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Wednesday, 18 February, 2026
होममत-विमत‘मोहम्मद’ दीपक और प्रभवती अम्मा: डर और चुप्पी के दौर में हिम्मत की नई मिसाल

‘मोहम्मद’ दीपक और प्रभवती अम्मा: डर और चुप्पी के दौर में हिम्मत की नई मिसाल

दीपक और अम्मा के काम मायने रखते हैं. एक ऐसे देश में जहां सामूहिक लापरवाही जीने की रणनीति बन गई है, वहां किसी को ‘ना’ कहते देखना एक बड़ा बदलाव जैसा लगता है.

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जब दीपक ‘अक्की’ कुमार ने उत्तराखंड के कोटद्वार में एक बुजुर्ग दुकानदार की रक्षा के लिए आगे कदम बढ़ाया, तो उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने कांच की एक खिड़की पर हथौड़ा मार दिया है. भारत के सबसे ज्यादा सांप्रदायिक तनाव वाले राज्यों में से एक में, 42-साल के जिम मालिक के सिर्फ पांच शब्द—“मेरा नाम मोहम्मद दीपक है”—ने उस कांच में एक दरार डाल दी. वह कांच हमारी इस पुरानी सोच का था कि हमारे समाज में व्यक्तिगत साहस की कोई जगह नहीं है.

ढाई हफ्ते बाद, उत्तराखंड से 2,500 किलोमीटर दक्षिण में केरल के कोझिकोड में, प्रभवती अम्मा ने एक और जोरदार झटका दिया. उन्होंने व्यस्त एरंजीपालम सिग्नल पर फुटपाथ पर अपने पैर जमा लिए और ट्रैफिक से बचकर निकलने की कोशिश कर रहे एक स्कूटर सवार को रास्ता देने से मना कर दिया.

यह समझने के लिए कि ‘मोहम्मद’ दीपक ने लोगों का ध्यान क्यों खींचा, हमें समझना होगा कि उनकी हिम्मत की कीमत क्या थी. उनका फिटनेस सेंटर, हल्क जिम, वकील अहमद की “बाबा स्कूल ड्रेस” दुकान के पास है, जिसे 70 साल के मुस्लिम व्यक्ति पिछले 30 साल से चला रहे हैं. 26 जनवरी को, बजरंग दल से जुड़े होने का दावा करने वाले 30-40 लोगों की भीड़ दुकान पर पहुंची और अहमद से दुकान का नाम बदलने की मांग की. उनका कहना था कि “बाबा” एक हिंदू धार्मिक शब्द है और एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा इसका इस्तेमाल करना गलत है.

दीपक ने बीच में आकर भीड़ से कहा कि भारत में सभी को बराबरी का अधिकार है. जब भीड़ ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने समझ लिया कि मामला किस दिशा में जा रहा है और उन्होंने अपना नाम “मोहम्मद दीपक” बताया, लेकिन ऐसा करके वे खुद निशाने पर आ गए, जो पहले मुस्लिम दुकानदार पर था.

जैसा कि अब ऐसे मामलों में आम हो गया है, कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. भीड़ के “अज्ञात” लोगों के खिलाफ भी केस दर्ज हुए. कुछ ही दिनों में, एक हिंसक समूह कुमार के जिम के बाहर भी पहुंचा और तोड़फोड़ करने की कोशिश की. हिंसा के कारण जिम की सदस्य संख्या 150 से घटकर सिर्फ 12 रह गई. महिला सदस्य, जो पहले ही पुलिस बैरिकेड और बाहर नारे लगा रहे प्रदर्शनकारियों से डरी हुई थीं, पूरी तरह आना बंद हो गईं.

हिंदू रक्षा दल की तरफ से कुमार को जान से मारने की धमकियां भी मिलीं. उन्हें “सेक्युलर कीड़ा” कहा गया, जो कई अपमानजनक शब्दों में सबसे हल्का शब्द था. इसी बीच, बिहार पुलिस ने उत्कर्ष सिंह नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जिसने सोशल मीडिया पर उनकी हत्या के लिए 2 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था. साफ है कि ये संगठन उनके नाम पर उदाहरण सेट करना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने जो उदाहरण पहले ही पेश कर दिया है, वह बिल्कुल अलग है.

इन सब के बावजूद, कुमार ने एक अलग ही असर पैदा किया. सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में लोगों की बाढ़ आ गई. सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास कोटद्वार पहुंचे. चूंकि कुमार ने किसी भी तरह के डोनेशन लेने से मना कर दिया था, ब्रिटास ने जिम की सालाना सदस्यता खरीदी. सुप्रीम कोर्ट के 15 वकीलों ने भी ऐसा ही किया और उन युवाओं के लिए सदस्यता खरीदी जो फीस नहीं दे सकते थे. कई वकीलों ने मुफ्त कानूनी मदद देने का भी वादा किया. इसके बाद राहुल गांधी ने कहा: “हमें और दीपक चाहिए, जो झुकेंगे नहीं, डरेंगे नहीं और संविधान की रक्षा करेंगे…आप एक बब्बर शेर हैं.”

प्रभवती अम्मा की कहानी अलग है, लेकिन उतनी ही दिल को छूने वाली है. पहले भी, 73 साल की अम्मा ने कई बार शिकायत की थी कि लोग एरंजीपालम फुटपाथ का इस्तेमाल ट्रैफिक से बचने के लिए करते हैं. जब अधिकारियों ने कुछ नहीं किया, तो उन्होंने खुद कदम उठाया. एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा रिकॉर्ड किया गया उनका स्कूटर सवार से सामना, आखिरकार केरल मोटर व्हीकल्स डिपार्टमेंट का ध्यान खींच लाया. विभाग ने उनके घर जाकर उन्हें शॉल देकर सम्मानित किया और स्कूटर सवार का लाइसेंस रद्द कर दिया. इस तरह, उन्होंने उस सबक को सही साबित किया जो अम्मा सिखाना चाहती थीं: फुटपाथ पैदल चलने वालों का होता है—बस किसी को इस पर जोर देना था.

जैसा चल रहा है, उसे मानने से इनकार

कुमार और अम्मा अपवाद हैं और यही वजह है कि वे मायने रखते हैं. एक ऐसे देश में जहां सामूहिक लापरवाही जीने की रणनीति बन गई है, वहां किसी को “ना” कहते देखना एक बड़ा और अलग कदम लगता है. उन्होंने “बायस्टैंडर इफेक्ट” को उलट दिया, जबकि हम बाकी लोग सिर्फ देखते रहे. दर्शक के रूप में, हम इसलिए प्रभावित होते हैं क्योंकि हम भूल चुके हैं कि ऐसा भी हो सकता है.

सालों से नफरत, छोटी सोच और नागरिक जिम्मेदारी की कमी इतनी बढ़ गई है कि लोग इसे अब नॉर्मल मानने लगे हैं. हमें यह आदत हो गई है कि सबसे सुरक्षित तरीका है चुप रहना, अपने आप में सिमट जाना और कोई विरोध या हंगामा न करना.

देश की बहस ने हमें यह सिखा दिया है कि हम सिर्फ बाहरी दुश्मनों पर ध्यान दें, जबकि हमारे अपने देश के अंदर हो रहे गलत कामों को चुनौती नहीं दी जाती. पाकिस्तान से नफरत करना, एक फुटपाथ को वापस लेने से आसान है. “अज्ञात लोगों” के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना, अपने दरवाजे पर खड़ी भीड़ का नाम लेने से आसान है. हमारी लाचारी और मानसिक सुरक्षा की इच्छा का हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया गया है. इसलिए हम अपनी निराशा को ही सच्चाई का प्रतीक मानकर पहन लेते हैं.

लेकिन कभी-कभी, एक 73 साल की महिला इस लाचारी के खिलाफ आवाज उठाती है और हंगामा करती है. एक जिम मालिक और उसका दोस्त गुंडों के सामने खड़े हो जाते हैं और अगर हम भाग्यशाली हैं, तो उनकी हिम्मत को कोई देख लेता है. यही तय करता है कि क्या चीज़ गायब हो जाएगी और क्या चीज़ बड़ा बदलाव लाएगी. जब हम किसी की जिद को सबके सामने देखते हैं, तो हमें अपनी खुद की हार मान लेने वाली सोच का सामना करना पड़ता है.

ऐसे उदाहरण और जगहों पर भी दिखते हैं. एक डिलीवरी वर्कर जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर पानी से भरे गड्ढे में कूदकर एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर को बचाने की कोशिश की, जब कोई और ऐसा करने को तैयार नहीं था. कुछ स्थानीय लोग जिन्होंने एक गरीब मुस्लिम फूड विक्रेता के समर्थन में आवाज उठाई, जिसे कुछ यूट्यूबर्स परेशान कर रहे थे. कुछ लोगों के एक समूह ने डंडों से लैस बजरंग दल के लोगों को भगा दिया, जो वैलेंटाइन डे मना रहे कपल्स को परेशान करना चाहते थे. यह छोटे-छोटे लेकिन बहुत बहादुरी वाले काम हैं—जो कुछ वक्त के लिए वायरल होते हैं और फिर भूला दिए जाते हैं, लेकिन उनमें एक ही चीज़ समान है: यह मानने से इनकार कि चीज़ें हमेशा ऐसी ही रहेंगी.

लेकिन यह भी सच है कि थोड़ा सा पागलपन या जोखिम उठाने की हिम्मत, जीने के लिए ज़रूरी है. एक व्यक्ति की जिद, कई लोगों के लिए उम्मीद बन सकती है. एक बेचैन देश में, उम्मीद रखना ही सबसे बड़ा और अलग कदम है.

करनजीत कौर पत्रकार हैं. वे TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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