एलपीजी और प्राकृतिक गैसों की कमी भारत में घरों से लेकर मझोले तथा लघु उद्योगों और खाद उत्पादन तक को खासतौर से जिस तरह से परेशान कर रही है, इसका जायजा लेते हुए मुझे यह उत्सुकता हुई कि हमारी जीडीपी से जिस देश, चीन की जीडीपी का आंकड़ा पांच गुना ज्यादा है वह इतना शांत क्यों है. नतीजा यह निकला कि उसने बुद्धिमानी बरती, और हम बुरी तरह आत्मसंतुष्ट रहे.
चीन के पास भी हमारी तरह तेल और गैस का बड़ा भंडार नहीं है और वह भी इनका काफी आयात करता है. लेकिन वह हमारी तरह दहशत में नहीं है.
हमें मालूम है कि चीन को भारी मात्रा में कच्चा तेल और थोड़ी गैस रूस से जमीनी पाइपलाइन से मिलती है. लेकिन क्या यह उसके लिए पर्याप्त है? यहां हम खाद को लेकर परेशान हैं क्योंकि खरीफ फसल की बुआई शुरू होने वाली है. लेकिन चीन बेफिक्र है— न केवल अपनी जरूरतों को लेकर बल्कि निर्यात के अपने सौदों को लेकर भी. हम खाद के लिए चीन से आयात पर भी निर्भर हैं. हमें याद है कि जब पूर्वी लद्दाख और गलवान में संकट की स्थिति बनी थी तब हमें खाद की .कमी से किस तरह जूझना पड़ा था. लेकिन चीन ने अभी अप्रत्याशित स्थिति को कारण बताकर खाद के अपने निर्यात से इनकार नहीं किया है. इसकी वजह का पता मुझे तब लगा जब मैंने अपने दायरे से बाहर जाकर रिसर्च किया. वास्तविकता की खोज ने सदमे में डाल दिया. सदमा चीन की कामयाबी को लेकर भी था और अपने आम चलताऊ रवैये को लेकर भी था—बातें ज्यादा, और नतीजा मामूली.
कुछ क्रूर सच्चाइयों पर गौर कर लीजिए. चीन के पास गैस फील्ड कम ही हैं लेकिन गैस पर्याप्त है. इसकी वजह यह है कि चीन ने कोयले से गैस बनाने में पूंजी, हुनर और टेक्नोलॉजी का धैर्य के साथ निवेश किया.
अपेक्षित कहानी यह है कि इस आइडिया पर भारत और चीन ने एक ही साथ विचार करना शुरू किया था लेकिन आज चीन हर साल 8 करोड़ मीट्रिक टन (MMTPA) गैस का उत्पादन कर रहा है और हम इसका मात्र 3-5 फीसदी ही उत्पादन कर रहे हैं. चीन गैस उत्पादन के लिए 340 MMTPA कोयला का इस्तेमाल कर रहा है जबकि भारत इसका मात्र 1.4 प्रतिशत कोयला इस्तेमाल कर रहा है.
यूपीए सरकार ने 2007 में कोयले से मिथेन गैस बनाने की बड़ी-बड़ी बातें की थी और रानीगंज में एक छोटा-सा पाइलट संयंत्र भी बनवाया था. उसके बाद से इस आइडिया को भुला दिया गया. वैसे भी, यूपीए सरकार के दौरान कोयला काफी बदनाम हुआ था. कोविड के बाद सुधारों की जो झड़ी लगी उसमें 2020 में मोदी सरकार ने सुपर महत्वाकांक्षी ‘नेशनल कोल गैसीफिकेशन मिशन’ का शुभारंभ किया.
मैंने ‘सुपर महत्वाकांक्षी’ शब्दों का प्रयोग जानबूझकर किया है, क्योंकि उस योजना के तहत 2030 तक 100 MMTPA कोयले के इस्तेमाल से गैस उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया था. इस योजना में 4 ट्रिलियन यानी चार लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाना था. 100 MMTPA पर हमारा कोयला गैस (जिसे सिंथेटिक या सिनगैस भी कहा जाता है) उत्पादन चीन के उत्पादन से 25 फीसदी ज्यादा ही होता. यह तो जोरदार खबर थी.
आज हम इस दस वर्षीय योजना के छठे साल में हैं और कुल उत्पादन (चाहे यह पिछले उपक्रम के कारण हो या 2020 के बाद के उपक्रम के कारण) करीब 5 MMTPA ही है (अच्छे उत्पादन वाले साल में). इसमें से 1.8 MMTPA का उत्पादन ओडिशा के अंगुल में जिंदल स्टील ऐंड पावर (JSPL) प्लांट में होता है, जिसमें नई आधुनिक प्रक्रिया का इस्तिमाल किया जा रहा है और यह ज़्यादातर आंतरिक खपत के लिए है.
इसके अलावा, कोयला मंत्रालय और नीति आयोग की वेबसाइटें बताती हैं कि कोयले से गैस उत्पादन की सात परियोजनाओं के लिए 64,000 करोड़ रुपये के निवेश की मंजूरी दी जा चुकी है. लगभग ये सारी परियोजनाएं सार्वजनिक क्षेत्र में कोल इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त उपक्रम के रूप में लागू होंगी लेकिन फिलहाल ये सब नियमन वाले चक्र में चक्कर लगा रही हैं. मैंने झारखंड के जामताड़ा के कस्टा में ‘ईस्टर्न कोलफील्ड्स’ (कोल इंडिया की सहायक कंपनी) की भूमिगत कोल गैसीफिकेशन परियोजना के बारे में पढ़ा. इसे अब तक उत्पादन शुरू कर देना चाहिए था. लेकिन यह कोयला और पर्यावरण मंत्रालयों के बीच विवाद में उलझकर रह गई है.
पर्यावरण मंत्रालय ज़ोर दे रहा है कि परियोजना को जमीन के 300 मीटर नीचे होना चाहिए. कोयला मंत्रालय 150-160 मीटर नीचे लगाना चाहता है. नतीजा वही पुरानी हिंदुस्तानी कहानी. सरकारी योजना के नाम पर पूरा घालमेल.
अगर मैं आपको यह बताऊं कि हमने कोयला निकासी सिर्फ खुले खदानों तक सीमित कर रखी है, तो आप और ज्यादा सड़ा हुआ महसूस करने लगेंगे. हमारा पूरा भूमिगत कोयला यूं ही पड़ा हुआ है, जबकि चीन जमीन के अंदर तीन किलोमीटर तक गहरे जाकर कोयले की निकासी कर रहा है.
कोयला मंत्रालय की वेबसाइट पर दो अच्छी चीजें पढ़ने को मिलीं, जो निजी कंपनी समूहों अडाणी और जिंदल की ओर से डाली गई थीं. वे याद दिलाती हैं कि भारत के पास दुनिया में कोयले का पांचवां सबसे बड़ा भंडार मौजूद है. वे फ्लो-चार्टों के जरिए टेक्निकल प्रक्रिया को स्पष्ट करती हैं, और बताती हैं कि क्या-क्या सुधार किए जा सकते हैं और क्या-क्या संसाधन चाहिए. बेशक वे इन दिनों प्रचलित ‘एनर्जी आत्मनिर्भरता’ समेत दूसरे रणनीतिक लाभ भी गिनाती हैं. सब कुछ बिलकुल साफ-सुथरा नजर आता है.
दूरदर्शिता के मामले में हम चीन से पीछे नहीं हैं. लेकिन चीन के विपरीत हम कथनी को करनी में बदलने में पीछे रह जाते हैं. यह हमारी ही फितरत नहीं है. दुनिया में कोयले के सातवें सबसे बड़े और उच्च स्तर वाले कोयले के भंडार वाला इंडोनेशिया भी फिसड्डी रहा है. वह भी कोयले से गैस बनाने की दिशा में बढ़ रहा है.
चीन का ध्यान आसानी से इधर-उधर नहीं भटकता. उसने काफी पहले ही समझ लिया था कि तेल के मामले में झटके लगते रहेंगे, खासकर इसलिए कि अमेरिका अपने फायदे के लिए प्रतिबंधों का इस्तेमाल करता रहेगा. इसलिए उसने उस चीज में निवेश करने का फैसला किया, जो उसके कब्जे में है और उसने बाजार की उथल-पुथल की परवाह न करते हुए उस राह पर चलना जारी रखा. हाइड्रोकार्बन में गिरावट के दौरान भी उसने अपना रास्ता नहीं छोड़ा. उसे कोयले को राष्ट्रीय रणनीतिक लक्ष्य बनाना एनर्जी के मामले में आज़ादी हासिल करने का मंत्र लगा और उसने यह हासिल किया. लेकिन हम राजनीतिक-नौकरशाही-नियमन आदि के मीनमेख में उलझे पंगु बने रहे.
इस तरह की परियोजनाएं लंबा समय लेती हैं, और भारतीय ‘सिस्टम’ की अनोखी समस्या यह है कि इस बीच कभी कीमतें गिरती हैं तब किसी ‘भवन’ में बैठा कोई शख्स इन परियोजनाओं के लागत-लाभ अनुपात का मुद्दा उछाल देता है. यह निजी क्षेत्र के उत्साह पर पानी डाल देता है.
चीन क्यों सफल हुआ? उसने इसे एक रणनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में लिया और उस पर टिका रहा. इसने चीन को एनर्जी के मामले में झटकों से बचाया, जबकि भारत अपने आहत अहं को सहलाने में व्यस्त रहा.
हम जानते हैं कि कोयला एक अलोकप्रिय ईंधन है. लेकिन भारत को यही उपलब्ध है. कोयला से रसायन बनाना प्रदूषण बढ़ाने वाली गतिविधि तो है लेकिन उसे बिजली उत्पादन के लिए जलाना इससे ज्यादा प्रदूषण फैलाता है. वैसे भी, हमारा बिजली उत्पादन ज्यादा से ज्यादा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर मुड़ रहा है, और परमाणु बिजली की वापसी होती दिख रही है. डॉनल्ड ट्रंप 20 जनवरी 2029 को रवाना हो जाएंगे, और जलवायु परिवर्तन का मुद्दा फिर से ग्लोबल एजेंडा में शामिल हो जाएगा. कोयला फिर से बुरा बन जाएगा. यही समय है जब हमें इसके अपने बड़े भंडार को कम प्रदूषणकारी और अधिक लाभकारी तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए. इससे रणनीतिक सुरक्षा भी हासिल होगी. अंत में, बिजली के लिए कोयले को जलाना बुरा हो सकता है मगर उसे गैस में तब्दील करना उतना बुरा नहीं है. और उसके एक महत्वपूर्ण उत्पाद सल्फर की उद्योगों और खाद के लिए काफी मांग रहती है. इस रसायन के लिए भी हम आयात पर निर्भर हैं.
उपभोक्ता, खासकर मध्यवर्ग राजनीतिक ताकत रखता है इसलिए हम ईंधन, एलपीजी, डीजल, पेट्रोल की उपलब्धता और कीमतों में ही उलझे रहते हैं. खाद का अभाव और भी बड़ा खतरा है क्योंकि यह हमारी खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है. हमारे तमाम टीवी चैनल बेशक किसानों के सवालों पर पंगु नहीं बन जाएंगे. खरीफ का सीजन आ रहा है. सरप्लस खाद उत्पादन करने वाले राज्यों ने युद्ध से पहले से ही यूरिया और डीएपी (मुख्यतः आयात पर निर्भर) की राशनिंग शुरू कर दी थी.
इन खादों के उत्पादन के लिए भारी मात्रा में अमोनिया और गैस चाहिए. भारत जितनी प्राकृतिक गैस का उत्पादन या आयात करता है उसका 30 फीसदी खाद कारखानों को जाता है. और अब जो झटका लगा है तो मैं आपको चीन की बात बताता हूं. चीन अपने 90 प्रतिशत अमोनिया का उत्पादन कोयले को गैस बनाकर करता है. डाइअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के लिए अमोनिया जरूरी है. भारत इसका अधिकांश भाग आयात करता है. इसकी इतनी भारी कमी है कि हताश किसान इसके लिए दंगा और लूटपाट न कर बैठें इससे बचने के लिए कई राज्यों ने इसकी सप्लाई को पुलिस थानों में जमा करना शुरू किया है और इसे किसानों की भूमि के रेकॉर्ड और आधार कार्ड पर आधारित रजिस्ट्रेशन के हिसाब से आवंटित किया जाता है. और सांस रोककर यह भी पढ़ लीजिए कि चीन पूरी दुनिया की जरूरत की यूरिया का 40 फीसदी हिस्सा कोयले से हासिल की जाने वाली सिंथेटिक गैस से उत्पादित करता है. इसके अलावा वह पूरी दुनिया की जरूरत के मिथानोल का 54 फीसदी हिस्सा उत्पादित करता है, जिसका करीब 70 फीसदी भाग कोयले से हासिल किया जाता है.
इस सबमें हम कहां खड़े हैं? बड़े कृषि उत्पादक देशों में हम खाद के लिए सबसे ज्यादा आयात-निर्भर देश हैं. चीन भी कभी भी गुस्से में आकार या हमें सबक सिखाने के लिए इससे हाथ खींच सकता है.
हम अनाजों के मामले मैं अपनी आत्मनिर्भरता का ढोल पीटते रहते हैं. लेकिन इसके शोर में हम अपनी एक राष्ट्रीय शर्म को छुपाने की कोशिश करते रहते हैं. खाद के आयात पर हमारी अति निर्भरता ‘जहाज से सीधे थाली तक’ वाली हमारी हैसियत को उजागर करती है. खाड़ी में जारी युद्ध ने हमारी इन कमजोरियों से हमारा सामना करा दिया है. यह एक्शन की मांग कर रहा है. हम क्या करें? चीन ने हमें रास्ता दिखा दिया है.
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