धड़तीपकड़ से लेकर रॉबिनहुड तक रहे हैं इस चुनाव की शान/ दिप्रिंट टीम
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2014 के लोकसभा चुनाव में जिस कानपुर महानगर की लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल जैसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी का पिछले तीन चुनावों से चला आ रहा कब्जा समाप्त कर लोकसभा पहुंचे थे, उसी में कभी अपनी तरह के एक अनूठे चुनावबाज हुआ करते थे-भगवती प्रसाद दीक्षित उर्फ घोड़ेवाला! उनकी पहचान थी-सिर पर जेम्स बांड जैसा काला हैट, हाथ में सफेद झंडा, फ्रेंचकट दाढ़ी और पुराने सैनिकों जैसी पतलून. जो भी उन्हें इस हुलिये में देखता, उसे बरबस रॉबिन हुड की याद आ जाती. इसलिए कई लोग उनको रॉबिनहुड ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स भी कहते थे.

यह वैसी ही बात थी जैसे कई विदेशी पत्रकार 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को चुनौती देने रायबरेली पहुंचे राजनारायण को इंडियन जिमी कार्टर कहा करते थे.

कोई बारह साल पहले दुनिया को अलविदा कह गये भगवती प्रसाद दीक्षित उर्फ घोड़े वाला को चुनाव मैदान में उतरने का जुनून-सा था. इस कदर कि उन्होंने अपने जिन्दा रहते विधायकी व सांसदी से लेकर देश के राष्ट्रपति तक के कोई चार दर्जन चुनावों में नामजदगी के परचे भरे व इनमें से अधिकतर लड़े भी. अलबत्ता, जीते एक बार भी नहीं और न ही किसी राजनीतिक पार्टी का दामन थामा. वे घोड़े पर सवार होकर चुनाव प्रचार के लिए निकलते और मतदाताओं से कहते थे-कोई भी पार्टी या नेता ठीक नहीं है. इसलिए मैं उनमें से किसी में नहीं हूं और ‘एकला चलो’ के नारे में विश्वास करता हूं.
चुनाव में वे जिस भी क्षेत्र में प्रचार करने जाते, लोगों से हाथ मिलाते और नारा लगवाते-‘हाय हाय न किच-किच, भगवती प्रसाद दीक्षित!’


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उन्हीं जैसे अलबेले थे बरेली के बाबा जोगेन्दर सिंह उर्फ धरतीपकड़ भी. उनके जैसे ही चुनाव लड़ने के शौकीन. फर्क सिर्फ इतना कि वे घोड़े पर सवार होकर नहीं साइकिल के पैडल मारते हुए चलते, जबकि उनकी सुरक्षा में लगे पुलिस के सिपाही मोटर साइकिलों पर सवार होकर उनके आगे पीछे लगे रहते. बरेली, लखनऊ और दिल्ली के कई विधानसभा व लोकसभा चुनावों में निर्दल प्रत्याशी के रूप में अपनी धांसू उपस्थिति दर्ज कराने वाले धरतीपकड़ ने कई बार राष्ट्रपति चुनाव में भी जोर आजमाया. लेकिन घोड़ेवाला की ही तरह उनको भी कभी जीत नसीब नहीं हुई.

कई बार धरतीपकड़ अपनी साइकिल से उतरकर अखबारों के दफ्तरों में आते तो उनके दोनों हाथों में दो हरे रंग के झोले होते. एक झोला किसी को पकड़ाकर दूसरे झोले से लाई, चिरौंजी के दाने, काजू और किशमिश आदि निकालकर मुसकुराते हुए वे दफ्तर में उपस्थित हर किसी को देते.

2009 के लोकसभा चुनाव से थोड़ा पहले उनका भी देहांत हो गया और घोड़ेवाला की ही तरह उनकी पारी भी थम गई. लेकिन इन दोनों प्रत्याशियों के बगैर खास चुनावी मुकाबले आज भी सूने-सूने और बेरंग-से लगते हैं. इसलिए और भी कि अब कांटे की टक्कर में फंसने से बचने के लिए ‘सुरक्षित’ (आरक्षित नहीं, समीकरणों और संभावनाओं के लिहाज से जीत की गारंटी प्रदान करने वाली) सीटें ढूढ़ने वाले नेताओं का दौर आ गया है और डाॅ.राममनोहर लोहिया व राजनारायण जैसे नेताओं का पूरी तरह अकाल है, जो जीत-हार की चिंता किये बिना चुनावों को अपनी व अपनी पार्टी की नीतियों के प्रचार-प्रसार का अवसर मानकर मैदान में उतरें और प्रबलतम प्रतिद्वंद्वियों से जा भिड़ें. यहां तक कि प्रधानमंत्रियों को भी न बख्शें.


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2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने वाराणसी में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जोर आजमाइश कर कुछ हद तक राजनारायण की याद दिलाई थी, लेकिन उनके लिए मुकाबले को वह रंग देना संभव नहीं हुआ था, 1980 के लोकसभा में राजनारायण ने इसी सीट पर कांगे्रस के दिग्गज नेता कमलापति त्रिपाठी को घेरकर उसमें जो रंग भरा था.

कुछ ऊंट बिना नकेल होइ गय

देश की बेढब चुनावी राजनीति की विडम्बनाओं पर व्यंग्य करने और उसका मजाक उड़ाने का कवियों का शौक बहुत पुराना है. 1977 में इमर्जेंसी की काली रात के बाद आम चुनाव घोषित हुए और कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता जनता पार्टी की शक्ल अख्तियार करके मतदाताओं सामने आई तो कई कवियों ने उसे भी अपना शिकार बनाया. एक कवि ने लिखा-

हुए विरोधी एक सब पहुंचा हमको कष्ट,
बने हवाई किले जो सभी हो गये नष्ट.
सभी हो गये नष्ट हमारा था यह पेशा,
आठ झंडियां रखते थे हम पास हमेशा.
जिस दफ्तर में जाते वैसी फ्लैग लगाते,
कहते वोट तुम्हें देंगे तर माल उड़ाते!

लेकिन देश के भविष्य के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण इन चुनावों में नवगठित जनता पार्टी देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांगे्रस को छकाकर शान से जीती और केन्द्र में सत्तारूढ़ होकर देशवासियों के दूसरी आजादी के सुनहरे सपने को साकार करती-करती अचानक अपने नेताओं केी महत्वाकांक्षाओं के संघर्ष में भरभराकर गिर पड़ी, तो बाबा नागार्जुन ने ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ शीर्षक महत्वपूर्ण युगांतरकारी रचना रची, जिसकी बहुत चर्चा हुई. सरकारें चुनने वाले मतदाताओं की बेबसी को उजागर करने वाली अवधी के वरिष्ठ कवि रमई काका की एक अन्य कविता भी उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुई थी जिसके बोल थे-

हम तौ चुना वनकां रहै कल्यान करिहैं देस का
सरकार मुलु जब फेल होइ गइ हम बताओ का करी?
वादा किहिन मिलि कै चलब हम सब जने यक राह पै
मुलु बादि कां बेमेल होइ गय हम बताओ का करी?
सजि कै चला यक काफिला आधा मरुस्थल पार भा,
कुछ ऊंट बिना नकेल होइ गय हम बताओ का करी?
वोट के साथ एक भेली गुड़!

वोट मांगने वाले छोटे बड़े नेता तो आपने बहुत देखे होंगे, लेकिन क्या आपने कोई ऐसा भी नेता देखा है जो वोट मांगने आये तो ढिठाई से एक भेली गुड़ की मांग भी कर बैठे?


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जी हां, 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बलरामपुर से चुनाव लड़ रहे समाजसेवी नाना जी देशमुख ने कुछ ऐसा ही किया था. समूचे चुनाव प्रचार में अपने क्षेत्र के किसान मतदाताओं से एक भेली गुड़ की मांग करना उनके चुनाव प्रचार का स्टाइल स्टेटमेंट सा बन गया था.

उस चुनाव में बलरामपुर की महारानी उनके खिलाफ कांग्रेस की प्रत्याशी थीं और जनता पार्टी की लहर में उन्हें भारी पराजय झेलनी पड़ी थी. आपको याद होगा, बीच में वक्त में कुछ नेता फैशन के तौर पर एक वोट के साथ एक नोट भी मांगा करते थे.

(कृष्ण प्रताप सिंह फैज़ाबाद स्थित जनमोर्चा अखबार के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार है.)


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