शायद नक्सलवाद पर सरकार का रुख मजबूती से रखने वाले पहले प्रधानमंत्री शांत स्वभाव के मनमोहन सिंह थे. पद संभालने के दो साल से भी कम समय में उन्होंने अल्ट्रा-लेफ्ट गुरिल्ला को “देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा” बताया था.
इन शब्दों को ऐसे समय में याद करना ज़रूरी है, जब दो दावे किए जा रहे हैं: पहला कि कांग्रेस (और अन्य गैर-भाजपा दल) ने इस उग्रवाद को बढ़ावा दिया और दूसरा कि मोदी सरकार ने 31 मार्च की समय-सीमा तक नक्सलवाद को खत्म कर दिया है.
तथ्य कुछ और संकेत देते हैं. अलग-अलग नेताओं के कभी-कभार अलग बयान हो सकते हैं, लेकिन राज्यों और केंद्र में सत्ता में रही लगभग सभी पार्टियों ने मिलकर गुरिल्ला के खिलाफ कार्रवाई की है.
यूपीए ने कैसे दिया जवाब
जिस यूपीए सरकार को अक्सर नक्सलियों के प्रति ‘नरम’ माना जाता है, उसने इस उग्रवाद का सामना कैसे किया?
21 सितंबर 2004 को अलग-अलग गुरिल्ला समूह मिलकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) बने, जिसने अगले दशक में सुरक्षा बलों पर कई घातक हमले किए. उसी दिन यूपीए ने दिल्ली में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई. दो हफ्ते बाद गृह मंत्रालय ने “नक्सलवाद की समस्या से ज्यादा प्रभावी और समन्वित तरीके से निपटने” के लिए एक टास्क फोर्स बनाई. इसमें नौ नक्सल प्रभावित राज्यों के नोडल अधिकारी शामिल थे.
तब तक बस्तर हिंसा का बड़ा केंद्र नहीं बना था. दंतेवाड़ा और बीजापुर की सड़कों पर लैंडमाइन नहीं बिछाई गई थीं. गुरिल्ला की संख्या भी कम थी और उनके हथियार भी सीमित थे.
फिर भी यूपीए ने अपनी कोशिशें तेज कर दी थीं.
2005 की गर्मियों में यूपीए के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम अभियान शुरू हुआ. इसका नेतृत्व कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने किया, जिसमें राज्य ने आदिवासी युवाओं को असॉल्ट राइफल देकर अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई में उतारा.
अप्रैल 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद पर मुख्यमंत्रियों की स्थायी समिति की दूसरी बैठक को संबोधित करते हुए इसे “देश के सामने अब तक की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती” बताया. आम तौर पर सख्त बयान कम देने वाले मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर स्पष्ट चिंता जताई.
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों में इस समस्या को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर सहमति है. उन्होंने कई उपायों की रूपरेखा दी: स्थानीय पुलिस को मजबूत करना, बेहतर हथियार देना, पुलिस थानों को सुरक्षित बनाना, खुफिया तंत्र मजबूत करना, पुलिसकर्मियों को प्रोत्साहन देना और नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले जवानों को अनावश्यक परेशानियों से बचाना. उन्होंने ‘पैरा-पुलिस’ जैसी व्यवस्था की ज़रूरत भी बताई.
मनमोहन सिंह ने कहा, “देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में हम कंजूसी नहीं करेंगे.”
यूपीए के रुख को 2010 में चेेरुकुरी राजकुमार के कथित फर्जी एनकाउंटर से भी समझा जा सकता है. राजकुमार माओवादी संगठन के प्रतिनिधि थे और केंद्र सरकार से बातचीत में शामिल रहे थे. उस समय गृह मंत्री पी. चिदंबरम को उनके सख्त रवैये को लेकर एक्टिविस्टों के विरोध का सामना करना पड़ा था.
लापरवाही या मिलीभगत से दूर, यूपीए ने उग्रवाद के खिलाफ लगातार कार्रवाई की. भाजपा द्वारा असहमति जताने वालों को ‘अर्बन नक्सल’ कहे जाने से पहले यूपीए ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि “शहरों में सीपीआई (माओवादी) के विचारक और समर्थक इस आंदोलन को जिंदा रखते हैं और कई मामलों में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के कैडर से भी ज्यादा खतरनाक हैं.”
राज्यों में नेतृत्व
हर नक्सल प्रभावित राज्य ने अपनी-अपनी रणनीति बनाई और कई बार एक-दूसरे से सीख भी ली. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के एन. चंद्रबाबू नायडू ने इसे मिशन की तरह लिया. बाद में वाईएस राजशेखर रेड्डी की सरकार के दौरान भी यह प्रयास जारी रहा और राज्य ने अपने क्षेत्र से नक्सल प्रभाव को काफी हद तक खत्म कर दिया.
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद देश के सबसे बड़े एनकाउंटर में से एक हुआ, जब नवंबर 2011 में मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी मारा गया.
कई साल बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के भूपेश बघेल ने भी आलोचनाओं के बावजूद नक्सलवाद के सामने झुकने से इनकार किया. इसी दौरान राज्यों ने अपनी-अपनी एंटी-नक्सल यूनिट भी बनाई—आंध्र प्रदेश में ग्रेहाउंड्स, महाराष्ट्र में सी-60 और छत्तीसगढ़ में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड.
दरअसल, भाजपा सरकार की लापरवाही के कारण भारत में किसी राजनीतिक दल पर हुए सबसे घातक नक्सली हमले का शिकार कांग्रेस बनी. मई 2013 में एक नक्सली हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई बड़े नेता मारे गए, जिनमें प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ल शामिल थे. उस समय छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी. रिपोर्टों में कहा गया कि बस्तर से लौट रहे कांग्रेस काफिले की सुरक्षा में लापरवाही बरती गई थी. यह हमला विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुआ था और पार्टी इस झटके से उबर नहीं पाई.
लगातार गिरावट
जब मई 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब तक नक्सलवाद पहले ही कमज़ोर पड़ने लगा था. 2013 में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के एक गोपनीय प्रस्ताव में माना गया था कि संगठन की ताकत, संख्या और हथियार काफी कम हो गए हैं.
इसके बाद भी कुछ सालों तक गुरिल्ला हमले करते रहे और सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाते रहे, लेकिन उनकी ताकत लगातार घटती गई.
नक्सलवाद कभी सिर्फ स्थानीय मांगों तक सीमित आंदोलन नहीं था, जैसे पूर्वोत्तर में नागा उग्रवाद. इसका उद्देश्य पूरे देश में सत्ता हासिल करना था और इसके राजनीतिक-सामाजिक लक्ष्य स्पष्ट थे. ‘लाल किले पर लाल झंडा’ का लक्ष्य 21वीं सदी के भारत में किसी गुरिल्ला संगठन के लिए बहुत बड़ा था.
करीब एक दशक तक नक्सली अजेय लगते थे, लेकिन धीरे-धीरे केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों में अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई और राज्यों ने अपनी विशेष यूनिट तैयार कीं. 2003 में छत्तीसगढ़ में पहला सीआरपीएफ बटालियन भेजा गया था. 2017 तक राज्य में 28 अर्धसैनिक बटालियन तैनात हो चुकी थीं. सुरक्षा बलों के पास बेहतर हथियार और निगरानी उपकरण आ गए, जिनके सामने आदिवासी गुरिल्ला टिक नहीं पाए.
अन्य कारण भी रहे. सरकारों ने तेज़ी से सड़क नेटवर्क बनाया, जिससे गुरिल्ला के ठिकाने कमज़ोर पड़े. मोबाइल फोन और सोलर चार्जर दूर-दराज के गांवों तक पहुंच गए. सबसे अहम बदलाव यह रहा कि मध्यम वर्ग का समर्थन कम हो गया. कोई भी भूमिगत आंदोलन शहरों, कॉलेजों और संस्थानों के नैतिक समर्थन के बिना लंबे समय तक नहीं चल सकता. भले ही वे सीधे हथियार या संसाधन न दें, लेकिन वे आंदोलन को वैचारिक आधार देते हैं और हिंसा को न्याय की भाषा में प्रस्तुत करते हैं. समय के साथ इस तरह का समर्थन कम हो गया और विरोध की आवाजें सड़कों से घटने लगीं.
मोदी दौर में एक और पहलू देखने को मिला. जंगलों में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर कुछ बड़ी कंपनियों की रुचि बढ़ने के कारण विरोध की गुंजाइश और कम हो गई. हाल के समय में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की घटनाएं भी बढ़ी हैं. कई लड़ाकों को लगने लगा है कि जंगलों में संघर्ष जारी रखना अब संभव नहीं है और जिन लोगों के लिए वे लड़ रहे थे, उनका ध्यान अब दूसरी ओर चला गया है.
काफी तैयारी पहले ही हो चुकी थी. मौजूदा सरकार उस समय आई जब यह प्रक्रिया मजबूत होने के दौर में थी.
आशुतोष भारद्वाज स्वतंत्र पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार निजी हैं.
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