Thursday, 7 July, 2022
होममत-विमतलिपुलेख पास से होकर कैलाश मानसरोवर के लिए नई सड़क तैयार, नेपाल क्यों कर रहा है इसका विरोध

लिपुलेख पास से होकर कैलाश मानसरोवर के लिए नई सड़क तैयार, नेपाल क्यों कर रहा है इसका विरोध

#CutTheClutter के 466वें एपिसोड में शेखर गुप्ता कैलाश मानसरोवर और लिपुलेख पास को लेकर भारत और नेपाल के बीच भू-राजनीति के बारे में बता रहे हैं.

Text Size:

नई दिल्ली: रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को पिथौरागढ़ से लिपुलेख पास तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था. इस सड़क के बन जाने के बाद कोई भी एक या दो दिन में कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर सकता है, और बिना किसी परेशानी से वहां आसानी से जा सकता है. इससे पहले वहां पहुंचने में पांच से सात दिन तक का समय लग जाता था, वहां पहुंचने के लिए पहले दो रास्तों से जाया जा सकता था, नाथू ला या काठमांडू.

इस सड़क के बन जाने से तीर्थ यात्रियों को आसानी हो जाएगी और इस दौरान 85 प्रतिशत यात्रा भारतीय क्षेत्र में होगी.

सड़क का नेपाल में विरोध

इस सड़क का नेपाल में विरोध हुआ है. नेपाल द्विपक्षीय बातचीत चाहता है. भारत ने कहा है कि जमीन हमारी है. इससे पहले अनुच्छेद 370 कि बाद जब भारत ने नक्शा पास किया था जिसमें लिपुलेख पास को भारत में दिखाया गया था तो भी नेपाल ने इसका विरोध किया था और आपत्ति जताई थी.

1815-1816 में अंग्रेजों और नेपाल के राजा के बीच लड़ाई हुई थी. नेपाल ने भारत के इलाके में कब्ज़ा कर लिया था, जिसके बाद सुगौली में एक संधि हुई थी. संधि के बाद नेपाल से कब्ज़ा वापस ले लिए गया था और कहा गया था काली नदी के पश्चिम में नेपाल का कुछ नहीं रहेगा.

1857 में नेपाल के राजा जंग बहादुर ने अंग्रेजों की बहुत मदद की. अंग्रेजों ने खुश होकर उनको जमीन दे दी थी पर नेपालियों का कहना है कि नक़्शे में लिपुलेख पास को शिफ्ट किया गया था. लेकिन, अंग्रेजों ने नहीं माना. 19वीं सदी में अंग्रजों ने ग्रेट गेम कि दौरान माउंट आपी पर कब्ज़ा कर रखा था, जो कि 20000 फ़ीट ऊंची है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

इस वक़्त नेपाल की राजनीति गरम है. वहां पर भी राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी है. 1954 में भारत और चीन का समझौता हुआ था जिसमें लिपुलेख पास था, फिर 2015 में समझौता हुआ जिसमें तीन जगहों से व्यापार करने की बात थी, उसमें लिपुलेख, नाथु ला, शिपकी ला का जिक्र था. 1961 में भी नेपाल और चीन का समझौता हुआ था.

ताजा सीटीसी एपिसोड को यहां देखें:

2005 में इस सड़क को बनाने की बात हुई थी लेकिन फिर यह काम रुक गया. 2018 में सीसीएस ने इसे 440 करोड़ की लागत से बनाने की अनुमति दी थी. इस वक़्त भारत और नेपाल की 99 प्रतिशत बॉर्डर समस्या सुलझी हुई है.

share & View comments

7 टिप्पणी

  1. यिनको कैसे द प्रीन्ट जैसे पेपर और न्युज साइट पर पत्रकारका जागिर मिला ? वे दो एसे देशके बारेमे समाचार बना और टिप्पणी कर रहे है जिन के थोडे पढेलेखे लोग एक दुशरे देशकि इतिहास भलिभाती जानती है ।लेकिन ईश मामले को गुप्ता जि ने इत्नि हल्की से लिया है कि ईश टिप्पणीमे कए गलत बाते बता रहे है । जैसे जङ बहादुर को राजा बताना । काली नदि और अपि हिमाल पर अंग्रेज़ का कब्जा बताना । और कए बाते है जो अल्प ज्ञान और नासम्झी दिखाती है । अरे भारतिय हो इसका मतलब थोडी है कि सच भि पता न कर झुठे समाचार बनओ । हद है ।

  2. अब कितना किराया पड़ेगा? मान सरोबार की

  3. लिखने की आज़ादी है आपको इसका मतलब ये नही की कुछ भी लिख दो । एक छोटा सा देश अपने से ताकतबर देश की भूमि कब्जा करके क्यों अग्रेजो से दुश्मनी मोल लेते ! अपने पीठ का मैल दिखता नही किसीको ।भारत की गिद्ध नजर नेपाल की जमीन पर पड़ा है ।यह पाकिस्तान नही गोरख़ालियों का देश है माकूल जबाब मिलेगा भारत को ।इससे पहले नेपाल का भूमि लीपुलखे दर्रे से कब्जा छोड़ो ।

    • भाइ साहब आपको पता होना चाहिए।
      की जो सड़क बन रहा है उससे सबसे ज्यादा नेपाल को हीं फायदा होगा।
      सड़क के किनारे आपको बिजनेश मिलेगा।
      उस सड़क के माध्यम से वहां के लोगों को रोजगार मिलेगा।

      रही बात भारत की तो आप लोग एक बात कान खोलकर सून लीजिए।
      अगर भारत के लोग पांच दिन नेपाल मे जाना है बंद कर दें तो उतनाहीं मे सारा अकड़ निकल जायेगा।
      भारत का खा कर चाइना मत गाओ।
      भूकंप में भारत ने कितना मदद किया वो दिन भूल गये।
      कल होकर इंडिया अगर राशन डिजल पेट्रोल आना जाना और नेपाली को इंडिया मे रहना बैन कर दे।
      तो तुरन्त होश ठिकाने लग जायेगा।

      मै हर साल पशुपति नाथ जाता था।।
      लेकिन तुम्हारा ये अकड़ देखकर नहीं जाऊंगा।
      केदार नाथ जाएंगे
      बदरीनाथ जाएंगे।
      अमरनाथ जाएंगे।
      कि इंडिया का पैसा इंडिया मे रहे।
      तुम लोग सोंच लो अगर इंडिया से नेपाली लोग को जाना पड़ गया।
      तो तुम्हारे पास उतना जगह नहीं है कि रख पाओगे
      और एक महिना नहीं लगेगा।
      जी डी पी ।
      तुम्हारा चला जायेगा तेल लेने

      • Just because a large country helps a small country, it does not mean they can take their land and call it their own. Lipulekh was always a Nepali territory. Yes the route will create business opportunities for us but that doesn’t mean you can construct a road on other’s territory without asking them and call that a help. It’s terrorism. India should back off from Nepali land.

  4. Oh nepalki bhumi hai yeh jo bhi kiya bharatne galat kiya hai..ek baar raay leke karna chahiyatha aapasi samajdaari k bina yeh toh dadagiri ke sivay aur kuchh nahi dikhta aur yeah patra kaar ki bhi nasamjhi dekhai derahi hai..kuchh bhi lekhraha hai

  5. मेरे नेपाली दोस्तों ये मामला अभी अचानक नहीं आया है इससे पहले भी इस मामले को आगे बढ़ाने का काम शुरु कर दिया गया था. भारत ये रास्ता सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ दर्शन के लिए जाने वाले श्रध्दालुओ के लिए बना रहा है. आप सोचिए नथुला के रास्ते जाने के लिए वहाँ सीमित सामान ही लेकर जाया जा सकता है बाकी वहीं चीनियों से ही खरीदना पड़ता है आपका औऱ हमारे भारत का इतना अच्छा व्यापार संधि है जिससे हर साल हम आपसे ठण्ड के समय में आपसे खरीददारी करते है अगर ये मार्ग बन जाता है तो आपको अन्य सामानों के लिए भी नया व्यापार का माध्यम मिल ही जाएगा. जो चीनी कभी किसी के नहीं हुए वो आपके क्या होंगे . औऱ भारत तो हमेंशा से ही आपके औऱ आपको सहयोगी बनकर सहयोग करता आया है. इतिहास गवाह है भारत कभी भी अपने पड़ोसी देश पे कभी भी पहला वार ना तो किया है ना करेगा. हमनें वसुधैव कुटुम्बकम की माना है लालच या लूटपाट कभी नहीं की.

    तो आप हमारे अपने है मन से किसी भी प्रकार की शंका को दूर कर लीजिए

    जय हिंद जय भारत
    वंदेमातरम
    जय भारत भूमि

Comments are closed.