किसी भी टीकाकार के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि उसका लेखन हमेशा के लिए तथ्यों की जांच के वास्ते उपलब्ध होता है. वह तथ्य, व्याख्या या, खुदा न करे, एक भविष्यवाणी में चूक करके आगे भले बढ़ जाए लेकिन यह उसे कभी-न-कभी परेशान तो करता ही है. गूगल देवता ने अवतार लेकर इसे स्थिति को और ज्यादा मुश्किल बना दिया है. सो, शेखर गुप्ता, तुमने 1983 में सुनील गावसकर पर ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका की कवर स्टोरी में यह लिख दिया था कि उन्होंने अपने बेटे रोहन का नाम अपने आदर्श क्रिकेटर, वेस्ट इंडीज के रोहन कन्हाई के नाम पर रखा है. और यह कि उनका बेटा भी कन्हाई की तरह बायें हाथ से बैटिंग करता है. जाहिर है, शेखर गुप्ता तुमने यह पता न करने का अपराध किया कि रोहन कन्हाई दायें हाथ से बैटिंग करते थे.
आप जब यह सोचते हैं कि आप सही साबित हुए हैं तब आप इसका दावा कर सकते हैं. ऐसा हमेशा नहीं होता, और न अक्सर होता है लेकिन जब आप पहली बार वह लिखते हैं जो सहज बुद्धि के विपरीत होता है, तो इसकी व्यापक आलोचना और निंदा तक होती है.
ऐसा मैंने 21 नवंबर 2011 को इस कॉलम के लेख में किया था. पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर जब जेट विमानों के साथ युद्ध जैसा छिड़ गया था तब मैंने आपसे कहा था कि देखिए, मैंने 15 साल पहले ही यह बता दिया था.
आप अफगानिस्तान को पाकिस्तान के हाथ में कैसे छोड़ सकते हैं? हमें पूरी ताकत के साथ वहां होना चाहिए, हमें ऐसी कोई व्यवस्था चाहे अमेरिका के साथ या वह वहां जो हुकूमत छोड़ जाए उससे मिलकर करनी चाहिए. यह पाकिस्तान के लिए एक बड़े खतरे के रूप में हो सकता है. भारत के लिए बेशक यह एक मौके के समान है, और आप क्या यह कह रहे हैं कि अफगानिस्तान को पाकिस्तान के हाथ में छोड़ दीजिए? उम्मीद के मुताबिक, सबसे तीखी आलोचना विदेश मंत्रालय और सेना के अनुभवी अधिकारियों की ओर से आई, जो सालों भर चौबीसों घंटे पाकिस्तान से लड़ना चाहते हैं, चाहे भूगोल कुछ भी कहता हो. इन आलोचनाओं को मैं यहां संक्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूं—
- अमेरिका जब वहां से हटेगा तब पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपना गुलाम मुल्क बना लेगा.
- वह अगर अफगानिस्तान को अपना उपनिवेश नहीं भी बनाता है तब भी वहां एक कठपुतली सरकार बैठा देगा और अपनी रणनीतिक मजबूती का सपना पूरा कर लेगा. संकरे भूगोल और विस्तार के कारण पाकिस्तान की कमजोरी (जो कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फिर उजागर हो गई) पाकिस्तानी रणनीतिकारों को हमेशा से परेशान करती रही है.
- पाकिस्तान प्रशिक्षित और लड़ाई लड़ चुके तालिबानी/मुजाहिदी गिरोहों को लश्करों में शामिल करके भारत को परेशान करेगा.
इन सभी सवालों के 15 साल पहले जवाब सीधे-से थे. एक तो यह कि तीन महाशक्तियां जब अपनी ताकत के शिखर पर थीं तब उन्होंने अफगानिस्तान को दबाने की कोशिश की मगर नाकाम रहीं. ब्रिटेन ने 19वीं सदी के मध्य में, सोवियत संघ ने 1979 के बाद, और अमेरिका ने 2011 में 9/11 कांड के बाद. अगर पाकिस्तान खुद को इन तीनों से ज्यादा ताकतवर मानता है, तो हमें उसे यही कहना चाहिए कि आजमा लो. और फिर हम तमाशा देखें.
दूसरे नंबर पर है भूगोल. हिंदू कुश और उसके पार जो विशाल ठंडा वीराना है वह किसी मूर्ख के सपने में ही रणनीतिक गहराई मुहैया करा सकता है. और जब मैं यह कड़वी बात कह रहा हूं तो इसे मेहरबानी ही मानिए.
तीसरे, कश्मीर (तब के) में 25 वर्षों से जारी अलगाववाद, और 40 वर्ष के रेकॉर्ड से हमने मालूम है कि अफगानिस्तान कभी कश्मीर में पाकिस्तानी लश्करों के साथ नहीं जुड़ा. लगभग सारे विदेशी आतंकवादी पाकिस्तानी सैनिकों की तरह मुस्लिम पंजाबी बिरादरी से हैं.
अब देखिए कि हम किस स्थिति में हैं. पाकिस्तान अफगानिस्तान के अंदर घुसकर बमबारी कर रहा है, बेकसूर नागरिक मारे जा रहे हैं. एक बार तो एक ही परिवार के 18 लोग मारे गए. वह इलाका और वहां की आबादी इस तरह की है कि मानव इतिहास में इस सहस्राब्दी के शुरू से ही सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति अमेरिका के लिए भी वहां सटीक बमबारी एक कल्पना ही थी और काफी जोखिम भरी थी.
अपने तमाम उपग्रहों, जासूसों और टोही यंत्रों, ड्रोनों और सटीक हमले करने वाले हथियारों के बूते वह अक्सर मस्जिदों, कबीलों के बड़े परिसरों में नागरिकों को मौत के घाट उतारता रहा या खाली पड़ी गुफाओं को ध्वस्त करता रहा. इन हमलों में उनके इक्का-दुक्का कमांडर भले मारे गए हों लेकिन अमेरिका को भी हमेशा नुकसान उठाना पड़ा. ऐसे हरेक हमले के बाद तालिबान का आकार बढ़ता गया, प्रभावित कबीलों के नये लड़ाके बदला लेने की कसम खाकर उसमें शामिल होते रहे.
अगर पाकिस्तान यह मानता है कि वह अमेरिका के मुक़ाबले ज्यादा हासिल कर सकता है, तो भारत का कोई भी पक्षधर उससे यही कहेगा कि आगे बढ़ो, और मेरा काम आसान करो. लोगों पर आपदा टूटे, इससे बेशक किसी को खुशी नहीं मिलेगी. खासतौर से अफगानों के लिए तो भारत कतई ऐसा नहीं चाहेगा. वहां चाहे जो भी निजाम सत्ता में रहा हो, वह भारत और भारतीयों के प्रति हमेशा सद्भावना रखता रहा है. हम कतई नहीं चाहेंगे कि अफगानों, खासकर अफगान नागरिकों को कोई नुकसान पहुंचे. लेकिन तथ्य यह है कि पाकिस्तान ने अपनी हेकड़ी और अदूरदर्शिता के कारण अपने लिए दूसरा मोर्चा खोल लिया है.
केवल भारत ही इस उपमहादेश का ऐसा देश नहीं है जिसे दो मोर्चे वाले जोखिम की चिंता हो. सबकी स्थितियां बेशक अलग-अलग हैं. भारत के लिए चीन जो है वैसा अफगानिस्तान पाकिस्तान के लिए नहीं हो सकता, बावजूद इसके कि उनके बीच सीमा को लेकर विवाद हैं. और चीन-पाकिस्तान का जैसा गठबंधन है वैसा गठबंधन तालिबान और भारत के बीच नहीं है. और अंतिम बात यह है कि फिलहाल जो भौगोलिक वास्तविकता है (नक्शों से अलग) उसके मुताबिक भारत और अफगानिस्तान के बीच बड़ी दूरी है, उनके बीच पाकिस्तान का या पाकिस्तानी कब्जे वाला इलाका पड़ता है. भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ छद्मयुद्ध शुरू करने का अगर आरोप लगाया जाता है तो वह यही कि भारत अफगानिस्तान की शानदार क्रिकेट टीम को बढ़ावा देता रहा है.
वैसे, पाकिस्तान के रणनीतिक तेवर और सैन्य तैयारी कभी दो मोर्चों के मद्देनजर नहीं थी, हालांकि उसने खुद को घालमेल में उलझा लिया है. वह एक ऐसे राष्ट्र से भिड़ गया है, जो उसके मुक़ाबले कहीं ज्यादा इस्लामी और शुद्धतावादी सुन्नी है, और रमज़ान के पाक महीने में मारने-मरने पर उतारू हो गया है.
पाकिस्तान का सियासी नेतृत्व कमजोर और कमअक्ल दिखता है. उसकी कूटनीति पूरी तरह भारत-चीन-अमेरिका केंद्रित है और वह अफगानिस्तान को अपना गुलाम मानता रहा है. उसकी फौज के पास भी विचारों का अभाव है. अपने पश्चिमी मोर्चे पर भारी घालमेल के लिए वह अपने पूर्वी पड़ोसी भारत को दोष देता है. अपने उग्रवादी गुटों को उसने धार्मिक विशेषणों से विभूषित कर दिया है.
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को ‘फितना अल-खावर्जी’ विशेषण से ‘नवाजा; गया है. फितना (बगावत) शब्द इस्लामी इतिहास से आया है. पहला फ़ितना 656 और 661 ई. में हुआ था जिसमें उम्मयद खिलाफत ने रशीदुन खिलाफत का तख़्ता पलट दिया था.
वैसे, उस जंग में इस्लामी उग्रवादियों या एक तरह से मजहब से बगावत करने वालों के रूप में एक तीसरा गुट भी शामिल था जो किसी पैगंबर को नहीं मानता था. उसे खावर्जी कहा जाता था. पाकिस्तानी फौज या ISI TTP के बहाने उसी मजहबी छवि को उभारना चाहती है. वरना आप आपनी इस्लामी फौज को ऐसे किसी गुट से लड़ने के लिए कैसे प्रेरित कर सकते हैं जिसकी मुख्य मांग यह है कि पूरे पाकिस्तान में शरीआ लागू किया जाए?
बलूच बागियों के खिलाफ प्रोपगंडा के लिए भी वे उसी इतिहास से एक नाम उठाते हैं : ‘फितना अल- हिंद’ (भारत से आई मुसीबत/तबाही), यानी आरोप यह कि यह पूरी तरह से भारत के द्वारा चलाया गया ऑपरेशन है. लेकिन यह भी भूगोल और जनसंख्या के स्वरूप की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. बलूच केवल बलूचिस्तान के नहीं हैं, वे पड़ोस में ईरान और अफगानिस्तान के बीच के विशाल वीरान इलाके के भी हैं. भारत किसी भी पैमाने पर वहां अपनी पहुंच नहीं बना सकता. इस पाकिस्तानी आरोप को कुछ भारतीय ‘एजेंसियां’ बेशक अपने लिए तारीफ जरूर मानती हैं. लेकिन पाकिस्तान को पता है कि अफगानिस्तान और ईरान के साथ जुड़ी उसकी 3549 किमी लंबी पश्चिमी सीमा उसके लिए जिंदा चुनौती है. और, डोनल्ड ट्रंप ने अगर ईरान पर हमला करने का फैसला कर लिया तब क्या होगा?
पाकिस्तानी निजाम पश्चिम पर नजर डालते हुए दशकों से बड़े-बड़े ख्वाब देखता रहा है. एक तो यह कि अफगानिस्तान में वह अपनी रणनीतिक मजबूती हासिल कर लेगा. दूसरे, यह कि ईरान उसका पक्का इस्लामी साथी है, और फिर यह धारणा भी कि वह सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से पश्चिम एशिया का ही हिस्सा है, खासकर अरब मध्य-पूर्व का. यह धारणा उसे इस उपमहादेश वाली पहचान से छुटकारा दिलाती है. इसकी ज्यादा वजह यह है कि भारत का दबदबा इतना बड़ा है कि सांस्कृतिक, भाषायी, और पारिवारिक जुड़ाव इस उपमहादेश वाली पहचान को भारतीय पहचान का पर्याय बना देता है.
पोस्टस्क्रिप्ट: : मैंने इस लेख के शुरू में टीकाकार की दुश्वारियों का जिक्र किया था कि भू-राजनीतिक पहलुओं की बात करना घरेलू सियासत की बात करने से ज्यादा जोखिम भरा होता है. इस सप्ताह यूक्रेन पर रूसी हमले की चौथी वर्षगांठ पड़ रही है, यह इस तरह की स्वीकारोक्ति करने का समय है. 26 फरवरी 2022 (शनिवार) को इस कॉलम में कुछ चलताऊ तरह से कहा गया था कि जब तक आप यह कॉलम पढ़ रहे होंगे, रूसी सेना कीव में पहुंच चुकी होगी या एक-दो दिन में पहुंच जाएगी. लेकिन उसे न केवल वहां से बुरी तरह खदेड़ दिया गया बल्कि वह चार साल से वहां थका देने वाली जंग लड़ रही है.
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