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Friday, 19 July, 2024
होममत-विमतमनमोहन सिंह ने मुझे बताया था कि 1991 में 'सत्ता से अलगाव' और 'सुधार के प्रति लगाव' उनका प्रमुख हथियार था

मनमोहन सिंह ने मुझे बताया था कि 1991 में ‘सत्ता से अलगाव’ और ‘सुधार के प्रति लगाव’ उनका प्रमुख हथियार था

भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक सुधार मुख्य रूप से सरकार द्वारा नियंत्रण छोड़ने पर निर्भर करता है. मोदी सरकार को नियंत्रण पसंद है.

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1991 में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा लागू किये गए भारत के ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण कार्यक्रम के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है तथा इस पर काफी चर्चा और बहस भी की गई है.

भारत की अर्थव्यवस्था पर 1991 के उदारीकरण कार्यक्रम का गहरा प्रभाव काफी अच्छी तरह से परिमाणित और डॉक्युमेंटेड है- सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के रूप में भारत का विदेशी व्यापार तकरीबन तीन गुना बढ़ा है, विदेशी मुद्रा भंडार भी 100 गुना बढ़ा है, प्रति व्यक्ति आय वास्तविक रूप में छह गुना बढ़ी है, गरीबी की दर आधी रह गई है, जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) में 11 साल की बढ़ोतरी हुई है, शहरीकरण 10 प्रतिशत से भी जयादा दर से बढ़ा है, और भी काफी कुछ.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आर्थिक सुधारों के लंबे हाथों ने लगभग हर एक भारतीय को छुआ और उनमे से अधिकांश के जीवन स्तर में नाटकीय रूप से सुधार आया. बेशक, आलोचक यह तर्क दे सकते है कि अन्य एशियाई देश जैसे चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम या यहां तक ​​कि श्रीलंका भी इसी अवधि में ‘बिग बैंग’ आर्थिक सुधारों के बिना भी काफी तेजी से आगे बढ़े हैं.

क्या आर्थिक उदारीकरण के उपायों के बिना भारत के आर्थिक प्रदर्शन में उतनी तेजी से सुधार नहीं हुआ होता? यह सैद्धांतिक रूप से विरोधाभासी तथ्यों पर आधारित है जिस पर बहस करना व्यर्थ होगा.

हालांकि कोई भी किये गये प्रयासों और संख्याओं के बारे में संदेह प्रकट कर सकता है, मगर यह तथ्य संशय के परे है कि 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की आर्थिक नीति की दिशा को अमूल-चूल रूप से बदल दिया और एक नया रास्ता तैयार किया जिसपर यह पिछले तीन दशकों से निर्बाध चल रहा है.

अब, टिप्पणीकरों के एक वर्ग द्वारा 1991 के आर्थिक सुधारों की पुनरावृति के लिए आवाज उठाई जा रही है जो पोस्ट-कोविड आर्थिक सुधार में भारत के लिए मददगार साबित हो सकती है.

पर क्या नरेंद्र मोदी सरकार में 1991 को दोहराने की क्षमता है? फिर से 1991 जैसे सुधारों के बारे में ऐसी चर्चा जो सिर्फ नीतिगत सुधारों के तकनीकी विवरण पर केंद्रित हो काफी नादानी भरी और छिछली है. 1991 के अनुभव से सीखे जाने वाले सबसे बड़े सबक इस बारे में हैं कि इन्हें ‘कैसे’ किया गया न कि केवल इस बात में ‘क्या’ किया गया. वह संदर्भ, परिस्थितियां और वे व्यक्तित्व जिन्होंने 1991 को संभव बनाया, मुद्रा के अवमूल्यन या लाइसेंसिंग को खत्म करने जैसे उस समय किये गए उपायों के तकनीकी विवरण से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.


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सत्ता से ऊपर है सुधार

मैं इस मामले में भाग्यशाली रहा हूं कि 1991 की आर्थिक उदारीकरण प्रक्रिया के दो मुख्य अगुवा नायकों और इसके असल वास्तुकारों- तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और तत्कालीन वाणिज्य मंत्री पी. चिदंबरम से प्रत्यक्ष रूप से स्वयं कई कहानियां सुन चुका हूं.

यह सर्वविदित तथ्य है कि उस वक्त भारत में एक गंभीर विदेशी मुद्रा संकट था और वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की पृष्ठभूमि, उनके अनुभव और विश्वसनीयता ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को कर्ज देकर भारत को भुगतान संतुलन के संकट से उबारने के लिए राजी करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी और बाकी तो, जैसा सब कहते हैं, इतिहास ही है.

डॉ. सिंह ने मुझे बताया था कि कैसे उनका ‘सत्ता से अलगाव’ और ‘सुधार के प्रति लगाव’ इन सुधारों को क्रियान्वित करने में उनका सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ. उनका सामना अपनी ही कांग्रेस पार्टी के उन प्रतिकूल रुख वाले सांसदों से हुआ जिन्होंने उनके सुधारों का पुरजोर विरोध किया. जवाब में, उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के इस्तीफा देने की पेशकश कर दी क्योंकि आर्थिक सुधारों की शुरुआत करना उनके लिए केवल वित्त मंत्री बने रहने की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण था. यह महसूस करते हुए कि एक गंभीर आर्थिक संकट के दौरान एक सम्मानित वित्त मंत्री का इस्तीफा पार्टी, और उससे भी कहीं अधिक राष्ट्र के लिए हानिकारक साबित होगा, कांग्रेस पार्टी के सांसदों ने अनिच्छा से ही सही पर सुधारों के लिए अपनी सहमति व्यक्त कर दी.

इस सब का निष्कर्ष यह है कि राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सुधार के प्रति एक दृढ़, वैचारिक प्रतिबद्धता शायद कठिन सुधारों के लिए आवश्यक सबसे महत्वपूर्ण घटक है. अपनी परिभाषा के अनुसार, सुधार विघटनवादी, यथास्थितिवाद के लिए खतरा और राजनीतिक रूप से बहुत जोखिम भरा कदम होता है. ‘बिग बैंग’ सुधारों के लिए सत्ता से अलगाव एक आवश्यक पूर्व शर्त है. लेकिन इस बात के भरपूर प्रमाण उपलब्ध हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पूरे मंत्रिमंडल के लिए किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है. पेगासस केवल इस तथ्य की पुष्टि करता है कि सत्ता का लोभ क्या करवा सकती है.


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सुधार का अर्थ नियंत्रण कम करने के बारे में है

एक और दिलचस्प कहानी जो एक बार पी. चिदंबरम ने मेरे साथ साझा की थी वह शायद आर्थिक उदारीकरण के वास्तविक अर्थ का एक बड़ा प्रतीकात्मक उदहारण है.

1991 के चुनाव से एक महीने पहले दिल्ली से चेन्नई जाने वाली फ्लाइट में चिदंबरम एक आईएएस अधिकारी से मिले और उनसे बात करने लगे. आईएएस अधिकारी ने उनसे कहा के वे ‘चीफ कंट्रोलर ऑफ इम्पोर्ट्स एंड एक्सपोर्ट्स’ हैं. चिदंबरम ने उनसे मजाक-मजाक में पूछा, ‘मैं समझ सकता हूं कि आप विदेशी मुद्रा कोष की रक्षा के लिए आयात के नियंत्रक (कंट्रोलर) हैं लेकिन आप निर्यात के भी कंट्रोलर क्यों हैं?’ इस बात पर अधिकारी के पास कोई जवाब नहीं था. यह उनकी गलती नहीं थी कि उनके पद का नाम इस तरह रखा गया था.

तीन महीने बाद, नए वाणिज्य मंत्री के रूप में चिदंबरम ने भारत की विदेश व्यापार नीति को उदार बना दिया. ‘चीफ कंट्रोलर ऑफ इम्पोर्ट्स एंड एक्सपोर्ट्स’ के पद को समाप्त करने के साथ-साथ उन्होंने उस विस्तृत नियमों वाली ‘रेड बुक’ को भी खत्म कर डाला, जो यह निर्धारित करता था कि किस वस्तु और किस मूल्य का निर्यात या आयात किया जा सकता है. जिस आईएएस अधिकारी को चिदंबरम ने फ्लाइट में ताना मारा था उन्हें विदेश व्यापार महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड) के रूप में फिर से नियुक्त किया गया!

यहां एक महत्वपूर्ण सबक चीजों को ‘जाने देने’ (उन पर से नियंत्रण हटाने) के लिए एक सहज मानसिकता उत्पन्न करने की आवश्यकता से संबंधित है. भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक सुधार मुख्य रूप से सरकार द्वारा नियंत्रण काम करने और निजी क्षेत्र की उद्यमिता को विमुक्त करने से सबंधित होता है. नियंत्रण छोड़ने की प्रक्रिया अलग-अलग क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है. यह कई चरणों में और समय के साथ धीरे-धीरे भी लायी जाती है लेकिन सुधार का सार ‘जाने दो’ के सिद्धांत में है. यह विचार कि नियंत्रण कोई खूबी नहीं बल्कि एक बाधा है, आंतरिक रूप से आना चाहिए.


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‘1991 की फिर से पुनरावृति’

इस बात के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं कि मोदी शायद इसके ठीक विपरीत व्यक्तित्व वाले हैं- उन्हें नियंत्रण और कन्सालिडेशन से प्यार है. हुक्म चलाना, आदेश देना और आज्ञापालन करवाने की शक्ति अपने पूरे राजनीतिक जीवन के दौरान मोदी की राजनीति का आधार रही है. मोदी से उनकी इस स्वाभाविक प्रवृत्ति को अचानक छोड़ देने की उम्मीद करना मूर्खता होगी.

वास्तव में, जब मोदी ने साल 2014 के चुनाव अभियान में ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस- न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन ‘- का नारा दिया था और ‘अंग्रेजी अभिजात वर्ग’ के गालों पर खुशी के आंसू बहने लगे थे, तब बहुत कम लोगों ने कुछ कठोर तथ्यों पर ध्यान देने की जहमत उठाई थी.

उनके मुख्यमत्री रहने के दौरान गुजरात की अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण साल 2005 में 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 14 प्रतिशत हो गया (सकल घरेलू उत्पाद में राज्य पीएसयू का हिस्सा, सीएजी रिपोर्ट). मुख्यमंत्री के रूप में मोदी के कार्यकाल के दौरान गुजरात सरकार द्वारा नियंत्रित उद्यमों की संख्या कम होने की बजाये- 56 से 72 हो गई, और राज्य के पीएसयू का कारोबार 20 गुना बढ़ गया. 2014 का ‘मिनिमम गवर्नमेंट ‘ का नारा एक ऐसा नारा था जिसे बराक ओबामा- ‘लिपस्टिक ओन ए पिग ‘ कहते थे.

सत्ता से अलगाव, सुधारों के प्रति एक वैचारिक प्रतिबद्धता और देश के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा नियंत्रण छोड़ने के सिद्धांत में विश्वास शायद 1991 की पुनरावृत्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण पूर्व शर्ते हैं. भारतीय राजनीति के एकदम से अनौपचारिक अथवा दूरस्थ पर्यवेक्षक के सामने भी यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सत्ता और चरम नियंत्रण के प्रति लालसा प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है. मोदी से सच्चे आर्थिक उदारीकरण की उम्मीद करना पत्थर से पानी निचोड़ने के समान है.

(लेखक एक राजनीतिक अर्थशास्त्री और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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