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Thursday, 9 April, 2026
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अल्पसंख्यक फिर से UDF के साथ खड़े हैं: क्या इससे केरल में LDF की जीत का सिलसिला टूट जाएगा

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका 2005 में के. करुणाकरण और उनके गुट का पार्टी से अलग होना था. उनके कई पुराने कार्यकर्ता आगे चलकर BJP के सिपाही बन गए.

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केरल विधानसभा चुनावों में 2001 के बाद से कांग्रेस को कोई मजबूत जीत नहीं मिली है.

2011 में एक बहुत ही कम अंतर से जीत मिली थी, जो यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की राज्य में आखिरी जीत थी. लेकिन कांग्रेस, जो UDF का नेतृत्व कर रही थी, ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी CPI(M), जो लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) का नेतृत्व करती है, से सात सीटें कम जीती थीं. और इसमें उन दो स्वतंत्र उम्मीदवारों को भी नहीं जोड़ा गया है जिन्हें CPI(M) का समर्थन था और जो कुन्नामंगलम और थावनूर से जीते थे.

इसके बाद से केरल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की खराब हालत को लेकर कई तरह की थ्योरी दी गई हैं. जबकि UDF ने राज्य में लोकसभा चुनावों में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है.

तो फिर इस स्थिति की वजह क्या है.

यह कई कारणों का मिलाजुला असर है. और ऐसा नहीं लगता कि यह 2008 की सीटों की डिलिमिटेशन की वजह से हुआ है, जैसा कि ज्यादातर लोग मानते हैं.

के करुणाकरण का बाहर जाना

सबसे बड़ा झटका 2005 में के करुणाकरण और उनके गुट के बाहर जाने से लगा. 1964, 1969 और 1978 में कांग्रेस में हुए कई बंटवारे के दौरान इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) और के करुणाकरण हमेशा साथ रहे.

करुणाकरण INTUC के जरिए कांग्रेस में आए थे, और उनका गुट एक कैडर आधारित संगठन की तरह काम करता था. जबकि 1969 के बंटवारे के बाद उभरा ए के एंटनी गुट उस समय भी जनसंपर्क (PR) तरीकों के लिए जाना जाता था.

करुणाकरण संघ परिवार के कट्टर विरोधी थे, और उनका बाहर जाना उस समय हुआ जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) राष्ट्रीय राजनीति में उभर रही थी.

उन्होंने कभी भी BJP के साथ गठबंधन करने के बारे में नहीं सोचा, यहां तक कि जब 2006 में CPI(M) ने पहले उन्हें साथ लेने की कोशिश की और बाद में मना कर दिया. लेकिन उनके कई पुराने कार्यकर्ता बाद में BJP के समर्थक बन गए.

करुणाकरण को केरल में ऊंचे वर्गों और नायर समुदाय का नेता माना जाता था. उनके कांग्रेस छोड़ने से ये वर्ग राजनीतिक रूप से अनाथ हो गए. हालांकि उनकी मौत से पहले वह फिर से कांग्रेस में लौट आए, लेकिन उनके ज्यादातर समर्थक वापस नहीं आए.

चांडी-चेनिथला समीकरण

करुणाकरण और एंटनी के समय का गुटबाजी चुनाव के समय सुलझ जाती थी और दोनों गुट मिलकर काम करते थे, जिससे पार्टी की ताकत बढ़ जाती थी. लेकिन ओमन चांडी और रमेश चेनिथला के आने के बाद हालात अलग हो गए.

2004 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद चांडी ने ए के एंटनी की जगह मुख्यमंत्री पद संभाला, और 2005 में चेनिथला प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने. चेनिथला पहले करुणाकरण गुट में थे, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में जब करुणाकरण अपने बेटे के मुरलीधरन को आगे बढ़ाने लगे, तब उन्होंने के सी वेणुगोपाल और वी डी सतीशन जैसे नेताओं के साथ अलग रास्ता अपना लिया.

जब चेनिथला PCC अध्यक्ष बने, तब करुणाकरण के पुराने समर्थक और वायलार रवि के समर्थक उनके साथ आ गए, जिससे एक ढीला-ढाला गठबंधन बना. 2011 के बाद गुटबाजी और बढ़ गई, जहां चांडी और चेनिथला अपने-अपने गुटों में फायदे बांटते थे. व्यक्तिगत योग्यता को ज्यादा महत्व नहीं मिला.

2011 का चुनाव

2011 में UDF सरकार बना पाई, लेकिन इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), जिसने 20 सीटें जीती थीं, ने पांच मंत्री पद हासिल कर लिए. IUML के पास शिक्षा विभाग था, जिस पर नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) और श्री नारायण धर्म परिपालना (SNDP) योगम जैसे हिंदू संगठनों ने पक्षपात के आरोप लगाए.

उदाहरण के तौर पर, 2013 में मलप्पुरम के 33 निजी अनएडेड स्कूलों को एडेड स्कूल बनाने का आदेश दिया गया, जिसे बाद में अदालत ने रद्द कर दिया.

इससे पैदा हुई ध्रुवीकरण की स्थिति में NSS और एझावा समुदाय से जुड़े SNDP एक साथ आ गए, हालांकि ओमन चांडी ने NSS को फिर से अपने पक्ष में लाने की कोशिश की.

इसी माहौल में SNDP की नई राजनीतिक पहल और भारत धर्म जन सेना (BDJS) का गठन हुआ.

2014 में मोदी की जीत

2014 में नरेंद्र मोदी की जीत ने केरल में हिंदू ध्रुवीकरण को और बढ़ा दिया, और यही BDJS के बनने का बड़ा कारण बना. इससे कांग्रेस का एझावा वोट बैंक लगभग खत्म हो गया. जबकि वामपंथियों के पास अब भी कामगार वर्ग का एझावा समर्थन बना रहा.

मोदी की 2014 की जीत ने मुस्लिम समुदाय के वोटिंग पैटर्न को भी प्रभावित किया. उससे पहले केरल में ज्यादा राजनीतिक आधार पर वोटिंग होती थी, न कि सांप्रदायिक आधार पर. लेकिन इसके बाद उन सीटों पर, जहां BJP के जीतने की संभावना होती थी, वहां मुस्लिम वोट UDF या LDF में से जो मजबूत उम्मीदवार होता था, उसके पक्ष में एकजुट होने लगे.

2019 के लोकसभा चुनाव में 20 में से 19 सीट जीतकर कांग्रेस बहुत उत्साहित हो गई और उसे लगा कि यह सब सबरीमाला आंदोलन और राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने की वजह से हुआ. लेकिन असल में यह पूरे राज्य में अल्पसंख्यकों के एकजुट होकर वोट देने का नतीजा था, जबकि बाकी कारण सिर्फ सहायक थे.

2021 में मुस्लिम एकजुटता

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) लागू होने की संभावना के बीच, केरल के मुस्लिम समुदाय ने बड़े पैमाने पर पिनाराई विजयन का समर्थन किया. उन्हें कन्नूर के मजबूत नेता के रूप में देखा गया, जिनकी कोविड प्रबंधन की भी सराहना हुई.

अगर 2021 में कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे रमेश चेनिथला को लगा था कि केरल में सत्ता विरोधी लहर LDF की हार तय कर देगी, तो UDF का प्रदर्शन 2016 की हार से भी खराब रहा.

मुस्लिम वोटों के वामपंथियों के पक्ष में एकजुट होने के साथ-साथ, पिनाराई विजयन की सामाजिक इंजीनियरिंग, जो के करुणाकरण से प्रेरित थी, ने उनकी जीत सुनिश्चित की. चुनाव से पहले ईसाई-मुस्लिम ध्रुवीकरण ने आखिरी वार का काम किया.

BJP का बढ़ना

केरल में BJP के बढ़ने से माना जा रहा था कि इसका नुकसान कांग्रेस से ज्यादा वामपंथियों को होगा, क्योंकि राज्य में CPI(M) को ‘हिंदू पार्टी’ माना जाता है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ जैसा सोचा गया था.

BJP ने सबसे पहले कांग्रेस के एझावा और नायर वोट बैंक में सेंध लगाई, उसके बाद ही उसने CPI(M) को नुकसान पहुंचाया.

हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के पैटर्न से यह सामने आया कि BJP अब CPI(M) को भी नुकसान पहुंचाने लगी है, और उसके एझावा वोट बैंक को अपने साथ जोड़ रही है. चुनाव के बाद CPI(M) ने समीक्षा करते हुए पाया कि फिलिस्तीन मुद्दा और CAA को जोर-शोर से उठाने से उसे फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा है, और उसका हिंदू वोट बैंक भी कमजोर हो रहा है.

इसके बाद से CPI(M) अपनी रणनीति बदल रही है और स्थानीय निकाय चुनावों से पहले ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का सहारा ले रही है. इससे उसे लोकसभा चुनाव में BJP को गए कुछ वोट वापस मिले. लेकिन इस रणनीति से उसका मुस्लिम वोट बैंक दूर हो गया, जो अब UDF के साथ एकजुट हो गया.

2008 में सीटों का डिलिमिटेशन

कई राजनीतिक विश्लेषक केरल में कांग्रेस के कमजोर होने का कारण 2008 में हुए सीटों के सीमांकन को मानते हैं. यह सही है कि इससे कई सीटों का स्वरूप अचानक बदल गया.

लेकिन अगर जमीनी हकीकत देखें, तो कमजोरी कई कारणों का नतीजा है, जिसमें करुणाकरण का बाहर जाना, चांडी-चेनिथला दौर की गुटबाजी, पिनाराई विजयन की सामाजिक इंजीनियरिंग और BJP का बढ़ना शामिल है, जिससे मुस्लिम वोटिंग पैटर्न भी बदलता रहा है.

अब जब अल्पसंख्यक फिर से UDF के पीछे एकजुट हो रहे हैं, तो आने वाला चुनाव काफी दिलचस्प होगा.

आनंद कोचुकुडी केरल के रहने वाले पत्रकार और कॉलमनिस्ट हैं. वे @AnandKochukudy पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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