news on supreme court
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय | मनीषा मोंडल / दिप्रिंट
Text Size:
  • 31
    Shares

यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगभग दो महीने में सत्ता में वापस लौटते हैं तो उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय को एक धन्यवाद नोट भेजना चाहिए.

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में तीन सदस्यीय पैनल द्वारा मध्यस्थता का आदेश देकर यहां तक कि इसका कई पक्षकारों ने भी विरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ भाजपा और उसके सहयोगियों को राम मंदिर के निर्माण के मुद्दे पर हिंदू मतदाताओं की भावनाओं को भड़काने के लिए पूर्णाधिकार सौंप दिया है.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश कई मोर्चों पर समस्याग्रस्त है. हिंदू पक्ष के कुछ अधिक प्रभावशाली लिटीगेट उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में से एक हैं उन्हें लगता है कि मध्यस्थता किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगी.

हालांकि,अतीत में मध्यस्थता के प्रयास विफल रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं इस मामले में पार्टियों के बीच आम-सहमति की कमी की बात की है. ‘ दोनो पक्षों के बीच आमसहमति न होने के बावजूद हम इस विचार पर पहुंचे हैं कि मध्यस्थता द्वारा विवाद को निपटाने का प्रयास किया जाना चाहिए. चुनाव लड़ने वाले कुछ पक्षों द्वारा यह मुद्दा उठाया गया कि तत्काल विवाद को मध्यस्थता के लिए नहीं भेजा जाये. .. इस समय इस पर विचार की ज़रूरत नहीं आ रही जब हम इस बात पर विचार कर रहे है कि मामले में मध्यस्थता
होनी चाहिए या नहीं?

हालांकि मध्यस्थों पर खुद सवाल है- मुस्लिमों के प्रस्तावक को अयोध्या भूमि पर दावा करना छोड़ देना चाहिए जैसे श्री श्री रविशंकर को निष्पक्ष मध्यस्थ होना थोड़ा अस्पष्ट है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर कोई पक्ष इसे स्वीकार नहीं करता है तो मामले में मध्यस्थता के किसी भी आदेश को कौन प्राप्त करेगा? और मध्यस्थता की सीट फैज़ाबाद (अयोध्या) होगी, जहां विवादित भूमि है.

इसमें कोई संदेह नहीं है विवादित स्थल पर ‘भव्य राम मंदिर’ से कम कुछ भी नहीं चाहिए यही नारा आरएसएस/ भाजपा नेतृत्व द्वारा बेचा जाता रहा है और वे इसको स्वीकार नहीं करेंगे.

और, अगर सबूत की आवश्यकता होती है कि भविष्य में चीजें कैसे चलेंगी, तो यहां पर एक नमूना है. आरएसएस ने एक मध्यस्थता समिति के गठन का स्वागत करते हुए रविवार को स्पष्ट रूप से कहा कि स्थल पर केवल राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस मुद्दे पर अपने सार्वजनिक घोषणाओं की तरह एक मामूली तकनीकी को अदालत के आदेश की अनुमति देने वाला नहीं है. आखिरकार उनको चुनाव जीतना है.

कई दशकों से भाजपा अयोध्या में मंदिर के वादे पर हिंदुओं को वोट देने के लिए लालच देती रही है. सदियों पुरानी आहत हिंदू गौरव का पुनर्विचार, जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बाबरी मस्जिद बनाने के लिए हिंदू मंदिर को तोड़ दिया था. उम्मीद की जाती है कि भाजपा अब पीछे नहीं हटेगी और विशेषकर हिंदुओं को यह विश्वास दिलाने के लिए कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को प्राथमिकता पर हल नहीं कर रहा है.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जब उसने ‘उक्त कार्यवाही (मध्यस्थता) की किसी भी रिपोर्ट को प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कवरेज करने से रोक दिया है’, लेकिन उसने राजनेताओं को इस मामले में कुछ भी बोलने पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया है.

यहां तक की मीडिया मध्यस्थता में भी तथ्यात्मक घटनाक्रमों की रिपोर्ट अब नहीं कर सकता है. भाजपा नेताओं को इस मुद्दे का उपयोग करके वोट मांगने से कोई रोक नहीं सकता है कि राम के जन्मस्थान पर हिंदुओं को मंदिर बनाने से कैसे रोका गया है.

यदि यह बहुसंख्यक समुदाय के साथ न्याय करने में अपनी विफलता को दर्शाता है. क्या उन्हें रोकने के लिए कोई है? हालांकि, मध्यस्थता के माध्यम से विवाद के समाधान को सुनिश्चित करने की कोशिश में उनका इरादा निश्चित रूप से संदिग्ध नहीं है. संविधान पीठ के पांच न्यायाधीशों – मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नाज़िर को खुद से पूछना चाहिए कि क्या भाजपा को वोट हासिल करने के लिए भावनाओं से खेलने के अधिक अवसर देने के अलावा कुछ भी हल हो पायेगा?

राफेल सौदे मामले में ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका निभाने के अपने असफल प्रयास से के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने सबक नहीं सीखा है.

अदालत, विशेष रूप से संवैधानिक अदालत का काम सार्वजनिक हित और विवादों के मामलों को तय करना है.

राजनीतिज्ञों को वोटों के लिए अपने आदेशों का इस्तेमाल करने का अवसर प्रदान करने के लिए सख्ती करनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट का मध्यस्थता आदेश सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) 1908 की धारा 89 पर आधारित था. सीपीसी अन्य कानूनों की तरह अधिकांश औपनिवेशिक अतीत की विरासत है, धारा 89 इसमें सम्मिलित नयी धारा है.

यह अदालत को उप-न्यायिक विवादों को, विभिन्न वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों को, समय-उपभोग, महंगे मुकदमेबाजी से बचने के लिए मध्यस्थता सहित विभिन्न मुद्दों को संदर्भित करने का अधिकार देता है.

लेकिन अयोध्या की अपील 2010 से उच्चतम न्यायालय में लंबित हैं. इसने नौ चीफ जस्टिसों और दर्जनों अन्य न्यायाधीशों को देखा है. क्या इसमें पहले से ही पर्याप्त समय नहीं लग गया है?

एफकॉन्स इंफ़्रा लिमिटेड बनाम और अन्य बनाम चेरियन वर्के कंस्ट्रक्शन के अपने जुलाई 2010 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला दिया कि क्या धारा 89 के तहत एक अदालत को सशक्त करता है कि बिना पार्टियों कि सहमति के पक्षकारों को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने का अधिकार है.

जस्टिस आरवी रवींद्रन की पीठ और जेएम पंचाल ने कहा कि न्यायालय धारा 89 के तहत शक्ति का प्रयोग करता है. ‘जब तक कि सभी पक्ष इस तरह के संदर्भ के लिए सहमत नहीं होते हैं तब तक मध्यस्थता के लिए एक सूट का उल्लेख नहीं किया जा सकता है’.

हालांकि मध्यस्थता और पंचनिर्णय के बीच अंतर दोनों ही सीपीसी की धारा 89 के तहत आते हैं और इसके नियम भी समान होते हैं.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट से जो चूक हुई है कि उसने हिंदू समूहों को एक और मौका दिया है. जिसने आगामी चुनावों में पीड़ित कार्ड खेलने के लिए मध्यस्थता का विरोध किया था.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


  • 31
    Shares
Share Your Views

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here