वे वर्ष 2006 के जोशीले दिन थे जब ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ (डब्लूईएफ) के सम्मेलन में भारत की सरकार और कॉर्पोरेट जगत ने मिलकर उसमें ‘इंडिया एवरीव्हेयर’ आयोजन को प्रायोजित किया था. उसके तहत कई इवेंट, पार्टियां की गईं; संगीत के कार्यक्रम किए गए, और खुलकर उपहार बांटे गए. भारतीय अर्थव्यवस्था बम-बम कर रही थी और भारत में ‘टेक सेक्टर’ का उत्कर्ष सबकी नजरों के सामने था. उसका सितारा बुलंदी की ओर बढ़ रहा था. वास्तव में, जिधर देखो उधर भारत ही भारत नजर आ रहा था. लेकिन वर्ष 2026 में नजारा अलग था. हालांकि भारत के नौ राज्यों ने अपने मंडप लगाए थे, और छह मुख्यमंत्री समेत दो उप-मुख्यमंत्री मौजूद थे मगर हालात 2006 के बिलकुल उलट थे. भारत के लोग अपने ही टीवी चैनलों के सिवा और कहीं खबरों में नहीं दिख रहे थे.
दो दशकों में यह सबसे फीका दावोस था. लेकिन मैं कहूंगा इस मुकाम पर भारत के लिए यह सबसे अच्छी बात थी— अवसर तो बेहिसाब थे लेकिन वे उतने ही खतरनाक रूप से हाथ से फिसलते दिख रहे थे जितना बर्फ के अकाल वाले सप्ताह में सख्त काली बर्फ हाथ से फिसलती दिख रही थी. बहरहाल, इन एक दर्जन मुद्दों पर विचार कीजिए :
- भारत के लोग अगर कोई खबर नहीं बना सके तो यह समझदारी वाली बात ही थी. जब जी-7 के पांच प्रमुख नेता भारत के साथ व्यापार समझौते की बढ़-चढ़कर बात कर रहे थे तब अपना सीना ठोकने की कोई जरूरत भी नहीं थी. यूरोपीय संघ (ईयू) की उर्सुला वॉन डेर लेन ने इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” (सभी समझौतों का दादा) कहा. बहुत दिन नहीं बीते हैं जब वे यूक्रेन के मामले पर भारत के रुख की आलोचना कर रही थीं. लेकिन दुनिया किस कदर बदल चुकी है इसका अंदाजा कनाडा के मार्क कार्नी के जोरदार भाषण में भारत के साथ व्यापार समझौते के जिक्र से बेहतर किसी और बात से नहीं लग सकता है. उनके पूर्ववर्ती जस्टिन ट्रूडो ने तो वार्ताओं को स्थगित ही कर दिया था. जाहिर है: ट्रूडो भी वहां मौजूद थे लेकिन ज़्यादातर अनौपचारिक वार्ताओं और पार्टी-वार्टी में दिख रहे थे, बेशक पॉप स्टार केटी पेरी के साथ.
- दावोस डॉनल्ड ट्रंप और उनके होवर्ड लुटनिक, स्कॉट बेस्सेंट और एलन मस्क सरीखे लोगों में ही इतना उलझा हुआ था कि दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए आपको इन लोगों से टक्कर लेने के सिवा और कोई उपाय नहीं था. कार्नी, इमैनुएल मैक्रों और फ़्रेडरिक मर्ज़ अलग-अलग पैमाने पर यही करते नजर आए. कार्नी ने तो पश्चिमी गठजोड़ के अंत की घोषणा ही कर दी. भारत के लिए सबसे मुफीद यही था कि इस झगड़े से दूर ही रहो. इसका एक फायदा तो यह निकला कि ट्रंप से आज बेहद नाराज पारंपरिक, अमीर, विकसित अमेरिकी सहयोगी नये मित्रों की तलाश करते दिखे. हम इसे ‘ट्रंप पीड़ित’ गठजोड़ कह सकते हैं.
- कार्नी के भाषण को इस दौर के सबसे महान भाषणों में शुमार किया जा रहा है. चेक नेता वाक्लाव हावेल ने जिस नैतिक शक्ति की बात की थी उसका आह्वान तो कार्नी ने किया ही, उन्होंने ‘मिडल पावर्स’ (मझोली शक्तियों) की जो परिभाषा दी और ट्रंप की दुनिया में उनकी जो जगह बताई वह एक युग को परिभाषित करने वाला विचार बन गया.
- इसे इस तरह भी देखा जा सकता है. दो सर्वशक्तिमान ध्रुवों वाली दुनिया, जिसमें अमेरिका एक क्रूर और बर्बर ‘दादा’ वाली भूमिका में है और चीन एक बेहद चतुर दादा की भूमिका में, जो अपनी आर्थिक तथा रणनीतिक छुरी को इतनी बारीकी से घुमाता है कि आपको दर्द भी नहीं महसूस होता. वैसी दुनिया में आपके सामने विकल्प क्या है यह जाहिर है. आप एक महाशक्ति के याचक बन सकते हैं. या पाकिस्तान की तरह दोनों के याचक बन जाएं, जो कि दुर्लभ से भी दुर्लभ है. लेकिन तब आप क्या करेंगे अगर आप एक ऐसे देश हैं जो काफी शक्तिशाली भी है और स्वाभिमानी भी है, या जिसकी जनता अपनी गरिमा को इतना मूल्यवान मानती है कि घुटने टेकने वाले नेता की छुट्टी कर देती है?
- दो महाशक्तियों के बाद 10 टॉप अर्थव्यवस्थाओं की गिनती शुरू करें तो तीसरे, चौथे, पांचवें नंबर पर क्रमशः जर्मनी, जापान और भारत दिखेंगे जिन्हें ‘मिडल पावर्स’ में शुमार कर सकते हैं. ब्रिटेन को फिलहाल छठे, और रूस को नौवें नंबर पर रख सकते हैं. फ्रांस और इटली को 7 और 8 पर, और कार्नी के कनाडा को 10वें नंबर पर रख सकते हैं. 11 से लेकर आगे की गिनती में ब्राज़ील, स्पेन, मेक्सिको, दक्षिण कोरिया… आदि को शामिल करते जा सकते हैं. सारे देश दुनिया में अपनी स्थिति पर पुनर्विचार कर रहे हैं. लेकिन ट्रंप का अमेरिका सबके साथ समान तिरस्कार वाला व्यवहार करता है. ये देश चीनी खेमे में नहीं जा सकते. क्या ये देश किसी तरह की एकता, साझा मकसद, और साथ मिलकर सामूहिक मोलभाव करने की थोड़ी ताकत बना सकते हैं?
- क्या आपको गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नैम) की कुछ याद है? यह एक सच्ची ताकत नहीं बन पाया, तो इसके कई कारण हैं. पहला यह कि यह सैद्धांतिक रूप से तो गुटनिरपेक्ष था मगर इसका ज्यादा झुकाव सोवियत संघ की तरफ था. दूसरे, इसमें ऐसे सदस्य नहीं थे जिन्हें उस समय ‘मिडल पावर्स’ में गिना जा सकता था. भारत सबसे बड़ा देश था लेकिन उसका नैतिक तेवर उसकी आर्थिक तथा सैन्य कमजोरियों तथा निर्भरताओं के कारण फीका पड़ जाता था. और कुछ समय बाद तो भारत सोवियत संघ का संधिबद्ध सहयोगी ही बन गया था.
- आज जबकि जर्मनी, फ्रांस, जापान, कनाडा, और यूरोप के ज़्यादातर देश इस नए विश्व पर नजर डाल रहे हैं, तब क्या एक नए ‘नैम’ का समय आ गया है? बेशक यह आज के समय के साथ तालमेल करती नई विशेषताओं से लैस होगा. इसमें विचारधारा का आग्रह नहीं होगा, व्यावहारिकता पर ज़ोर होगा. अमेरिका और चीन के साथ व्यापार तो करो लेकिन एक समूह के रूप में मोलभाव करने की ताकत रखो. यहां हम कार्नी के उपरोक्त भाषण को याद करें, जिसमें वे कहते हैं: “… अगर हम खाने की मेज पर नहीं होंगे, तो खाने का मेनू बन जाएंगे.” इसलिए ‘मिडल पावर’ देशों को साथ आना ही पड़ेगा, साझा हितों की खोज करनी होगी और विरासत में मिली खेमेबंदियों से आगे देखना होगा. मसलन जी-7, जी-20, नाटो, और संयुक्त राष्ट्र भी आज बेकाबू और बेदम हो चुके हैं. ब्रिक्स और एससीओ जैसे दूसरे कुछ समूह चीन के दबाव में हैं.
- ट्रंप के मोलभाव करने के तरीकों से अब सब वाकिफ हो चुके है, सिवा उनके जो अभी भी भ्रम में पड़े हैं. ट्रंप को किसी समूह से निबटना नापसंद है. इसकी सबसे साफ मिसाल नाटो के प्रति उनकी नफरत है. उनके पास विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ), विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ), पेरिस जलवायु समझौता, संयुक्त राष्ट्र, और क्वाड तक के लिए समय नहीं है. चूंकि वे आप से संकेतों में बात नहीं करते बल्कि आपको घूरते हुए तथा अपने घोर स्वार्थ की बात करते हैं, इसलिए उनके दिमाग को समझना अब ज्यादा आसान है. नाटो समेत कोई भी बहुराष्ट्रीय संगठन हो, वे हर संप्रभु देश को समान मानते हैं. लेकिन ट्रंप का मानना है: हम इतने ताकतवर हैं, हम क्यों किसी समूह में बराबरी की हैसियत के साथ शामिल हों?
- इससे दो नतीजे निकलते हैं. एक यह कि वे नियम आधारित किसी भी बहुपक्षीय मेल को अमेरिकी ताकत को कमजोर करने वाला मानते हैं. और दूसरा, ज्यादा महत्वपूर्ण, नतीजा यह हो सकता है कि वे किसी भी समूह के साथ बात नहीं करेंगे या किसी समूह में वार्ता नहीं करेंगे. हर देश से वे अलग-अलग बात करेंगे. और वे चीन को छोड़ हर देश से कहीं ज्यादा ताकतवर हैं. इस तरह वे वार्ता की मेज पर कोर्लिओन सिद्धांत को ले आते हैं, जो यह कहता है कि मैं तुम्हें जो पेशकश कर रहा हूं उसे तुम मना नहीं कर सकते. ग्रीनलैंड इसका सबसे ताजा उदाहरण है. यूक्रेन भी उसी दिशा में है. चीन को छोड़ कोई भी देश ट्रंप के साथ बराबरी की हैसियत से बात नहीं कर सकता. इसलिए, जो ‘मिडल पावर’ देश इन बहुपक्षीय संगठनों के मूल आधार थे वे आज बेसहारा और ट्रंप की मर्जी पर निर्भर महसूस कर रहे हैं. भारत पहला ‘मिडल पावर’ देश था जिसे ‘समझदारी से काम लो, जो कहता हूं वही करो’ वाले व्यवहार को झेलना पड़ा. इसके बाद यूरोप की बारी आई. अब कनाडा अमेरिका के पश्चिमी सहयोगियों की जवाबी जंग का नेतृत्व कर रहा है.
+ अब जबकि ‘मिडल पावर’ देशों को उनकी औकात बता दी गई है, तो वे किधर जाएं? नाटो के प्रमुख सदस्य देश सामूहिक सौदेबाजी के लिए ट्रंप के ओवल ऑफिस में उनके सामने उस तरह हाजिर हो चुके हैं जैसे चापलूस स्कूली बच्चे हेडमास्टर के सामने पेश होते हैं. हम जानते हैं कि उसका क्या नतीजा निकला. आप मान कर चलिए कि वे किसी भी नए गठबंधन को आकार लेने से पहले ही कुचल देंगे. ‘मिडल पावर’ देशों के लिए आपस में बात करने, द्विपक्षीय समझौते करने का मौका बना है.
कई देश ऐसे वर्षों पुराने, कठोर वैचारिक आग्रहों से पल्ला झाड़ रहे हैं जिन पर कभी कोई समझौता नहीं किया जा सकता था. भारत ने व्यापार को संरक्षण देने से पल्ला झाड़ लिया; यूरोप ने श्रम, कार्बन, और दूसरी राजनीतिक शुद्धताओं के प्रति अंधभक्ति से पल्ला झाड़ लिया. जर्मनी के चांसलर मर्ज़ अपने परमाणु संयंत्रों को बंद करने पर अफसोस कर रहे हैं; और मार्के की बात यह है कि कनाडा भारत के साथ रिश्ता सुधार रहा है, उसे समझ में आ गया है कि जो पंजाबी गिरोह हैं वे माफिया वाली समस्या हैं, उनका ट्रूडो की परिभाषा के मुताबिक संप्रभुता से कोई लेना-देना नहीं है. हर कोई अपने हित की ही फिक्र करता है, यह सोच व्यावहारिकता को बढ़ावा देता है.
- इस नए सोच का ही नतीजा है कि व्यापार समझौते जबरदस्त तेजी से हो रहे हैं. सैन्य/डिफेंस संबंध ज्यादा जटिल होते हैं, फिर भी हम यूरोप में कुछ अनौपचारिक सैन्य संबंध उभरते देख सकते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह आया है कि दो ट्रिलियन डॉलर से ऊपर वाले सभी लोकतांत्रिक देश एक-दूसरे को नए सम्मान से देख रहे हैं.
- व्यापार समझौते के बाद सैन्य समझौते भी होंगे ही. कौन किससे क्या खरीद रहा है, कौन किसे क्या बेच रहा है इन सबकी समय सीमाएं और हिचक टूटेंगी, क्योंकि ‘बाकी’ देशों में डिफेंस पर खर्च में भारी इजाफे हो रहे हैं. आप देख सकते हैं कि डिफेंस के हार्डवेयर के लिए संयुक्त उपक्रमों को लेकर पुरानी हिचक दूर हो रही है. उत्पादन क्षमता इन नये दोस्ताना ख़रीदारों, खासकर भारत में फैलेगी. अमेरिका को भी बेशक लाभ मिलेगा, क्योंकि खासकर यूरोप समेत कई देश हथियार के भंडार बढ़ा रहे हैं.
- और आखिर में सवाल यह है कि अगर इस साल के दूसरे हिस्से में होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद ट्रंप अपना बहुमत खो देते हैं और ‘लेम डक’ बन जाते हैं, तो आगे क्या होगा? वैसे भी अब उनके कार्यकाल के तीन साल ही बचे हैं. उसके बाद आप अमेरिका को वापस पुरानी सामान्य स्थिति में पा सकते हैं. लेकिन क्या यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है? पुरानी सीख तो यही कहती है कि उम्मीद को योजना मत मान लीजिए.
अमेरिका पर भरोसा टूट चुका है. ‘मिडल पावर’ वाला परिदृश्य कायम हो रहा है. क्या यह कारगर होगा? दावोस में मस्क ने जो कहा उससे बात को समाप्त करना ठीक रहेगा: “… दरअसल, निराशावादी और सही होने से बेहतर है आशावादी और गलत होना”.
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