Tuesday, 25 January, 2022
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नागालैंड में हुई हत्याओं ने दिखाया है कि AFSPA की कैसे लत लग चुकी है, क्या मोदी सरकार इसे हटाने की हिम्मत करेगी

उत्तर-पूर्व के अधिकांश भाग को ‘आफस्पा’ जैसे सख्त कानून की जरूरत नहीं है. कोई भी सरकार इसे रद्द करने की हिम्मत नहीं करेगी, तो इसे जहां जरूरी है वहीं लागू किया जाए.

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नागालैंड में म्यांमार की सीमा पर मोन जिले में हुई मौतों को दुर्भाग्यपूर्ण बताकर चुप हो जाना एक सुविधाजनक झूठ और बहाना जैसा ही होगा. यह हमारे नागा भाइयों को तो नहीं ही जंचेगा. उन मौतों को अहंकारपूर्ण हमला ही कहा जा सकता है. अक्षमता को समझना तो आसान है. सख्त सैनिक कहा करते हैं कि कभी-कभी ऐसा हो जाता है लेकिन यह अहंकार क्यों पैदा होता है, इसका विश्लेषण करना ज्यादा महत्वपूर्ण है.

खास ‘स्पेशल फोर्स’ मानी जाने वाली सेना, जिसे विश्व स्तरीय ट्रेनिंग मिली हो और जिसका इतिहास शानदार रहा हो, उसकी कोई यूनिट देश के किसी हिस्से में- चाहे वह जम्मू-कश्मीर ही क्यों न हो- किसी वाहन पर बिना जांच किए क्या इस तरह ताबड़तोड़ गोलियां बरसा सकती है?

उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती क्षेत्र, खासकर वे राज्य जो अलगाववाद से लंबे समय से ग्रस्त रहे हैं, दूरदराज़ में होने की यातना भुगतते रहे हैं. यह इलाका देश के ‘मुख्य भाग’ से, राष्ट्रीय मीडिया से बहुत दूर है, यहां के लोग बहुत गरीब और पिछड़े हैं, तो यह सब किसे पता लगेगा? इस तरह का भाव होता है. इसके अलावा, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफस्पा) भी अहंकार को जन्म देता है.

भाजपा की नागालैंड शाखा समेत उत्तर-पूर्व की अधिकतर प्रमुख राजनीतिक पार्टियां ‘आफस्पा’ को रद्द करने की मांग करती रही हैं. मेघालय और नागालैंड में भाजपा के गठबंधन के सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री भी यह मांग करते रहे हैं.

इस कानून की ये तीन क्रूर सच्चाइयां हम जान चुके हैं:

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1. इस कानून के कारण मनमानी करने और उसकी जवाबदेही से बच निकलने का जो अधिकार हासिल है वह न होता तो उस तरह का आक्रमण कभी नहीं होता. तब सेना की यूनिट को स्थानीय मजिस्ट्रेट और पुलिस को भरोसे में लेकर उन्हें साथ लेना पड़ता. स्थानीय स्थिति की जानकारी ने शायद उनके ज़मीर और सर्विस रिकॉर्ड पर दाग न लगने दिया होता और संभावित कोर्ट मार्शल से भी बचा जा सकता था. आप जितने दूरदराज क्षेत्र में हैं, स्थानीय स्थितियों की जानकारी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है.

2. आफस्पा को रद्द करने का वक्त आ गया है. इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए. कम-से-कम अपने वर्तमान स्वरूप और मनमाने रूप से लागू किए जाने की छूट के कारण यह न तो सेना के काम का है और न राष्ट्र हित में है.

3. और सबसे कठोर सच्चाई यह है कि इन सबके बावजूद यह कानून जाने वाला नहीं है. हम गुस्से में सैकड़ों संपादकीय लिख डालें, विरोध में जुलूस-धरना आयोजित कर डालें, कुछ भी कर लें, यह जाने वाला नहीं है. इसके ऊपर काफी राजनीतिक पूंजी लगी हुई है. भारत की कोई भी सरकार इस तरह का ‘नरम’ कदम नहीं उठाना चाहेगी, मोदी-शाह की सरकार तो और भी नहीं. किसी राजनीतिक दल ने भी इस पर विचार नहीं किया. न ही कांग्रेस-यूपीए ने 10 साल तक कुछ किया.

फिर भी, एक उपाय है. नागालैंड के इस भयानक कांड के बावजूद अगर इस कदम पर जोर नहीं दिया जाता तो हम एक मौका गंवा देंगे और यह देश के हित को चोट पहुंचाएगा. इसलिए, आगे का रास्ता कुछ ऐसा है..


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चूंकि कानून को रद्द नहीं किया जाएगा, तो इस संभावना पर विचार किया जा सकता है कि इसके मामले में ‘जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल’ करने का सिद्धांत अपनाया जाए. आज जिन क्षेत्रों में यह कानून लागू है उन पर गौर करें. आंतरिक सुरक्षा के बारे में खबरें देने वाली हमारी युवा संवाददाता अनन्या भारद्वाज ने मुझे यह ब्योरा उपलब्ध कराया है:

1. जम्मू-कश्मीर, असम और नागालैंड के पूरे केंद्रशासित प्रदेशों और राज्यों में.

2. इंफाल नगरपालिका क्षेत्र को छोड़ पूरे मणिपुर राज्य में.

3. अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी जिलों तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग में और नामसाई जिले के नमसाई और महादेवपुर पुलिस थाना क्षेत्रों में.

अब हम जम्मू-कश्मीर की स्थिति को समझ सकते हैं. आक्रामक और बदनीयत पाकिस्तान की सीमा पर होने के कारण यह सक्रिय फौजी क्षेत्र है. राजनीतिक रूप से भी यह इतना संवेदनशील है कि कोई भी सरकार यहां सुरक्षा संबंधी नीति में नरमी बरतती दिखना नहीं चाहेगी. न ही इसका अभी समय आया है. लेकिन क्या सशस्त्र बलों को हर जगह ऐसे ही अधिकार चाहिए?

मणिपुर में सीमावर्ती इलाकों में छिटपुट वारदात होती रहती हैं. हमें मालूम है कि हाल में चूड़चंद्रपुर जिले में असम राइफल्स के कमांडिंग अफसर, उनकी पत्नी तथा बेटे और चार जवानों को जिस तरह घेर कर मार डाला गया उसके मद्देनजर हमारी बात हल्की लगे. लेकिन व्यापक दायरे में देखें तो इस राज्य का अधिकांश भाग कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहा है. इसमें तंगखुल जिले को भी शामिल किया जा सकता है, जो कभी नागा विद्रोह का केंद्र हुआ करता था. अब विवेकपूर्ण कदम यही होगा कि इस राज्य में म्यांमार की सीमा से लगे इसके 25-30 किलोमीटर क्षेत्र को छोड़कर अधिकांश हिस्से से आफस्पा को हटा लिया जाए.

इस क्षेत्र में कोई फौजी ऑपरेशन नहीं चल रहा है. भगवान न करे, अगर सेना के किसी काफिले या गश्ती दल पर हमला होता है, तो उनके पास जवाब देने की पूरी ताकत तो होती ही है.

यह हमें इस सवाल से सामना कराता है कि पूरे असम को आफस्पा के अंदर क्यों रखा जाए? वहां कभी कभार कम ताकत वाले बम विस्फोट हो रहे होंगे लेकिन इस तरह के इक्का-दुक्का विस्फोट पंजाब सहित देश के कई दूसरे इलाकों में भी होते हैं. पंजाब में हमने देखा है कि निशाना बनाकर भी कुछ हत्याएं की गई हैं. इस राज्य में 1983 से 1997 तक आफस्पा लागू रहा. जब आतंकवाद खत्म हुआ, आफस्पा को भी हटा लिया गया. इसके बाद करीब 25 साल से इस राज्य ने अर्जित की गई शांति का उपभोग किया है. असम को इससे क्यों वंचित रखा जाए?

उल्फा लगभग खत्म हो चुका है. बोडो विद्रोह शांत हो चुका है, उसके अधिकतर लोग मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गए हैं. पुराने बागियों का प्रमुख गुट दरअसल इस साल के शुरू तक राज्य की भाजपा सरकार का हिस्सा था.

बोडो इलाकों में गड़बड़ी उभरती है या उत्तरी कछार हिल्स इलाके में बाकी बचे आदिवासी बागी गुट अगर उपद्रव करते हैं, तो अर्द्धसैनिक बल पूर्वी-मध्य भारत के कहीं ज्यादा सक्रिय और खतरनाक नक्सल इलाकों में जिस कानूनी व्यवस्था के तहत कार्रवाई करते हैं उनके तहत वहां क्यों नहीं जवाबी कार्रवाई कर सकते? अगर इस विद्रोह से आफस्पा के बिना लड़ा जा सकता है, तो इनसे कहीं अधिक शांतिपूर्ण असम पर इसे क्यों थोपा जाए? अगर आपको आफस्पा से खास मोहब्बत नहीं हो गई है, तो असम को उसके चंगुल में रखने का कोई मतलब नहीं है.

यही बात नागालैंड पर लागू होती है. ताकतवर बागी आदिवासी समुदायों ने 1975 के शिलांग शांति समझौते के बाद भारतीय संविधान को कबूल कर लिया और मुख्यधारा में शामिल हो गए. जो गुट भूमिगत हो गया और जब-तब लड़ता रहा उस एनएससीएन (आई-एम) गुट ने 1997 में युद्धविराम समझौते पर दस्तखत कर दिया. इसके बाद करीब 25 साल से इस राज्य में पूरी शांति है.

यहां तक कि उत्तर-पूर्व में मिजोरम को 1986 में शांति समझौते के बाद आफस्पा से मुक्त कर दिया गया. त्रिपुरा के माकपाई मुख्यमंत्री ने लालकृष्ण आडवाणी के अधीन रहे गृह मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया और आफस्पा को आकस्मिक रूप से वापस ले लिया गया, वो भी एक-एक करके एक-एक पुलिस थाने से. शांति के लिए लोग पुरस्कार के हकदार हैं.

सच है कि नागालैंड में एनएससीएन और कुछ छिटपुट गुट बेरोकटोक अपना ‘शासन’ चलाते हैं और सरकारी कर्मचारियों तक से ‘टैक्स’ वसूलते हैं. सेना को इसकी अनदेखी करने के लिए कहा गया है. दरअसल, यह युद्धविराम समझौते का ही हिस्सा है. मुझे याद नहीं है कि करीब दो दशक से नागालैंड में सेना ने पहल करके कोई ऑपरेशन किया हो. तब पूरे राज्य को स्थायी तौर पर आफस्पा की गिरफ्त में क्यों रखा जाए? हमें इसका नशा हो गया है. और दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में सिखों तथा जाटों के विपरीत नागा इतने कम तादाद में हैं और इतने दूर-दूर हैं कि वे हमारी घेराबंदी नहीं कर सकते.

आप अभी भी चाहेंगे कि राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में एनएससीएन-के जैसे इक्का-दुक्का गुटों की, जिन्होंने युद्धविराम को कबूल नहीं किया है, गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ‘आफस्पा’ लागू रखा जाए. मोन में जो बेकसूर लोग मारे गए उन पर ऐसी ही गतिविधियों में शामिल होने का शक था. इसी तरह, अरुणाचल प्रदेश के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए भी यही सोचा जा सकता है क्योंकि सामरिक दृष्टि से वे काफी संवेदनशील हैं, वे म्यांमार के करीब के और आदिवासी कबीलों के ऐसे क्षेत्र हैं जो कम निगरानी में हैं. लेकिन बाकी 90 फीसदी नागालैंड से आफस्पा को बेहिचक हटाया जा सकता है.


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देश के कई हिस्सों में यह केवल इसलिए लागू है कि कानून से मिले अधिकार उन्मत्त कर देते हैं. वैसे भी भाव यह होता है कि क्या फर्क पड़ता है, भुगतना तो दूरदराज़ के उत्तर-पूर्व के छोटे-से आदिवासी अल्पसंख्यकों को पड़ रहा है. और, फिर भी हम सवाल उठाते हैं कि उत्तर-पूर्व के लोगों में अलगाव की भावना क्यों है.

इस सवाल को जरा घुमा कर देखें. भारत में कश्मीर के बाहर बगावत के एकमात्र क्षेत्र आदिवासी नक्सल क्षेत्र हैं. पिछले एक दशक में वहां हर साल जितने गुमनाम लोग मारे गए हैं उतने कश्मीर में भी नहीं मारे गए. फिर भी हम इस समस्या का मुकाबला केवल अर्द्धसैनिक बलों के जरिए क्यों कर रहे हैं? उन्हें हम आफस्पा की सुरक्षा क्यों नहीं दे रहे हैं?

जवाब सीधा-सा और स्वार्थी किस्म का है. यह मुख्य क्षेत्र है. वे आदिवासी भारतीय हैं. हिंदू भी हैं. मुझे यह सवाल उठाने के लिए वामपंथी और दक्षिणपंथी, दोनों खेमों का कोप झेलना पड़ा है कि क्या इसका अर्थ यह है कि उत्तर-पूर्व के आदिवासी या कश्मीरी कम भारतीय हैं? ओह, लेकिन कश्मीर में तो दरवाजे पर ही पाकिस्तानी बैठे हैं.

अब, मेरे साथ उत्तर-पूर्व चलिए. उसके पड़ोस का पूर्वी पाकिस्तान 1971 में भाप बनकर उड़ गया. अब काफी करीबी दोस्त बांग्लादेश है, जो अपने यहां घुस आने वाले हमारे बागियों को खुशी से हमारे हवाले कर देता है. तो फिर, उत्तर-पूर्व को शांति का लाभ क्यों न मिले? 1971 में विजय से जो लाभ हुआ उसे उत्तर-पूर्व के आदिवासियों से साझा क्यों न किया जाए. इसलिए कि, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, आफस्पा एक घातक नशा है. सत्ता का आत्मघाती नशा.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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