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Wednesday, 21 January, 2026
होममत-विमतमौनी अमावस्या और पीएम मोदी—भारत की सोची-समझी चुप्पी के क्या मायने हैं

मौनी अमावस्या और पीएम मोदी—भारत की सोची-समझी चुप्पी के क्या मायने हैं

वैश्विक शोर-शराबे के माहौल में भारत का प्रतीकात्मक ‘मौनव्रत’ कूटनीति का सबसे प्रभावी साधन है. यह नई दिल्ली की रणनीतिक अस्पष्टता को बनाए रखता है.

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चाणक्य प्राचीन भारत के बहुत बड़े और समझदार दार्शनिक थे. उनकी बातें आज भी सही लगती हैं. वे बताते हैं कि हर हालात में बोलकर जवाब देना ज़रूरी नहीं होता. कई बार मौन रहना ही सबसे मजबूत जवाब होता है.

उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्.
मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥ (3.11, चाणक्यनीति)

(मेहनत करने से गरीबी नहीं रहती, जप करने से पाप नहीं रहता.
चुप रहने से झगड़ा नहीं होता और सतर्क रहने से डर नहीं रहता.)

जब हम मौनी अमावस्या मना रहे हैं, तो मुझे चुप्पी की ताकत और ज्यादा महसूस होती है. कई बार चुप्पी शब्दों से भी ज्यादा असरदार होती है.

लोग मुझे एक मिलनसार और ज्यादा बोलने वाली इंसान मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं चुप रहने की सोच को बहुत मानती हूं. फिर भी मेरी ज़िंदगी और करियर ऐसे रहे हैं, जहां चुप रहना मुश्किल था. बतौर वकील मेरी कमाई बोलने की ताकत पर ही टिकी थी. बतौर पैरेंट्स भी मैं अपने बच्चों को समझाने में खूब बोलती रही. बीजेपी के प्रवक्ता के रूप में मैंने विपक्ष की बातों का खुलकर जवाब दिया और कभी चुप नहीं रही. राजनेता और सांसद बनने के बाद भी मैं चुप्पी से दूर ही रही. आज भी मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतना शोर रहता है कि मैं एक मंच से दूसरे मंच पर जाती रहती हूं, लेकिन इन सबके बीच, मैं चुप रहने की प्रैक्टिस भी करती हूं.

अक्सर लोग कहते हैं कि कोई वकील सिर्फ एक-दो मिनट बोलकर इतनी ज्यादा फीस कैसे ले लेते हैं. ऐसे लोगों को मेरा जवाब यह है कि वकील को सिर्फ अदालत में बोलने के लिए नहीं, बल्कि उन लंबे घंटों के लिए पैसे मिलते हैं, जो वह शांति से पढ़ने, सोचने, सुनने, लिखने और मामले को पूरी तरह समझने में लगाते हैं, ताकि सही दलील दे सके.

मैं भी मौन की शक्ति में इसलिए विश्वास रखती हूं और इसलिए ही मौनी अमावस्या पर मैंने मौन रखा.

पश्चिमी दर्शन

1833 में आई अपनी किताब Sartor Resartus में थॉमस कार्लाइल ने एक जर्मन कहावत को अमर बना दिया: Sprechen ist Silber, Schweigen ist Gold (बोलना चांदी है, चुप रहना सोना है).

कार्लाइल ने आगे लिखा, “चुप्पी वह माहौल है जिसमें बड़ी चीज़ें धीरे-धीरे आकार लेती हैं, ताकि अंत में वे पूरी तरह बनी हुई, गरिमा के साथ, जीवन की रोशनी में सामने आ सकें.”

यह सोच इस विचार पर टिकी है कि संयम एक गुण है और गहरी सोच अक्सर बिना शब्दों के होती है. इसका मतलब है ज्यादा सुनना और गहराई से समझना और बेवजह ज्यादा बोलने की गलती से बचना. बचपन में हम भी साइमन और गारफंकेल का मशहूर गीत ‘द साउंड ऑफ साइलेंस’ सुनकर बड़े हुए, जो उस समय हर चार्ट पर छाया हुआ था.

गीता

भगवद गीता के श्लोक 16.17 में श्रीकृष्ण मौन की ताकत बताते हैं. वे कहते हैं कि इंसान को मौन और आत्म-संयम के ज़रिए मन की शक्ति पर काबू पाकर खुद को ऊपर उठाना चाहिए और मन को विनाश का हथियार नहीं बनने देना चाहिए:

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।। (16.17, भगवद गीता)

(मन की शांति, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावना की पवित्रता—इन सबको मन का तप कहा गया है.)

मन को एक बगीचे की तरह समझा जा सकता है, जिसे एक माली खास देखभाल से, मौन, संयम और तप के ज़रिए सींचता और संवारता है.

भारतीय विदेश नीति में मौन

इस समय दुनिया बहुत उथल-पुथल के दौर से गुज़र रही है. मध्य पूर्व जल रहा है. ईरान में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, अफगानिस्तान पाकिस्तान से टकराव में है और इज़रायल अब भी हमास से लड़ रहा है. रूस-यूक्रेन संघर्ष अपने चौथे साल की ओर बढ़ रहा है.

अपने आसपास देखें तो हाल के समय में पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में सिर्फ युवाओं के आंदोलन ही नहीं हुए, बल्कि अव्यवस्थित सत्ता परिवर्तन भी देखने को मिले हैं. चीन ताइवान पर तलवार लटकाए हुए है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तीखी बयानबाज़ी और वेनेजुएला में की गई कार्रवाइयों ने टकराव को सीधे दक्षिण अमेरिका तक पहुंचा दिया है और अब, ग्रीनलैंड पर हमले की आशंका ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. क्या यह सब तीसरे विश्व युद्ध की ओर ले जाएगा, या इंसानियत बातचीत, संवाद और कूटनीति के ज़रिए अपने मसलों को सुलझा पाएगी?

दुनिया के इस शोर-शराबे के माहौल में, भारत का प्रतीकात्मक मौनव्रत कूटनीति का सबसे असरदार हथियार है. यह भारत की रणनीतिक अस्पष्टता को बनाए रखता है, ऐसे वक्त में जब वैश्विक व्यवस्था अभी स्थिर नहीं है और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय शांति के हालात बदल रहे हैं. भारत का मौन उसके धर्म और संयम की सदियों पुरानी सोच को दिखाता है क्योंकि हम उन हालात को बढ़ाने से बचते हैं जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं. इसका एक उदाहरण यह है कि ट्रंप द्वारा अलग-अलग बहानों से लगाए गए कई टैरिफ—रूसी तेल के आयात, ईरान से संबंध, या चीन के खिलाफ भारत को निशाना बनाने, के बावजूद भारत ने संयम बनाए रखा है.

आलोचकों के सामने पीएम मोदी का मौन

पीएम मोदी अपने राजनीतिक आलोचकों के आरोपों के बावजूद शांत रहे हैं. आलोचक कहते हैं कि वे विवादित मुद्दों पर चुप रहते हैं. सोनिया गांधी ने फिलिस्तीन पर उनके मौन को “मानवता और नैतिकता से पीछे हटना” बताया है. कांग्रेस ने उन पर भारत-पाकिस्तान संघर्ष में अमेरिकी दखल के मुद्दे से बचने का आरोप लगाया है. युवाओं में बेरोज़गारी, किसानों के आंदोलन और मणिपुर हिंसा पर पीएम मोदी के बयान न देने को लेकर टीवी चैनलों पर शोर मचा, राजनीतिक बहस हुई और संसद के प्रतिष्ठित सदनों में वॉकआउट तक हुए. ‘वोट चोरी’ और ईवीएम से छेड़छाड़ के गंभीर आरोपों, साथ ही चुनाव आयोग के ज़रूरी SIR प्रैक्टिस के बावजूद भी उन्होंने संयम बनाए रखा. इस पूरे संदर्भ में, शब्दों से ज़्यादा काम और फैसले बोलते दिखे. सबसे अहम बात यह रही कि ये समय पर किए गए कदम थे, जिनके बाद कार्यपालिका, विधायिका और अदालतों की ओर से बयान आए, क्योंकि मामला उनके सामने था.

ताज़ा आरोप यह था कि अमेरिका-भारत व्यापार समझौता इसलिए लटका क्योंकि “पीएम मोदी ने ट्रंप को फोन नहीं किया”, लेकिन क्या हर विवादित मुद्दे पर तुरंत टिप्पणी न करना टालना है, या समकालीन राजनीति में चाणक्यनीति को सोच-समझकर अपनाने की कोशिश?

अर्थशास्त्र कहता है कि वाणी पर संयम कमजोरी नहीं, बल्कि चतुर राजकौशल का उदाहरण है—एक बार निकले शब्द तीर की तरह होते हैं, जो तरकश में वापस नहीं आते. पीएम मोदी ने ज़्यादातर सीधे दिखावटी आश्वासन देने के बजाय संस्थागत जवाब चुने हैं, ताकि मंत्रालय, संवैधानिक संस्थाएं और राज्य सरकारें खुद बोलें. यह प्रभावी शासन है, दिखावे के लिए गढ़ा गया नहीं. तुरंत फ़ैसले और लगातार नाराज़गी के इस दौर में, संकट के समय पीएम मोदी का स्थिर और निष्पक्ष रहना शुद्ध चाणक्य-आधारित राजनीति है.

भारत कई चुनौतियों का सामना कर रहा है और उसे आर्थिक, ऊर्जा, साइबर और डेटा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चुपचाप लेकिन मज़बूती से काम करना है. ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्व भारत से समाधान की उम्मीद कर रहा है. इसलिए, किस्मत ने जो भूमिका हमें दी है उसे निभाते हुए, बेहतर यही है कि सद्भाव बनाए रखें और धैर्य के साथ शांतिपूर्वक काम करते रहें.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका X हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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