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Saturday, 29 November, 2025
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जुबान से मैदान तक हारे: बावुमा का बढ़ा कद, भारत की टेस्ट इगो हुई चूर

इस सीरीज को परिभाषित करने वाला तथ्य यह है कि भारत में लाल गेंद से खेले जाने वाले क्रिकेट का भारी पतन हो चुका है और मेहमान टीम हमसे ‘मशक्कत’ करवाने के दावे करके हमारा मखौल उड़ा सकती है.

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हमारे हिंदी के टीवी समाचार चैनल जिस तरह के कल्पनाशील और रंग-बिरंगे हेडलाइन बनाया करते हैं उन्हें देखते हुए मुझे हैरानी हो रही है कि साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम ने भारतीय टीम को जिस तरह रौंद डाला उस पर अब तक किसी चैनल ने ‘बौने का बदला’ हेडलाइन क्यों नहीं लगाया. मनुष्य आज विकास के जिस स्तर पर पहुंच गया है उसमें शालीन ढंग से भी बौना कहना गलत है. और हिंदी/पंजाबी में तो छोटे कद के आदमी को बौना कहना कहीं ज्यादा अपमानजनक माना जाता है.

लेकिन हमारे जसप्रीत बुमराह ने शानदार दक्षिण अफ्रीकी टीम के, जिसके सभी खिलाड़ी पांच फुट चार इंच से ऊंचे कद के हैं, कद्दावर कप्तान टेंबा बावुमा के लिए इसी शब्द का प्रयोग किया. यह बात तब कही गई जब एक एलबीडब्लू अपील को डीआरएस के हवाले किए जाने की मांग पर सलाह-मशविरा किया जा रहा था. विकेट कीपर और अस्थायी कप्तान ऋषभ पंत ने कहा कि ‘यह शॉर्ट भी तो है…’, और बुमराह ने हताशा में सहमत होते हुए ‘बौना’ शब्द का प्रयोग किया और वाक्य का अंत किसी को बहन की गाली देते हुए किया कि ‘ये बौना भी तो है ब…’.

आजकल क्रिकेट के मैदान पर गालियों का इस्तेमाल खूब होने लगा है और इसकी कोई परवाह भी नहीं करता. महिला खिलाड़ी भी इस मामले में पुरुषों की बराबरी करने लगी हैं. जब आप जानते हैं कि स्टंप में लगे माइक्रोफोन और सोशल मीडिया आपको ‘बौना’ शब्द के साथ गाली का प्रयोग करने पर कहीं का नहीं छोड़ेगा तब भी आप ऐसा करते हैं तो इसे मूर्खता ही कहा जाएगा.

बावुमा इस खेल के दिग्गज खिलाड़ी हैं. उनका 5’4’ का शरीर क्रिकेट में उनके कद को परिभाषित नहीं करता, जैसे सुनील गावसकर या एक इंच उधर-इधर के सचिन तेंदुलकर या गुंडप्पा विश्वनाथ के कद को नहीं करता. दक्षिण अफ्रीका के संदर्भ में बावुमा भी इन दिग्गजों की तरह ‘लिटल मास्टर’ हैं. वे उस देश के पहले अश्वेत क्रिकेट कप्तान हैं, जहां रग्बी से लेकर क्रिकेट तक उसके सभी प्रिय खेलों में नस्लीय भेदभाव के पतन को धीरे-धीरे कबूल किया जा रहा है.

पहले टेस्ट मैच में साउथ अफ्रीका की बिखरती दूसरी पारी में बावुमा ने डटे रहकर 55 रन बनाए, जो उस टेस्ट में किसी भी खिलाड़ी का सबसे बड़ा स्कोर था. उसने उनकी टीम की जीत पक्की कर दी थी.

इसके बाद भारतीय टीम को अपने ही घर में सबसे बड़े अंतर (408 रन) से पीटे जाने और 2-0 से सीरीज़ हारने की दुर्गति का सामना करना पड़ा. ‘बौने’ ने अपना ‘बदला’ ले लिया.

दक्षिण अफ्रीका ने पहला टेस्ट अपने आठवें सेशन में ही निबटा दिया, और हमने बुमराह को बावुमा के गले में बाहें डाले गर्मजोशी से बात करते देखा. उनके चेहरों को पढ़ने से यही पता लग रहा था कि वे उन्हें बधाई दे रहे होंगे या पछतावा जाहिर कर रहे होंगे. जो भी हो, दक्षिण अफ्रीकी टीम जाग चुकी थी. गुवाहाटी में उन्होंने बड़ी खामोशी से बदला लिया. चौथे दिन के अंत में जब दक्षिण अफ्रीका के कोच शुक्री कॉनराड से पूछा गया कि उन्होंने पारी घोषित न करके भारत से इतनी देर तक फील्डिंग क्यों करवाई, तो उनका जवाब था: “हम उनसे मशक्कत करवाना चाहते थे…” मुमकिन है कि उन्हें संदर्भ का पता होगा. वे अपनी भाषा में भारत क्रिकेट की तहजीब सिखा रहे थे. नीच किस्म के हमले का वैसा ही जवाब!

‘मशक्कत’ वाला मामला 1976 से शुरू हुआ, जब वेस्ट इंडीज की टीम इंग्लैंड पहुंची थी और मेजबान कप्तान टोनी ग्रेग ने सीरीज शुरू होने से पहले ही दावा किया था कि वे “उनसे मशक्कत करवाने का इरादा” रखते हैं. इसमें नस्लवाद की बू सूंघने में किसी ने गलती नहीं की. आखिर ग्रेग का जन्म भी दक्षिण अफ्रीका में हुआ था, और वह दौर ऐसा था जब रंगभेद अपने चरम पर था. ग्रेग की बातों ने वेस्ट इंडीज टीम को नाराज और एकजुट कर दिया और उसने इंग्लैंड को उसके ही घर में 3-0 से धो दिया. बेशक उस समय वेस्ट इंडीज टीम क्लाइव लॉयड, गॉर्डन ग्रीनीज़, विव रिचर्ड्स, माइकल होल्डिंग, एंडी रोबर्ट्स, वानबर्न होल्डर जैसे महान दिग्गज खिलाड़ियों वाली टीम थी.

गुवाहाटी में मैच से पहले प्रेस वार्ता में बावुमा से ‘मशक्कत’ वाली बात के बारे में सवाल किया गया. उनका जवाब था कि उनके कोच 60 की उम्र के हैं और उनसे शब्दों के चुनाव में थोड़ी गड़बड़ हो सकती है लेकिन “इस सीरीज़ में कुछ भारतीय खिलाड़ियों ने भी सीमा तोड़ी है”.

बावुमा को खिल्ली उड़ाए जाने का अनुभव तो है ही. इंटरनेट ने 2023 में दिए गए उनके इस बयान को ढूंढ निकाला : “मुझे कई गालियां दी जा चुकी हैं. कुछ गालियां दुखी करती हैं… लेकिन मुझे अपने जीवन में सबसे ज्यादा टेंबा नाम से ही पुकारा गया है. मेरी दादी ने मेरा यह नाम रखा था क्योंकि इसका अर्थ है उम्मीद. हमारे समुदाय के लिए उम्मीद, अपने देश के लिए उम्मीद.”

लेकिन ये शब्द इस सीरीज़ को परिभाषित नहीं करते. क्रिकेट खेलने वाले इन दोनों देशों के आपसी संबंध बेहद अच्छे रहे हैं, और जल्दी ही आप कई दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ियों को आइपीएल के आगामी सीजन में फलते-फूलते देखेंगे, जैसा कि वे 2008 से फलते-फूलते रहे हैं. एबीडी विलियर्स वर्षों से भारतीय खेल प्रेमियों के चहेते रहे हैं. 2015 की सीरीज़ में चौथे टेस्ट में दक्षिण अफ्रीका ने जब दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान पर भारत को हराया था तब मैं भी वहां था. तब, सबसे ज्यादा तालियां किसी भारतीय खिलाड़ी के लिए नहीं बल्कि ‘एबीडी’ के लिए बजी थीं. उम्मीद है कि दोनों टीमें और दोनों क्रिकेट बोर्ड चालू सीरीज में अमन बनाए रखेंगे और यह सीरीज दोनों के लिए फायदेमंद रहेगी. लेकिन क्या है जो इस सीरीज को परिभाषित करता है?

इस सीरीज को परिभाषित करने वाला तथ्य यह है कि भारत में लाल गेंद से खेले जाने वाले क्रिकेट का भारी पतन हो चुका है और मेहमान टीम सीरीज़ के सारे मैच जीत लेती है. भारत की ‘जेन-जी’ और यहां तक कि उसके बुजुर्गों की पीढ़ी को भी याद नहीं होगा कि उन्होंने कभी भारतीय टेस्ट टीम को गर्त में पड़कर ‘मशक्कत’ करते देखा हो. 2008 से 2025 के बीच घरेलू मैदानों पर 88 टेस्ट मैच खेले गए और भारत ने इनमें से 59 मैच जीते. विश्व टेस्ट चैंपियनशिप में भारत दो बार फाइनल तक पहुंचा और शास्त्री-द्रविड़ युग में टेस्ट रैंकिंग में लंबे समय तक टॉप पर रहा.

इन 17 वर्षों में भारत अपने घर में केवल 10 टेस्ट हारा. इनमें से आधे तो न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली गई पिछली दो होम सीरीज थी. स्पिन वाली घरेलू पिचों के कारण भारत को जो अजेयता हासिल थी वह अचानक गंभीर बोझ बन गई है. इंग्लैंड के साथ सीरीज को शानदार तरीके से ड्रॉ किया, और ऑस्ट्रेलिया के साथ सीरीज जोरदार टक्कर देकर हारे. यह इस विरोधाभास को उजागर करता है कि आज की भारतीय टीम अपने देश के मुक़ाबले विदेश में ज्यादा अच्छा खेलती है.

दो बातें गलत हुई हैं. एक तो यह कि भारतीय टीम न तो स्पिन गेंदबाजी कर सकती है और न स्पिन गेंदों पर बैटिंग कर सकती है. दूसरे, टीम मैनेजमेंट में बदलाव हरफनमौला क्रिकेटरों को स्पेशलिस्टों से ज्यादा तरजीह देता है. 2001 से, भारत का घरेलू नुस्खा बहुत सीधा-सा रहा है. पांच आक्रामक बल्लेबाज रख लो, एक आक्रामक विकेटकीपर, दो फास्ट बॉलर, और तीन माहिर स्पिनर लेकर टीम बना लो. घरेलू पिच पर एक-दो ने अगर थक चुके विरोधी गेंदबाजों के सामने उपयोगी बल्लेबाजी कर ली तो उसे बोनस ही मान लीजिए.

समय के साथ उम्र और थकान ने पुराने स्पिनरों को कमजोर कर दिया. इसके अलावा, वाशिंगटन सुंदर को बैटिंग ऑफ-स्पिनर के रूप में खेलाने का मूर्खतापूर्ण फैसला कर लिया गया, जिन्होंने दो दिन वाली इडेन गार्डेन पिच पर केवल एक ओवर बॉलिंग की, और गुवाहाटी में 48 रन देकर केवल एक विकेट लिया. इस मूर्खता को आगे बढ़ाया गया उन्हें नंबर तीन बल्लेबाज बनाकर, जिस नंबर पर शुभमन गिल, चेतेश्वर पुजारा और राहुल द्रविड़ खेला करते थे. और, गुवाहाटी में सुंदर को आठवें नंबर पर भेजा गया.

नीतीश रेड्डी को भी बैटिंग ऑलराउंडर के तौर पर शामिल किया गया. उन्होंने दोनों पारियों में कुल 10 ओवर बॉलिंग की और कुल 10 ही रन भी बनाए. जाहिर है, उनकी बॉलिंग इतनी खराब थी कि उन्होंने सिर्फ बुमराह को ब्रेक देने का काम किया.

यह सब अड़ियलपन ही है. हमेशा आत्म-संतुष्ट दिखने वाले अजित अगरकर के नेतृत्व में भारतीय चयनकर्ताओं को प्रतिभाशाली स्पिन बॉलर की खोज करने के लिए घरेलू क्रिकेट पर नजर रखनी चाहिए. मुझे यकीन है कि रणजी क्रिकेट में आधा दर्जन ऐसे बॉलर मिल जाएंगे जो आज सुंदर या जडेजा से बेहतर बॉलिंग कर सकते हैं. बल्लेबाजों को घरेलू क्रिकेट में खेलने और स्पिन खेलने का अभ्यास करने को मजबूर किया जाना चाहिए. दक्षिण अफ्रीकी टीम पाकिस्तान के साथ कठिन ड्रॉ सीरीज खेलकर अच्छी तरह तैयार होकर आई थी.

बड़ी समस्या यह है कि बीसीसीआई ने लाल गेंद से नजर फेर ली है. क्रिकेट के फैन उसके ‘कस्टमर’ बन गए हैं, और टेस्ट क्रिकेट इस खेल का सबसे शुद्ध, सबसे मूल्यवान रूप है. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया सीरीज के दर्शकों के आंकड़े देख लीजिए. बोर्ड को क्रिकेटिंग और ‘पार्टी-पॉलिटिक्स’ छोड़कर दौड़ के काबिल घोड़ों पर फिर से ध्यान देना चाहिए. अगर आप खेल के हर फॉर्म के हिसाब से कप्तान चुनते हैं, तो उसी तरह अलग-अलग कोच भी चुन सकते हैं.

गौतम गंभीर भारतीय क्रिकेट के नए दौर की देन हैं, सबसे आक्रामक रूप के, जिसे उनकी पश्चिम दिल्ली में पाया जा सकता है, जो कि विराट कोहली की भी कर्मभूमि है. यह ‘क्या उखाड़ लेगा’ वाली क्रिकेट है. लेकिन फिलहाल तो वे भारतीय टेस्ट क्रिकेट के स्टंप ही उखाड़ पाए हैं. उन्हें और उनके साथ चयन कमिटी को भी जाना चाहिए. इन लोगों ने उस स्टार सिस्टम को खत्म करने की मुहिम चलाई जिससे ये नफरत करते थे. इसका खामियाजा टेस्ट क्रिकेट में भारत के दबदबे को भरना पड़ा है. क्या उन्हें इसकी परवाह है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. उन्हें जवाबदेह बनाया ही जाना चाहिए. ‘डब्लूटीसी’ का यह चक्र ऑस्ट्रेलिया के पांच टेस्ट वाले भारतीय दौरे के साथ पूरा होगा, बशर्ते बीसीसीआइ घरेलू पिच पर ‘मशक्कत’ को आदत बनाने से संतुष्ट न होता हो.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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