किसी कॉलम राइटर का खुद से ही मतभेद हो जाए तो वह क्या करे? या अपनी किसी ऐसी बात पर पुनर्विचार करना पड़े जो वक्त की कसौटी पर गलत साबित हो गई हो तो क्या करे? चूंकि, यह इस कॉलम का 2025 का आखिरी लेख है इसलिए पुनर्विचार करने का यह अच्छा मौका है. क्या मैं ऐसा हर साल करूंगा? मेरे ख्याल से इसकी नौबत नहीं आएगी. मुझे उम्मीद है, मैं ऐसे तर्क नहीं रखूंगा जिन पर बाद में पुनर्विचार या संशोधन करना पड़े, या उससे पीछे हटना पड़े.
विचार पर केंद्रित कॉलम लेखक के अपने मत की प्रस्तुति करनी ही चाहिए. उसके विचार से हर कोई सहमत हो, यह ज़रूरी नहीं. बेहतर तो यह होगा कि वह वैचारिक रूप से उत्तेजक हो. कुछ बातों पर पाठकों का मतभेद दूसरों के लिए अधिक उत्तेजना पैदा कर सकता है. तब पाठक गुस्से में या आलोचना करते हुए संपादक के नाम पत्र में, या ‘दिप्रिंट’ को या हमारे ‘रीडर्स एडिटर’ को अपनी प्रतिक्रिया भेज सकते हैं. लेखक अपने पाठकों के सिवा और कहां जाएगा?
मैं जानता हूं कि इस साल मैंने इस कॉलम में जो करीब 50 लेख लिखे उनमें कुछ-न-कुछ गलत ज़रूर लगा होगा. मैं आपसे असहमत हो सकता हूं, लेकिन पिछले 25 साल में कम-से-कम पांच ऐसे लेख चुन सकता हूं जिनके लिए अपनी गलती कबूल करनी चाहिए. इस हफ्ते मैं उनमें से जो सबसे ताज़ा है उसकी बात करूंगा.
यह लेख 28 सितंबर 2024 को प्रकाशित हुआ था, जिसमें दावा किया गया था कि इस्लाम लोकतंत्र की हत्या नहीं करता, ऐसा फौज और इस्लाम के मेल के कारण होता है. आखिर पाकिस्तान और बांग्लादेश में शांतिपूर्वक सत्ता परिवर्तन अपवादस्वरूप ही क्यों होता है, जबकि इस्लामी मुल्क इंडोनेशिया और मलेशिया में ऐसा बराबर होता रहता है?
इसी तरह, मैंने कहा था कि म्यांमार लगभग पूरी तरह एक बौद्ध देश है, खासकर छोटे-से मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय रोहिंग्या को बर्बरतापूर्वक निकाल बाहर करने के बाद, फिर भी वहां फौजी हुकूमत के तहत लोकतंत्र की घालमेल वाली व्यवस्था कायम है. बहरहाल, वहां इस रविवार को मतदान होने वाला है. बौद्ध धर्म उसके लोकतंत्र के लिए अगर एक चुनौती थी, तो श्रीलंका में ऐसी कोई समस्या क्यों नहीं है?
अब सोचता हूं तो इन तर्कों में कई खामियां दिखती हैं. एक तो यह कि कई इस्लामी मुल्कों में फौज कोई दखल नहीं देती फिर भी वहां लोकतंत्र नहीं है. ऐसा लगता है कि अपने पड़ोस में मैं जो कुछ देखता रहा हूं उसने दूर की मेरी नज़र को धुंधला कर दिया था. ईरान में कोई फौजी हुकूमत नहीं है, वहां चुनाव भी होते हैं, लेकिन जनता द्वारा अनिर्वाचित मुसलिमों का राज चलता है. यह ठेठ घालमेल वाली व्यवस्था है जिसने स्थिरता कायम रखी है, जबकि पाकिस्तान में सत्ता समीकरण बदलते रहते हैं.
खाड़ी देशों में बादशाही हुकूमतों को फौज से नहीं बल्कि लोकतंत्र से डर लगता है. उनके बादशाह प्राकृतिक संसाधनों के बूते इस्लाम के नाम पर राज करते हैं. इनमें सबसे प्रमुख मामला सऊदी अरब का है. तुर्किए में नियमित रूप से चुनाव होते रहते हैं, लेकिन उसके नेता अर्दोआन ने मजहब का इस्तेमाल करके संविधान को तोड़-मरोड़ दिया है और विपक्ष को लगभग नष्ट कर दिया है.
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2024 वाले अपने उस कॉलम में मैंने अपनी तंगनजरी के कारण ‘अरब स्प्रिंग’ (2011) से मिले सबकों की भी अनदेखी कर दी थी. पश्चिमी जगत, उदारवादी संस्थाओं और ओबामा सरकार ने इसे मुस्लिम तानाशाही वाले मुल्कों में “सुखद लोकतांत्रिक उभार” बताकर इसका स्वागत किया था, कि आखिर जनता अपने हक पर दावा कर दिया है.
भारत में भी उदारवादी खेमे में कुछ उत्साह देखा गया. आखिर हम लोगों ने भी कवि रामधारी सिंह दिनकर की उस पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ से प्रेरित होकर इमरजेंसी के खिलाफ संघर्ष किया था, जिसे जयप्रकाश नारायण ने नारे के रूप में इस्तेमाल किया था; या वामपंथी-उदारवादी खेमे में खासतौर से लोकप्रिय फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इन लोकप्रिय पंक्तियों को दोहराते हुए कि ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे/ और राज करेगी ख़लक़-ए-खुदा, जो मैं भी हूं और तुम भी हो’.
लेकिन ‘अरब स्प्रिंग’ वाला जज्बा तेज़ी से गायब हो गया. कुछ देशों में तो लोगों ने पिछली तानाशाही की वापसी का स्वागत किया, जैसे मिस्र में और कुछ देशों में तानाशाह तो बचे रहे, लेकिन देश विफल (सीरिया) हो गया, कई बागी गुट उभरे, लेकिन लोकतंत्र या राष्ट्रवाद के नाम पर नहीं बल्कि इस्लाम की अलग-अलग व्याख्याओं के नाम पर.
ट्यूनीशिया और अल्जीरिया ने अपना वजूद बचाए रखने के लिए ‘सुधार’ किए; यमन अभी भी युद्ध झेल रहा है; और लीबिया की जो दुर्दशा हुई है उसके बारे में चर्चा करने के लिए तो यह कॉलम छोटा पड़ जाएगा. उसकी हालत की व्याख्या करने की कोशिश मैंने ‘कट द क्लटर’ की इस कड़ी में की है. यह सवाल क्रूरता लग सकती है, लेकिन आप पूछ सकते हैं कि क्या यह देश कर्नल गद्दाफी के राज में बेहतर हाल में नहीं था? कम-से-कम वह एक अरब राष्ट्रवादी तो था? अब यह देश दो सरदारों में बंट गया है, जो तेल की कमाई के चुराए गए पैसे से कालाबाज़ार से हथियार खरीद रहे हैं.
‘अरब स्प्रिंग’ के नाकाम होने की मुख्य वजह यह थी कि इन सभी देशों में एकमात्र संस्थागत रूप से संगठित समूह ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ था. यह सत्ता के लिए लोकतंत्र का इस्तेमाल तो करना चाहता था लेकिन उसका एजेंडा था—अखिल राष्ट्रीय धार्मिक रूढ़िवादी विचारधारा की स्थापना.
मेरे तर्क खासकर इसलिए गलत थे क्योंकि कई इस्लामी देशों में फौज वास्तव में स्थिरता और सुरक्षा देने (अल्पसंख्यकों को भी) वाली ताकत रही है. हम देख रहे हैं कि पड़ोस में, बांग्लादेश में फिलहाल तो वह यह अमूल्य भूमिका निभा रही है. हालांकि, इस देश का इतिहास अस्थिरता और फौजी तानाशाही का ही रहा है. मिस्र में जनरल अब्देल फत्तह अल-सीसी ने ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ के मोहम्मद मोरसी से निजात पाई और जनता से मान्यता हासिल करके चैन की सांस ली है.
इसी तरह, ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में फौज ने इस्लामवादी ताकतों को नाकाम करके देश को विफल होने से बचाया है. इसलिए, यह कहना कि फौज-इस्लाम के मेल ने लोकतंत्र को खत्म किया, मामले का बिलकुल सरलीकरण ही था.
इस्लाम और लोकतंत्र परस्पर विरोधी हैं या नहीं, यह जटिल बहस का मुद्दा है. इस बारीक भेद को हम दो सवालों से समझ सकते हैं—एक यह कि क्या एक मुस्लिम शासन और लोकतंत्र के बीच कोई विरोध है?; और दूसरा यह कि इस्लामी और इस्लामवादी में क्या फर्क है?
पहले सवाल का बदकिस्मती से ज़्यादातर मामलों में जवाब ‘हां’ ही है, बावजूद इसके कि मालदीव, इंडोनेशिया (सबसे बड़ा मुस्लिम देश) और मलेशिया जैसे कुछ अपवाद मौजूद हैं. किसी मतवाद में अंधी आस्था पूर्वनिर्धारित एकात्मक शासन व्यवस्था को जन्म देती है, ठीक वैसे ही जैसे कम्युनिस्ट व्यवस्था में होता है. इसलिए उदारवादी-वामपंथी-इस्लामी वैश्विक गठबंधन इतना निरर्थक है. दोनों पक्ष एक साझा दुश्मन, ‘दुष्ट’ पश्चिमी दुनिया और उसकी ‘चहेती औलाद’ इज़रायल के खिलाफ लामबंद होने से कतराते हैं. इस्लामी बुद्धिजीवियों को वैश्विक सम्मान पाने के लिए वाम पक्ष की जरूरत महसूस होती है और वाम पक्ष को अपने शिकार के रूप में दरकिनार किए गए मुसलमानों की ज़रूरत पड़ती है. जब तक एक भी मुसलमान गुस्से में है, अमेरिकी साम्राज्यवाद और नव-उदारवाद से क्यों न लड़ा जाए? क्या कोई कम्युनिस्ट शासन लोकतांत्रिक हो सकता है? इसे समाजवाद समझने की भूल मत कीजिए और, क्या कोई इस्लामी मुल्क लोकतांत्रिक हो सकता है?
यह हमें इस्लामी और इस्लामवादी के बीच के भेद तक पहुंचाता है. इस्लामी का सीधा मतलब एक आस्था से जुड़ाव है. इस्लामी होना वैसा ही है जैसे हिंदू, या ईसाई, या यहूदी या नास्तिक होना है. यह दूसरों को अपनी आस्था को अपनाने के लिए मजबूर नहीं करता. इसके विपरीत इस्लामवाद एक राजनीतिक विचार है जो दूसरी आस्था वालों पर अपनी आस्था के नियम-कायदों को थोपना चाहता है और वे न मानें तो उन्हें दंड देने के लिए कहता है.
यह ‘आईएसआईएस’ है, वह विचारधारा जिसने ऑस्ट्रेलिया के बोंडी बीच पर जनसंहार करवाया; श्रीलंका में ईस्टर त्योहार के दौरान बमबारी करके ईसाइयों को निशाना बनाया; सीरिया तथा उसके पड़ोस और दुनियाभर में लूटपाट कारवाई. लोकतंत्र को भूल जाइए, इस्लामवादी तो राष्ट्रवाद का मुखौटा भी नहीं पहनना चाहेंगे. वे चाहते हैं कि सभी मुस्लिम मुल्कों पर एक ही खलीफा की हुकूमत चले. इसलिए इस्लामवादी ‘आइएसआइएस’ ही वह ताकत है जिससे हरेक मुस्लिम मुल्क डरता है. दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि कई देशों में निष्पक्ष चुनावों के बाद वे (मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर) सत्ता में आ गए.
इसलिए हम आसानी से यह कह सकते है कि इस्लामवादियों (इस्लाम से जुदा) और लोकतंत्र के बीच विरोध है. पाकिस्तान एक इस्लामी गणतंत्र है, जहां राष्ट्रवाद मजबूत है. वह इस्लामवादी नहीं है, वह किसी और इस्लामवादी मुल्क के लिए कभी लड़ाई नहीं लड़ेगा, बशर्ते उसे इसके लिए पैसे न दिए जाएं. यहां तक कि लश्कर-ए-तय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद भारत के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए इस्लाम का ही इस्तेमाल करते हैं.
दुनिया में शरीयत पर सबसे कड़ाई से अमल करने वाला तालिबान भी ‘आईएसआईएस’ से इसलिए डरता है क्योंकि यह उन्हें अपने राष्ट्रवाद के लिए खतरा लगता है. क्या वे स्वतंत्र चुनाव करवाने का जोखिम उठाएंगे? खाड़ी का कोई भी देश ऐसा नहीं करेगा. इराक़ एक अपवाद दिखता है लेकिन वहां शियाओं का बहुमत और ईरानी दबदबा इसके लोकतंत्र को कमज़ोर करता है.
सितंबर 2024 के अपने इस कॉलम में मैंने इन बारीकियों की अनदेखी कर दी थी. मैं पड़ोस के हालात में ज्यादा उलझ गया था. अफसोस की बात यह है कि जब आप लाल सागर से बंगाल की खाड़ी तक एक लाइन खींचते हैं तो उस पर जो मुस्लिम देश स्थित हैं उनमें से जिन देशों में मुसलमानों को निश्चित अवधि के लिए अपना शासक चुनने के वास्ते बेरोकटोक स्वतंत्र मतदान का मौका मिलता रहा है, वे दो छोर पर हैं: इजरायल और भारत. सो, अब मैंने सुधार कर लिया है.
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