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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की फ़ोटो । पीटीआई
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सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषकों का हमेशा से ये मानना रहा है कि आरएसएस और उसकी राजनीतिक संस्था भारतीय जनता पार्टी हमेशा धर्म की राजनीति करके ही सफलता पाती है, और जब-जब जाति की बात प्रमुखता से उठती है तब-तब उसे मात खानी पड़ती है. आरएसएस-बीजेपी की विराट हिंदू एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा जाति की हकीकत ही है. धर्म पर ध्रुवीकरण हो तो वो फायदे में रहती है. लेकिन जाति के आधार पर ध्रुवीकरण का खेल खेलना उसे कम आता है.

आरएसएस की तमाम सोशल इंजीनियरिंग के बावजूद, यह बात सच है कि भाजपा मूल रूप से ब्राह्मण और बनियों की पार्टी है और हद से हद इसका विस्तार करके इसके सवर्णों की पार्टी कहा जा सकता है. यही इनका कोर वोट है. यह सही है कि निचले स्तर पर बहुत सारे एससी और ओबीसी को भाजपा ने एक रणनीति के तहत मौका दिया है, लेकिन पार्टी में वर्चस्व ब्राह्मण और बनियों का ही है, और उसके सारे दीर्घकालीन फैसले इन्हीं वर्गों के हितों में रहते हैं.

भाजपा को दिक्कत हमेशा से जाति की राजनीति से रही है क्योंकि इस मामले में उसकी उक्त असलियत सामने आ जाती है और उसे मात खानी पड़ती है.

धर्म की सियासत करती रही है भाजपा

हर चुनाव में भाजपा की कोशिश रहती है कि मुख्य मुद्दा धर्म का रहे, मुसलमानों का रहे, ताकि सभी हिंदू जातियां एकजुट होकर उसके पक्ष में वोट दे दें. अगर जाति की बात होगी तो समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल, राष्ट्रीय लोकदल, राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू, आरएलडी जैसी पार्टियों को अपने समर्थकों को ये साबित करने का मौका मिल जाता है कि भाजपा हिंदुत्व के नाम पर केवल सवर्णों की बात करती है.

इस बार पहली बार हुआ कि भारतीय जनता पार्टी जाति की पिच पर मैच खेलने पर मजबूर हुई. इसका बड़ा कारण 5 राज्यों में, खासकर तीन बड़े राज्यों-मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में हुई उसकी हार रही.

भाजपा को खतरा हुआ कि कहीं सवर्ण वोट राहुल ‘दत्तात्रेय’ गांधी के जनेऊ की तरफ आकर्षित न हो जाए, और उसके क्षीण होते जनाधार में बड़ी सेंध लग जाए.


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इसके अलावा, भाजपा को अपने मूल जनाधार को ये भी संकेत देना था कि वह अपना नुकसान सहकर भी उसका हित करने से बाज नहीं आती. आरक्षण प्रणाली की समीक्षा करने की बात आरएसएस हमेशा से उठाता रहा है, और इस बारे में उसे कुछ ठोस करने की जरूरत थी. जाते-जाते वह यही काम कर गई.

विरोध करने से चूक गए सामाजिक न्याय वाले दल

भारतीय जनता पार्टी ने तो अपने जनाधार और अपने हितों को ध्यान में रखते हुए जो किया, वह उसके हिसाब से ठीक ही है, लेकिन भाजपा विरोधी दलों की राजनीति इस मामले में समझ से परे रही.

भाजपा विरोधी दलों को हमेशा से ये तलाश रही है कि जाति का मुद्दा प्रमुखता से उठे ताक भारतीय जनता पार्टी को घेरा जा सके. इस बार सवर्ण आरक्षण के विधेयक के मुद्दे पर इन दलों को, खासकर सपा-बसपा गठबंधन को यह मौका मिला था कि वे भाजपा को जाति की पिच पर खींचकर बुरी तरह से मात दे सकें, लेकिन हैरत की बात है कि इन दलों ने ये मौका बड़ी आसानी से जाने दिया.

इन दलों ने न तो जाति जनगणना का मुद्दा इस बहाने उठाया और न ही पहले से ही सारे संसाधनों पर कब्जा जमाए बैठे सवर्णों को अलग से आरक्षण देने का किसी तरह से विरोध किया. ऐसा भ्रम भी शायद इन दलों को हुआ कि सवर्ण आरक्षण विधेयक का समर्थन करने से उन्हें सवर्णों के वोट मिल जाएंगे.

ये दल यह भी भूल गए कि सवर्ण वोट भाजपा को छोड़कर कैसे उनकी तरफ आ सकते हैं जबकि भाजपा ने मंत्रिमंडल से लेकर पीएमओ तक में पूरा-पूरा सवर्ण वर्चस्व कायम रखा है, और सवर्ण आरक्षण विधेयक भी वही लेकर आई है.

अब सवर्ण आरक्षण विधेयक का समर्थन को तकरीबन सभी दलों ने कर दिया है तो क्या सवर्ण समुदाय इतना नासमझ है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में वह सभी दलों में बँटकर अपनी अहमियत खत्म कर लेगा?

महिला आरक्षण विधेयक

अगर संसद में बहुमत न होने का तर्क ये दल देते हैं, तो सवाल यह उठता है कि विधेयक को रोक पाना अगर उनके लिए संभव न भी होता, तब भी उसका विरोध करने की कोशिश तो की ही जा सकती थी.

महिला आरक्षण विधेयक का भी तो केवल सपा-बसपा और राजद जैसे दल ही विरोध करते हैं, और सिद्धांत रूप में भाजपा और कांग्रेस जैसे दल उसके पक्ष में रहते हैं, लेकिन वह विधेयक कभी संसद में पेश नहीं हो पाया.

महिला आरक्षण विधेयक जब भी संसद में पेश करने की कोशिश की गई, हर बार किसी न किसी ने मंत्री के हाथों से विधेयक छीनकर उसकी प्रतियां फाड़ दीं. इस प्रवृत्ति की कितनी भी आलोचना क्यों न की गई हो, लेकिन ये तो सच है कि वह विधेयक संसद में पेश न हो पाया और न ही भाजपा जैसी भारी बहुमत वाली पार्टी भी संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश करने की हिम्मत कर पाई.


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अगर, सामाजिक न्याय की पक्षधर मानी जाने वाली सारी पार्टियां तय कर लेतीं तो या तो सवर्ण आरक्षण विधेयक पेश ही न हो पाता, या उसका नैतिक पक्ष इतना कमजोर हो जाता कि सरकार खुद ही उसे किसी न किसी बहाने से टालने पर मजबूर हो जाती.

हैरानी की बात है कि इस विधेयक में तमाम कानूनी कमियां होने की आशंका के बावजूद, किसी ने इस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने का भी प्रस्ताव दम से नहीं किया. ऐसा लग रहा था कि जैसे अगर किसी ने सवर्ण आरक्षण विधेयक का विरोध कर दिया तो कहीं उसकी राजनीति ही न खत्म हो जाए.

सवर्णों की प्रेशर पॉलिटिक्स के मारे सपा-बसपा

इसका मूल कारण सवर्णों की प्रेशर पॉलिटिक्स रही है, जो इन दलों को ये समझाने में कामयाब रही है कि जब-जब उन्हें राजनीतिक सफलता मिली है, वह सवर्णों के वोट के कारण ही मिली है.

इसी प्रेशर पॉलिटिक्स के कारण सामाजिक न्याय के पक्षधर दलों की सरकारों में भी सवर्ण मलाई काटने में सफल रहते आए हैं और इसी के कारण इस समुदाय ने सवर्णों के आरक्षण विधेयक का समर्थन उन दलों से भी करा लिया जिनकी मूल पहचान ही ब्राह्मणवाद के विरोध से रही है.

विधेयक पारित कराने की गलती तो ये दल कर चुके हैं, लेकिन अब भी ये लगातार गलती कर रहे हैं. चाहें तो ये दल इस मुद्दे को संसद के बाहर राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर, सारे एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय को यह समझा सकते हैं कि भाजपा ने उनके हितों पर स्थायी डाका डाला है, और भविष्य में वह एससी-एसटी और ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण को ही खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण कर देगी जो कि संविधान की ही मूल भावना के विपरीत है.

आगे भी कोई उम्मीद नहीं

ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिख रही है कि ये दल अकेले या मिलकर किसी राष्ट्रव्यापी बंद का आयोजन करके, भाजपा को जाति की पिच पर खींचने का प्रयास करेंगे. भाजपा तो अपने प्रतिकूल मानी जाने वाली जाति की पिच पर आई, और सफलतापूर्वक पारी खेलकर निकलने की तैयारी में है.

सपा-बसपा जैसे दलों की वैचारिक शून्यता उन्हें इस मसले पर कोई भी कड़ा कदम उठाने से रोक रही है, लेकिन ये दल यह भूल रहे हैं कि अगर इस मामले पर उन्होंने भाजपा और कांग्रेस से अलग स्टैंड नहीं लिया तो उनका अस्तित्व ही खत्म हो सकता है.

(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं.)


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