते हुए कहा.

इन हेडलाइनों और बयानों पर चर्चित लोगों की दिलचस्प प्रतिक्रिया आई: “तो सोनिया नाराज़ हैं.” यह दरअसल मनमोहन सिंह के दौर से तुलना करने की एक व्यंग्यात्मक कोशिश थी. 2004 से 2014 के बीच अक्सर हेडलाइनों में लिखा जाता था कि उस समय की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी किसी न किसी सरकारी फैसले से नाखुश, नाराज़ या परेशान हैं. इससे सरकार पर गांधी परिवार की पकड़ मजबूत दिखती थी, मंत्रियों और पीएमओ पर दबाव बना रहता था और अगर किसी अलोकप्रिय या विवादित फैसले पर जनता की नाराज़गी होती थी तो गांधी परिवार जवाबदेही से बचा रहता था.

मई 2014 के बाद ऐसी हेडलाइंस बंद हो गईं. प्रधानमंत्री या उनके मंत्रियों से जवाबदेही मांगने के लिए कोई ‘सुपर पीएम’ नहीं था. उसके बाद जवाबदेही का मुद्दा शायद ही कभी उठा—न तब जब ट्रेन हादसों में सैकड़ों लोग मारे गए, न तब जब आतंकी हमलों, सांप्रदायिक दंगों या रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में दर्जनों लोगों की जान गई, और न ही तब जब एआई इम्पैक्ट समिट में भारी कुप्रबंधन और चीन के रोबोडॉग विवाद के कारण भारत को अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी झेलनी पड़ी.

पिछले लगभग 12 सालों में मंत्रियों से जवाब मांगने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि विपक्षी कांग्रेस को आज़ादी के बाद से अपने काम और गलतियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा और अगर पुराने मामलों से लोगों की दिलचस्पी कम होने लगती, तो कांग्रेस खुद ही नए मुद्दे दे देती. उदाहरण के लिए, देखिए कैसे प्रधानमंत्री एआई समिट में विपक्ष के शर्टलेस प्रदर्शन को भारत को बदनाम करने के तौर पर बार-बार उठा रहे हैं.

तो अचानक ऐसा क्या हो गया? पीएम मोदी अचानक अपने मंत्रियों से क्यों नाराज़ हो गए? यह मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत की स्कूल की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले हिस्से पर कड़ी प्रतिक्रिया की वजह नहीं हो सकती. वे सरकार की सबसे बड़ी चिंता नहीं हैं. यह राजनीतिक नुकसान की वजह से भी नहीं था. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियम राजनीतिक रूप से ज्यादा नुकसानदेह थे, क्योंकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के ऊंची जाति के नेताओं ने भी उनका विरोध किया. फिर भी, तब प्रधानमंत्री नाराज़ नहीं हुए और न ही जवाबदेही मांगी.

कम्युनिकेशन में गड़बड़ी

सच यह है कि ‘पीएम मोदी नाराज़ हैं’ वाला नैरेटिव एक कम्युनिकेशन डिजास्टर है. इसका मतलब यह निकलता है कि पीएम मोदी अपनी सरकार पर पूरी तरह नियंत्रण में नहीं हैं और उनके मंत्री व अधिकारी अपनी मर्जी से काम चला रहे हैं. लोगों के बीच यह धारणा रही है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की मंजूरी के बिना सरकार में सुई भी नहीं हिलती. यही धारणा पीएम मोदी की उस छवि से जुड़ी है कि वे पूरी तरह नियंत्रण रखने वाले नेता हैं. ऐसे में यह कहना कि स्कूल की किताब में बदलाव की जानकारी उन्हें नहीं थी और इसी वजह से वे नाराज़ हुए, उनकी छवि को नुकसान पहुंचाता है. यह दूसरी बात है कि प्रधानमंत्री को सरकार की हर छोटी-बड़ी बात पता नहीं हो सकती, लेकिन उनकी छवि इसी तरह बनाई गई है.

‘नाराज़ मोदी’ वाला नैरेटिव यह भी दिखाता है कि प्रधानमंत्री की कम्युनिकेशन और ऑप्टिक्स टीम अपनी पकड़ खो रही है. उदाहरण के लिए, सोचिए कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक प्रस्ताव पास किया कि वह 140 करोड़ लोगों के हित में हर फैसला लेगा. सोशल मीडिया पर तुरंत सवाल उठे कि अब तक कैबिनेट किसके हित में फैसले ले रही थी? यह प्रतिक्रिया कोई हैरानी वाली नहीं थी. जिसने भी यह शपथ वाला विचार दिया, वह कमाल का दिमाग रहा होगा. और जिसने मंत्री हरदीप पुरी को एपस्टीन फाइल्स में उनका नाम आने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सफाई देने की सलाह दी, वह भी कमाल का था. आखिरी बार कब मोदी सरकार के किसी मंत्री ने सिर्फ आरोप खारिज करने के बजाय विपक्ष के आरोपों पर इतनी विस्तार से सफाई दी थी? उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस की वजह से, जो आरोप पहले सिर्फ कुछ विपक्षी नेताओं की एक्स पोस्ट तक सीमित थे, वे कई दिनों तक सुर्खियों में छाए रहे.

यह नहीं कहा जा रहा कि मंत्री को जवाब नहीं देना चाहिए था, लेकिन यह इस सरकार की शैली नहीं रही है. यह आम तौर पर आरोपों को नज़रअंदाज़ कर देती है और मुद्दे को खुद-ब-खुद ठंडा पड़ने देती है.

ये तो हाल के कुछ उदाहरण हैं. बीजेपी की कम्युनिकेशन रणनीति में दरारें 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ही दिखने लगी थीं, जब वह विपक्ष के ‘संविधान बचाओ’ अभियान का ठीक से जवाब नहीं दे पाई और याद कीजिए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकार की कम्युनिकेशन टीम ने कैसे गड़बड़ी की, जिससे टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के दक्षिणपंथी समर्थकों ने कहानी की दिशा तय कर ली. ऑपरेशन सिंदूर बड़ी सफलता थी, लेकिन इससे वैसा जनउत्सव नहीं हुआ, जैसा बीजेपी ने शायद उम्मीद की थी.


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नैरेटिव से भटकने का बुरा वक्त

बीजेपी और सरकार की कम्युनिकेशन टीम—चाहे वह प्रधानमंत्री कार्यालय में हो या बाहर—के नैरेटिव से भटकने के ऐसे कई उदाहरण हैं. साफ दिख रहा है कि 12 साल बाद उनके पास नए विचार और नई सोच की कमी होने लगी है.

यह इससे खराब समय पर नहीं हो सकता था. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बदलते और अनिश्चित फैसले ‘विश्वगुरु’ वाले नैरेटिव को कमज़ोर कर रहे हैं. विपक्ष पर पीएम मोदी के भ्रष्टाचार वाले हमले भी अब पहले जैसे असरदार नहीं रहे, क्योंकि कई बड़े मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियां विपक्षी नेताओं के खिलाफ ठोस नतीजे नहीं ला पाईं. कथित शराब घोटाले के मामले में पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और 22 अन्य लोगों को बरी किया जाना इसका ताज़ा उदाहरण है. पिछले हफ्ते ही पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और नेशनल हेराल्ड अखबार के प्रकाशक एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड को ज़मीन आवंटन मामले में राहत दे दी.

यह भी बीजेपी के लिए अच्छा नहीं है कि मोदी कैबिनेट के एक मंत्री जीतन राम मांझी खुद यह मान लें कि उन्होंने क्षेत्रीय विकास निधि से कमीशन लिया और दूसरे नेताओं को भी ऐसा करने की सलाह दी. पिछले हफ्ते ही योगी आदित्यनाथ सरकार के एक बीजेपी मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक पर आयकर विभाग की छापेमारी पर सवाल उठाए और पूछा कि क्या यह “राजनीतिक बदले की भावना” का नतीजा है.

इन सब पर बीजेपी की कम्युनिकेशन टीम चुप है और लोगों को खुद ही नतीजे निकालने दे रही है. आने वाले हफ्तों और महीनों में मोदी सरकार के सामने और भी कई चुनौतियां आ सकती हैं — अगली बड़ी चुनौती भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हो सकती है, जिसके खिलाफ विपक्ष ने इसे किसान विरोधी बताते हुए अभियान शुरू कर दिया है.

पीएम मोदी अपने 12वें साल में भी लोकप्रिय बने हुए हैं, लेकिन बीजेपी अपनी सबसे बड़ी ताकतों में से एक—कम्युनिकेशन और इमेज मैनेजमेंट, को कमज़ोर नहीं पड़ने दे सकती. अपने तीसरे कार्यकाल में पीएम मोदी को इसकी बिल्कुल ज़रूरत नहीं है.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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