भारत के राष्ट्रपति का अपमान करना किसी मुख्यमंत्री के लिए कितना गलत है? इसका जवाब साफ है: यह शर्मनाक है—यह सिर्फ किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि राष्ट्रपति के पद और पूरे गणतंत्र का अपमान है.
तो क्या हम सबको पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की निंदा करनी चाहिए? खैर, केंद्र सरकार को ऐसा ही लगता है. जैसे ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शिकायत की कि ममता ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, वैसे ही प्रधानमंत्री ने इसकी निंदा कर दी.
इसके बाद एक-एक करके कई मंत्री, पूर्व मंत्री और मंत्री बनने की इच्छा रखने वाले लोग सोशल मीडिया पर आकर अपनी-अपनी निंदा जताने लगे.
यहां तक कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी दुनिया भर के संकटों से समय निकालकर एक पोस्ट किया, जो लगभग बाकी सबके एक्स पोस्ट जैसा ही था.
और सच में, हम सभी को अपने राष्ट्रपति के प्रति किसी भी तरह के अपमान की निंदा करनी चाहिए—खासकर उस आदिवासी महिला के प्रति जो देश के सबसे ऊंचे पद तक पहुंची हैं, लेकिन यह घटना कई सवाल भी उठाती है, जिनमें कुछ असहज करने वाले हैं.
पहली बार नहीं
लेकिन राष्ट्रपति और किसी राजनेता के बीच टकराव का विचार नया नहीं है. इतिहास में कई उदाहरण हैं.
राजेंद्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू के बीच मतभेद हुए थे (हालांकि, शायद वह टकराव के स्तर तक नहीं पहुंचे थे, क्योंकि दोनों का कद बहुत बड़ा था).
इसके अलावा 1978-79 में नीलम संजीवा रेड्डी और मोरारजी देसाई के बीच भी विवाद हुआ था, जबकि रेड्डी को राष्ट्रपति पद के लिए देसाई की ही सरकार ने नामित किया था.
मामला ऐसा था जो सीधे राष्ट्रपति से जुड़ा था. रेड्डी इस बात से नाराज थे कि मोरारजी सरकार कुछ कारोबारियों को राष्ट्रपति भवन के राजकीय भोज में बुला रही थी. उन्होंने शिकायत की कि हिंदुजा परिवार को भी मेहमानों की सूची में रखा गया है.
रेड्डी की असली आपत्ति यह थी कि हिंदुजा परिवार मोरारजी देसाई के बेटे कांति देसाई के काफी करीब माना जाता था. मोरारजी देसाई ने इस इशारे को समझ लिया और साफ कर दिया कि वह इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटेंगे. हमें यह सब इसलिए पता है क्योंकि मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री कार्यालय की कुछ फाइलें अपने साथ ले गए थे और कई साल बाद उन्हें एक पत्रकार को दे दिया, जो उस दौर पर किताब लिख रहा था. उन फाइलों में ये चिट्ठियां भी थीं.
लेकिन जब यह सब हुआ था, तब लगभग किसी को इस टकराव के बारे में पता नहीं था.
हाल के उदाहरण
कुछ समय पहले जैल सिंह और राजीव गांधी के बीच भी तनाव था.
उन्होंने अपने मतभेदों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके सहयोगियों ने पत्रकारों को जानकारी दी. असल में राजीव गांधी को जैल सिंह पसंद नहीं थे. उनका मानना था कि पंजाब में उग्रवाद बढ़ने के लिए सिंह जिम्मेदार थे और वह पंजाब के मामलों में दखल देना चाहते थे.
राजीव गांधी को ऐसा सोचने का पूरा अधिकार था, लेकिन इसके बाद उन्होंने जैल सिंह को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया और उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जो राष्ट्रपति पद को मिलना चाहिए.
जैल सिंह नाराज़ थे, लेकिन जब विपक्ष ने उन्हें प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने और मुद्दे को राजनीतिक बनाने के लिए मनाने की कोशिश की, तो उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया.
जो लोग किसी संवैधानिक संकट की उम्मीद कर रहे थे, वे निराश रह गए.
क्या यह घटना वैसी ही है?
नहीं, इसके कई कारण हैं.
पहला, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस मामले को जिस तरह सार्वजनिक किया है, वैसा इतिहास में शायद ही किसी राष्ट्रपति ने किया हो.
आमतौर पर ऐसे विवाद सार्वजनिक नहीं होते. अधिकारियों या अनौपचारिक मध्यस्थों के जरिए चुपचाप हल निकाल लिया जाता है, लेकिन राष्ट्रपति मुर्मू ने इस बारे में भाषण दिया. यह अभूतपूर्व है.
दूसरा, उन्होंने इस मुद्दे को व्यक्तिगत बना दिया, जब उन्होंने कहा, “ममता मेरी छोटी बहन जैसी है. मुझे नहीं पता वे मुझसे क्यों नाराज़ हैं.”
अगर आप भारत की राष्ट्रपति हैं और “छोटी बहन” से नाराज़ हैं, तो बेहतर यही है कि आप उन्हें फोन कर लें, सार्वजनिक रूप से बात न करें. अब तक यही परंपरा रही है.
तीसरा, राष्ट्रपति का अपमान निश्चित रूप से गलत है, लेकिन यह भी साफ नहीं है कि जिस घटना से यह विवाद पैदा हुआ, वह इतनी बड़ी राष्ट्रीय समस्या थी कि परंपराओं को तोड़ दिया जाए.
राष्ट्रपति इसलिए नाराज़ थीं क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार ने उस संस्था से, जिसने उन्हें कार्यक्रम में बुलाया था, कार्यक्रम का स्थान बदलने को कहा. ममता बनर्जी उनके साथ कार्यक्रम में नहीं गईं. और…बाथरूम में पानी भी नहीं था.
ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति की हर बात का अपना जवाब दिया है. मुख्यमंत्री के समर्थकों ने यह भी कहा है कि राष्ट्रपति को चुनावी राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
उनका कहना है कि राष्ट्रपति का खुद को “बंगाल की बेटी” कहना और प्रधानमंत्री का उनके आदिवासी पृष्ठभूमि का ज़िक्र करना—इन सबका उद्देश्य यह दिखाना है कि ममता बनर्जी ने एक महत्वपूर्ण आदिवासी नेता का अपमान किया और इस तरह सभी आदिवासियों का अपमान किया है. ममता के समर्थकों का कहना है कि इसी कारण कई मंत्रियों को इस घटना पर पोस्ट करने के लिए कहा गया.
मेरा मानना है कि हमें राष्ट्रपति के पद की गरिमा के लिए इन सभी आरोपों को खारिज करना चाहिए. हमें गणतंत्र के सबसे ऊंचे पद की गरिमा की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए.
लोकतंत्र को तब नुकसान होता है जब लोगों को लगने लगता है कि संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है. मुख्य चुनाव आयुक्त के पद की छवि पहले ही विवादों से प्रभावित हो चुकी है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी कई लोग पक्षपाती मानते हैं.
कई राज्यपाल ऐसे दिखे हैं जैसे वे केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक काम कर रहे हों (यह प्रक्रिया इंदिरा गांधी के समय से शुरू हुई थी) और उपराष्ट्रपति का पद भी उस समय विवाद में आ गया जब जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया.
ऐसे माहौल में यह ज़रूरी है कि भारत के राष्ट्रपति को राजनीति से ऊपर माना जाए.
लेकिन ऐसा तभी संभव है जब राष्ट्रपति पुरानी परंपराओं का पालन करें. अगर उन्हें लगता है कि ममता बनर्जी ने उनका अपमान किया है, तो ऐसे मामलों को संभालने के लिए पहले से तय प्रोटोकॉल मौजूद है. अपनी परेशानी को सार्वजनिक करना राष्ट्रपति पद की संस्था की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका नहीं है.
इसके अलावा, अगर आप चुनाव से पहले किसी विपक्षी दल की सरकार वाले राज्य में जा रहे हैं, तो बेहतर है कि मुख्यमंत्री के साथ अपने मतभेद को व्यक्तिगत बनाकर सार्वजनिक न करें क्योंकि इसका राजनीतिक इस्तेमाल हो सकता है.
एक और समस्या यह है कि अगर राष्ट्रपति अन्याय के खिलाफ खुलकर बोलने वाले राष्ट्रपति बन जाते हैं, तो शुरुआत में लोग उनसे सहानुभूति ज़रूर रखते हैं (जैसा इस बार हुआ), लेकिन बाद में लोग पूछेंगे कि वे दूसरे अन्यायों के बारे में क्यों नहीं बोलते, जैसे मणिपुर में आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाला व्यवहार.
मुझे अपने राष्ट्रपति के प्रति बहुत सम्मान है. संभव है कि उन्होंने भावनाओं में प्रतिक्रिया दे दी हो और उन्हें यह अंदाज़ा भी न रहा हो कि उनकी नाराज़गी बंगाल की चुनावी राजनीति का हिस्सा बन जाएगी.
लेकिन दुर्भाग्य से जब आप राष्ट्रपति होते हैं, तो आपको ऐसे मामलों में तुरंत और खुलकर प्रतिक्रिया देने से बचना पड़ता है.
राजनेताओं से संवाद करने के लिए जो तय परंपराएं हैं, उनका पालन करना राष्ट्रपति के लिए बेहतर हो सकता है और अगर वह अपने विवेक का इस्तेमाल कर इस तरह के विवादों से बचें, तो जिस संस्था का वह प्रतिनिधित्व करती हैं, उसे भी इससे बहुत फायदा होगा.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: केजरीवाल को भूल जाइए, ज़रा सोचिए कि हमारी संस्थाएं किस दिशा में जा रही हैं और क्या मजबूत कर रही हैं
