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Sunday, 1 October, 2023
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NCERT की किताबों से सेक्युलर सोच वाले नागरिक नहीं बनाए जा सकते, ऐसा होता तो BJP कभी सत्ता में नहीं आती

अगर हम इस खुशफहमी से मुक्त हो जाएं कि पाठ्यपुस्तकें सच्चाई का सागर हैं और छात्र एक खाली और खुली गागर तो शायद हम इस बाबत एक संतुलित दृष्टिकोण अपना सकें कि पाठ्यपुस्तकें क्या कर सकती और क्या नहीं कर सकती हैं.

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भारतीय रेलवे के बारे में पुराने दिनों से एक चुटकुला चला आ रहा है. दो यात्री इस बात को लेकर आपस में झगड़ रहे थे कि शीशे वाली खिड़की खोली जाये या नहीं. एक यात्री को खिड़की खोलने पर कंपकंपी छूट रही थी जबकि दूसरे का खिड़की बंद होने पर दम घुट रहा था. एक बच्चा जो दोनों के बीच चल रही तकरार को बड़े गौर से सुन रहा था, अचानक बीच में बोल पड़ाः “लेकिन अंकल इस खिड़की में तो शीशा है ही नहीं.”

कभी-कभी मुझे लगता है कि पाठ्यपुस्तकों को लेकर होने वाली गर्मागर्म बहस की भी यही दशा है. हम सब मानकर चलते हैं कि खिड़की में शीशा मौजूद तो है ही ! मतलब, हम पाठ्यपुस्तक में अगर कुछ लिखते हैं या उसमें से हटा देते हैं तो उसका असर छात्रों के सोच और बर्ताव पर होना ही होना है. दिप्रिन्ट ओपिनियन की संपादक रमा लक्ष्मी ने इस बात को बड़े धारदार ढंग से बयान किया है: “पाठ्यपुस्तकों को लेकर होने वाली कुश्ती अब गये जमाने की बात हो चली. इस अखाड़े के पहलवान गलत ही ये मानकर चलते हैं कि स्कूली बच्चे क्लासरूम में एकदम से खाली दिमाग बैठते हैं और उन्हें ज्ञान पाने का कोई और झरोखा हासिल नहीं है.” सोशल मीडिया के प्रचलन में आ जाने से ऐसी खिड़कियां तो स्कूली बच्चों को बहुतायत में हासिल हो चुकी हैं लेकिन ऐसा सोशल मीडिया से पहले के वक्तों में भी था. देखने में अक्सर यही आता है कि झगड़ा बच्चों के पाठ्यपुस्तक को लेकर है लेकिन इसमें झगड़ रहे हैं बड़े-सयाने और यह झगड़ा हो भी रहा है बड़े-सयानों के लिए. लेकिन क्या पाठ्यपुस्तक का मसला इतने भर तक सीमित है ?

लेखक का नजरिया

प्रोफेसर कृष्ण कुमार के एक सूक्तिनुमा ईमेल को पढ़ते हुए मैंने बीते हफ्ते यही सवाल खुद से पूछा था. उन्होंने लगभग श्रद्धांजलि वाली भाषा में अपने ईमेल में लिखा था: “बारहवीं क्लास की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक आज अखबार के पहले पन्ने की सुर्खियों में है. आखिर वे लोग इस पर भी चढ़ दौड़े. बड़ी अच्छी किताब बनी थी, शिक्षा के क्षेत्र में एक नायाब योगदान.” ईमेल प्रोफेसर सुहास पळशीकर को लिखा गया था और कॉपी मुझे भी मार्क की गई थी. एनसीईआरटी की किताबों के बारे में इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे से आगाह करता यह ईमेल था. प्रोफेसर कुमार ने ईमेल में दरअसल 12वीं क्लास के लिए तैयार की गई राजनीति विज्ञान की पुस्तक `स्वतंत्र भारत में राजनीति` का जिक्र किया था. यह पुस्तक नौवीं से लेकर बारहवीं तक की राजनीति विज्ञान की छह किताबों में एक है. इन किताबों के संपादन का काम प्रोफेसर पळशीकर और मेरे जिम्मे था. हमीं दोनों मुख्य संपादक थे. मतलब, आप चाहें तो कह लें कि हमीं दोनों इन किताबों के लिए `मुख्य अपराधी` हैं.

आप ही कहिए, प्रोफेसर कृष्ण कुमार के मुंह से अपनी ऐसी प्रशंसा सुनना भला किसे अच्छा नहीं लगेगा? हम जैसे कई लोग, शिक्षा — खासकर शिक्षण-सामग्री के बारे में कृष्ण कुमार के लिखे-बोले को ब्रह्म-वाक्य की तरह मानते हैं. प्रो. कुमार ने हिन्दी के बेहतरीन साप्ताहिक दिनमान से लिखना शुरू किया था. हिन्दी तथा अंग्रेजी में लिखे अपने लेखों के सहारे उन्होंने शिक्षा पर होने वाली सार्वजनिक बहस को, जो बजट-आबंटन, स्कूली इमारत तथा शिक्षक-छात्र अनुपात जैसे दैनंदिन के विषयों तक सिमटी हुई थी, एक बड़े फलक पर विस्तृत किया. उन्होंने स्कूली शिक्षण की पाठ्य-सामग्री के मुद्दे पर लगातार हमारा ध्यान आकर्षित किया है. शिक्षण के सिद्धांतों, शिक्षा पर हुई बहसों के इतिहास तथा शैक्षणिक बर्तावों की तुलनात्मक समझ के सहारे ये बताया है कि क्या कुछ छात्रों को पढ़ाने लायक है और उसे कैसे पढ़ाना चाहिए. उनका कहा इसलिए भी मानीखेज है क्योंकि वे साल 2004-2010 के बीच एनसीईआरटी के निदेशक थे और इसी दौरान साल 2005 में शिक्षा का एक नया तथा प्रगतिशील दर्शन (नेशनल कुरिकुलम फ्रेमवर्क) अपनाया गया जो एनसीईआरटी की किताबों के कायाकल्प का बायस बना. सो, प्रोफेसर कृष्ण कुमार से मिली सराहना मेरे लिए बड़ा मायने रखती है.


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ये बात भी सच है कि मेरे लिए इस किताब (स्वतंत्र भारत में राजनीति) के बारे में वस्तुनिष्ठ होकर सोच पाना कठिन है क्योंकि जो छह किताबें हमने तैयार कीं उनमें यह (स्वतंत्र भारत में राजनीति) मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है. इस किताब के बारे में कोई भी चर्चा मुझे जोश-ओ-ख़रोश से भरे उन दिनों की याद दिलाती है जब यह किताब तैयार की जा रही थी. एक न एक दिन किसी इतिहासकार को यह सोचकर आश्चर्य होगा कि आखिर स्वतंत्र भारत की राजनीति के बारे में तैयार की गई इस पहली आधिकारिक पुस्तक में आपात्काल (इमर्जेंसी), कश्मीर में चले संघर्ष, मिजोरम और नगालैंड में हुए विद्रोह, साल 1984 के सिक्खों के जनसंहार तथा 2002 में गुजरात में हुए मुसलमानों के कत्लेआम के बारे में इतना कुछ कैसे लिखा जा सका. किताब में ये बातें कैसे आ पायीं, इसके बारे में मैंने पहले भी लिखा है. एनसीईआरटी के लिए राजनीति विज्ञान की इन छह किताबों को तैयार करने में जो दो साल की कठिन मेहनत लगी थी, प्रोफेसर कुमार के ईमेल ने मानो उस पर मंजूरी की मोहर लगायी. बीते कुछ सालों में इन पाठ्यपुस्तक की जिस तरह काट-छांट की गई है उसे देखते हुए प्रोफेसर कुमार का ईमेल मेरे लिए किसी जख्म पर लगाये गये जरूरी मरहम की तरह था.

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पाठक का नजरिया

इन बातों के बावजूद ये सवाल कायम रहेगा कि: क्या पाठ्यपुस्तकों की अहमियत सचमुच उतनी है जितना कि हम मानकर चलते हैं? इस सिलसिले में मुझे एक वाकया याद आ रहा है. हरियाणा सरकार ने जब (2008 में) अपने स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों का चलन लागू किया तब मैं अपने गांव का स्कूल देखने गया था. स्कूल की नौवीं क्लास में समाज विज्ञान पढ़ाने वाले गुरूजी से पूछाः आपको राजनीति विज्ञान की किताब कैसी लगी?  गुरूजी ने विनम्र लेकिन अस्फुट स्वर में जो उत्तर दिया, उससे मुझे कुछ संदेह हुआ. पता चला कि गुरूजी को जो नई पाठ्यपुस्तक पढ़ानी है, उसका आवरण-पृष्ठ (कवरपेज) तक उन्होंने नहीं देखा और जो पाठ्यपुस्तक हटा दी गई है, उसके भी दर्शन करना गुरू जी ने जरूरी नहीं समझा था. दरअसल वे गाइड-बुक से तब भी पढ़ा रहे थे और अब भी पढ़ा रहे हैं. मुझे महसूस हुआ कि कोई पाठ्यपुस्तक उतनी ही अच्छी होती है जितना कि वह शिक्षक जो उसे छात्रों तक पहुंचाता है.

लेकिन बात यहीं तक नहीं रहनी थी, आगे ये जानकर मुझे और भी झटके लगने थे कि शिक्षक सचमुच जब पाठ्यपुस्तक का इस्तेमाल कक्षा में पढ़ाने के लिए करते हैं, तो ऐसी किताबों के साथ उनका बर्ताव क्या होता है. जहां तक इम्तिहान का सवाल है, वह किसी अच्छी से अच्छी पाठ्यपुस्तक जिस कदर बर्बाद कर सकती है, उतना तो कोई सरकार भी नहीं.

हां, कुछ स्कूल अपवाद-स्वरूप ऐसे जरूर मिल जायेंगे (मेरे बच्चों की पढ़ाई ऐसे ही एक स्कूल में हुई है) जिनमें सचमुच पाठ्यपुस्तकों और उनमें दिये गये चित्रों-रेखांकनों का इस्तेमाल होता है और उसी जज्बे से होता है जिस जज्बे से इन किताबों को तैयार किया गया है. इन पाठ्यपुस्तकों के जादू में बंधे पाठकों (अक्सर तो यूपीएससी के अभ्यर्थी) के बड़े प्यारे ईमेल आते थे. कई चिट्ठियां ऐसे भी छात्रों की मिलीं जिनका कहना था कि इन पाठ्यपुस्तकों के कारण ही उन्होंने बी.ए. की पढ़ाई में अपने लिए राजनीति विज्ञान का विषय चुना. ऐसी बातें बेशक बड़े संतोष की लग सकती है लेकिन खुद के चुने हुए इतने छोटे से नमूने से इस कड़वे विचार को गलत नहीं ठहराया जा सकता कि पाठ्यपुस्तकें बेअसर होती हैं.

बात चाहे जो भी हो, दृष्टांत-रूप इन चंद सबूतों की ओट लेकर उस पहाड़ को नहीं ढका जा सकता जो मुंह चिढ़ाते हुए हमारे सामने खड़ा है और जिसे न्यू इंडिया कहा जाता है. कड़वा सच ये है कि सेक्युलरी मिजाज की किताबें लोगों का मन-मानस बना पाने में सक्षम होतीं तो बीजेपी कभी सत्ता में आती ही नहीं. जिस दौर (2006 से 2023) में ये पाठ्यपुस्तकें चलन में रहीं उसी दौर में बीजेपी भी उभार पर रही और पढ़े-लिखे तथा नौजवान तबके के मतदाताओं (माना जा सकता है कि वे इन पाठ्यपुस्तकों के पाठक रहे होंगे) के बीच उसका वोटशेयर औसत से कहीं ऊपर रहा. इस तथ्य के सामने ये ढोल तो नहीं ही पीटा जा सकता कि पाठ्यपुस्तकें सेक्युलर और संवैधानिक मान-मूल्यों का सबसे बढ़िया वाहक होती हैं.

एक तीसरा नज़रिया

अगर हम इस खुशफहमी से मुक्त हो जाएं  कि पाठ्यपुस्तकें सच्चाई का सागर होती हैं और छात्र खाली और खुली गागर है तो शायद हम इस बाबत एक संतुलित दृष्टिकोण अपना पायें कि पाठ्यपुस्तकें क्या कर सकती और क्या नहीं कर सकती हैं. अच्छी पाठ्यपुस्तक अच्छे शिक्षकों तथा सीखने को उत्सुक विद्यार्थियों के एक छोटे से कुनबे के लिए सचमुच ही बड़ा सहारा साबित हो सकती है. जनमत के निर्माण में जो तबका सक्रिय होता है उसमें इस छोटे से कुनबे के लोग आनुपातिक रूप से कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में होते हैं. औसत दर्जे के शिक्षक और छात्र के लिए पाठ्यपुस्तकें तथ्यों की निशानदेही और सत्यापन का स्रोत होती हैं, बशर्ते कोई ऐसा करना चाहे. वहीं बदनीयती से लिखी और घटियापन का शिकार पाठ्यपुस्तक झूठी बातों और पूर्वाग्रहों को जायज ठहराने के कारण बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. अच्छी पाठ्यपुस्तक छात्रों और शिक्षकों को उपलब्ध एक मॉडल की तरह होती है जिसके सहारे वे आलोचना-बुद्धि से किसी चीज को देखना-समझना सीख पाते हैं और आगे चलकर इस रीत पर सोचना उनमें से कई लोगों की आदत में शुमार हो सकता है. और, इन सब बातों के साथ एक बात यह भी है कि पाठ्यपुस्तक भावी पीढ़ियों के लिए एक आधिकारिक अभिलेख होती है, हमारे अपने वक्तों के लिए किसी शिलालेख की तरह. हमें यह ध्यान ऱखना चाहिए कि एक औसत भारतीय घर में किताबों के नाम पर सिर्फ पाठयपुस्तके ही मिलती हैं.

लेकिन, इन सबसे जरूरी नहीं कि छात्र के चरित्र का निर्माण होता हो या उनमें किसी मान-मूल्य की प्रतिष्ठा होती हो. सदाचरण सिखाने का कोई भी उपदेश अक्सर तो उल्टा असर दिखाता है. छात्र के मां-बाप के अपने समय और समाज को लेकर जो आचार-विचार हैं, जो सामाजिक सोच और आचार प्रचलित हैं और शिक्षक का जो बर्ताव है— वह सब किसी कमसिन नागरिक के चरित्र-निर्माण में पाठ्यपुस्तकों की अपेक्षा कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका निभाता है. सार्वजनिक जीवन में किन नैतिक मूल्यों पर आचरण किया जाये, इसके बारे में नाबालिग छात्रों से पाठ्यपुस्तकों का संवाद कहानियों, दृष्टांतों, कार्टून्स तथा चित्रांकनों के जरिया होना चाहिए. पाठ्यपुस्तक ऐसी हो कि छात्र की उसमें रूचि पैदा हो जाये और जैसे साहित्य हमारी गहरी संवेदनाओं का स्पर्श करता है वैसा ही पाठ्यपुस्तक को भी करता होना चाहिए.

राजनीति विज्ञान की हमारी पाठ्यपुस्तकों ने ऐसा ही करने की कोशिश की थी. पहले जिस विषय को `सिविक्स`(नागरिक-शास्त्र) नाम से पढ़ाया जाता था, उसकी पाठ्यपुस्तकें उबाऊ, उपदेशपरक और तथ्यों के बोझ से लदी-फंदी हुआ करती थीं. एनसीईआरटी के लिए राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक तैयार करते हुए हम इस बात को लेकर दृढ़प्रतिज्ञ थे कि ऐसी किताबों का चलन खत्म करना है. राजनीति विज्ञान की नई किताबों में खूब सारे कार्टून लगाये गये थे जो छपे हुए शब्दों की तुलना में छात्रों को कहीं ज्यादा बातें बताते थे. उन्नी और मुन्नी नाम से इन किताबों में दो चुलबुले पात्र गढ़े गये थे जो अक्सर कठिन सवाल पूछते थे. स्वतंत्र भारत में राजनीति नाम की पाठ्यपुस्तक के हर अध्याय में छात्रों को संक्षिप्त कहानी बताते हुए किसी न किसी फिल्म को देखने की सलाह दी गई है. जब प्रोफेसर पळशीकर और मैंने इन पाठ्यपुस्तकों को लिखने का जिम्मा लिया तो हमारे मन में था कि किताब को कुछ इस खूबी से तैयार करना है कि आगे आने वाले वक्त की कोई भी सरकार सिविक्स सिखाने वाली पुरानी तर्ज की किताबें फिर से चलाना चाहे तो ऐसा कर पाना उसके लिए मुश्किल हो जाये. मुझे ये कहते हुए खुशी हो रही है कि इन पाठ्यपुस्तकों पर बेतरतीब कैंची चलाने की ढेर सारी कोशिशों के बावजूद वे लोग इन किताबों का रूप और आकार नहीं बदल पाये हैं. प्रोफेसर पळशीकर ने प्रोफेसर कृष्ण कुमार को अपने जवाबी ईमेल में लिखा भी है: “मजेदार बात तो ये है कि मौजूदा सरकार नयी पाठ्यपुस्तक अभी तक नहीं तैयार करवा सकी.” आज के समय में यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं.


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बीते 15 सालों में मुझे इस सच्चाई का भली-भांति पता चल गया है कि पाठ्यपुस्तकें ज्ञान और नैतिक आचरण सिखाने वाली वैसी कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि उनका जोर सब पर और हर घड़ी चलता ही हो. किसी अन्य पुस्तक की तरह पाठ्यपुस्तक को भी रूचि जगानी होती है और भावी पाठकों से सम्मान अर्जित करना होता है. इस सच्चाई को जान लेखक होने के मेरे अहम् को धक्का लगा. लेकिन वक्त बीतने के साथ मुझे इसमें उम्मीद की एक किरण दिखी है कि मौजूदा सरकार जैसी पाठ्यपुस्तकें चलाने पर अड़ी है, उसका हश्र आखिर को बुरा ही होना है. कम से कम राजनीति विज्ञान के मामले में पाठ्यपुस्तको की असफलता ऐसी भी कोई बुरी खबर नहीं. अगर पाठ्यपुस्तक तैयार करवाने वाले सत्ताधारी नागरिकों की भावी पीढ़ी के विचार नहीं गढ़ सकते तो यह बात हताशा नहीं बल्कि उम्मीद जगाती है.

(योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के संस्थापकों में से हैं. उनका ट्विटर हैंडल @_YogendraYadav है. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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