Saturday, 2 July, 2022
होममत-विमत'लिंचिंग’ की घटनाओं पर पाना है काबू तो इन्हें सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने से बचने की जरूरत

‘लिंचिंग’ की घटनाओं पर पाना है काबू तो इन्हें सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने से बचने की जरूरत

ऐसी स्थिति में हमें ध्यान रखना होगा कि लिंचिंग जैसे अपराध का संबंध किसी धर्म, जाति या समुदाय से नहीं है और इन घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए इन्हें सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने से बचने की जरूरत है

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नई दिल्ली: किसान आंदोलन के दौरान सिंधु बार्डर पर ‘बेअदबी’ के आरोप में एक व्यक्ति की हत्या, पंजाब की दो घटनाओं और झारखंड की एक घटना के बाद लिंचिंग शब्द फिर से चर्चा में है.

इन घटनाओं और पाकिस्तान के सियालकोट में श्रीलंकाई नागरिक को जिंदा जलाने की घटना में कोई विशेष अंतर नजर नहीं आता है. इन सभी घटनाओं में कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए निदोर्ष व्यक्तियों की जान ले ली गयी, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है.

ऐसी स्थिति में हमें ध्यान रखना होगा कि लिंचिंग जैसे अपराध का संबंध किसी धर्म, जाति या समुदाय से नहीं है और इन घटनाओं को बार-बार होने से रोकने के लिए इन्हें सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने से बचने की जरूरत है.

यह एक संयोग ही है कि इधर झारखंड में ‘लिंचिंग’ की घटना को जघन्य अपराध घोषित करने संबंधी विधेयक विधान सभा से पारित करती है और इसके चंद दिन के भीतर ही पेड़ों को काटने के शक में एक व्यक्ति को पिटाई के बाद जिंदा जला दिया जाता है.


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देशभर में हुई लिंचिंग की तमाम घटनाएं

इससे पहले, 2021 के अंत में पंजाब के अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी और कपूरथला में निशान साहिब की बेअदबी के आरोप में दो व्यक्तियों की पीट पीट कर हत्या कर दी गयी थी. कपूरथला की घटना के बारे में बाद में पुलिस ने बताया कि मारे गए युवक ने रोटी चुराने की कोशिश की थी. इन घटनाओं में शामिल संदिग्ध को श्रद्धालुओं ने जिंदा पकड़ लिया था. ऐसी स्थिति में उसे पुलिस को सौंपा जा सकता था और पूछताछ में सच्चाई का पता लगाया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

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झारखंड में भी ऐसा ही कुछ हुआ. राज्य में लिंचिंग रोकथाम विधेयक पारित होने के बाद हुई यह घटना सिमडेगा जिले की है जहां करीब डेढ़ सौ लोगों की भीड़ ने संजू प्रधान नाम के युवक पर खूंटकटी कानून के उल्लंघन के आरोप में बुरी तरह पीटा और फिर उसे जिंदा जला दिया. युवक पर गैरकानूनी तरीके से पेड़ों की कटाई करके उसकी लकड़ी बेचने का संदेह था.

किसी भी व्यक्ति की पीट पीट कर या अन्य तरह से हत्या करना जघन्य अपराध है लेकिन इस तरह की घटना को सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देना भी किसी अपराध से कम नहीं है.

हाल के दिनों में पंजाब में भी ‘लिंचिंग’ की दो घटनाएं हुईं लेकिन गनीमत थी कि किसी भी संगठन या राजनीतिक दल के नेता ने इसे सांप्रदायिक रंग देने का दुस्साहस नहीं किया. यह एक अच्छा संकेत है.

देश के किसी न किसी हिस्से से अक्सर यह सुनने को मिलता है कि भीड़ ने काला जादू करने या बच्चा चुराने के आरोप में महिलाओं की पीट-पीटकर हत्या कर दी या फिर गांव में लोगों ने साइकिल या मवेशी चुराने, या बलात्कार अथवा महिलाओं से छेड़छाड़ करने के संदेह में किसी व्यक्ति की पीट कर हत्या कर दी गयी.

लेकिन, हाल के वर्षों में स्वंयभू गौरक्षकों रक्षकों द्वारा गोवंश की तस्करी या गौ मांस का कारोबार करने के आरोप में एक समुदाय के सदस्यों की पीट-पीटकर हत्या की घटनाएं भी बढ़ी हैं. इसी दौरान दलित या मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की लिंचिंग की भी घटनाएं सामने आयी हैं.

इसमें शक नहीं है कि किसी भी व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या करना जघन्य अपराध है और इसमें शामिल व्यक्तियों को बचाने के प्रयास भी अपराध से कम नहीं है.

सांप्रदायिक रंग देना

वैसे देश के ग्रामीण इलाकों में होने वाली इस तरह की घटनाओं को हमेशा सामाजिक समस्या और अंधविश्वास के रूप में देखा जाता रहा है, परंतु चलती ट्रेन में सीट पर बैठने के मुद्दे पर हुए लड़ाई झगड़े की घटना को भी एक समुदाय विशेष के सदस्यों को निशाना बनाए जाने के रूप में पेश किया जाना चिंताजनक है.

पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि एक समुदाय विशेष के सदस्य की अनर्गल आरोप या संदेह होने पर पीट पीट कर हत्या की घटना को, तथ्यों की जानकारी प्राप्त किये बगैर ही, बढ़ा चढ़ा कर सांप्रदायिक रंग देने के प्रयास होने लगते हैं.

भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेने और संदेहों के आधार पर निर्दोष व्यक्तियों की पीट-पीटकर हत्या की घटनाओं पर उच्चतम न्यायालय भी चिंता व्यक्त कर चुका है. न्यायालय ने इस स्थिति से सख्ती से निपटने के लिए संसद को अलग से लिंचिंग के अपराध के लिए कठोर प्रावधानों वाला कानून बनाने का सुझाव भी दिया था.

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती. लेकिन ऐसा लगता है कि न्यायालय की सख्ती का भी कई राज्यों के प्रशासन पर कोई असर नहीं होता है.

झारखंड में लिंचिंग की सजा

बहरहाल, केन्द्र सरकार ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों की समीक्षा ही कर रही है लेकिन इस बीच उग्र भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए कानून में कठोर प्रावधान करने वाला झारखंड चौथा राज्य बन गया है. अभी तक पश्चिम बंगाल, राजस्थान और मणिपुर में ही लिंचिंग की घटनाओं से निपटने के लिए कानून था. यह भी इत्तेफाक है कि ऐसा करने वाले तीन प्रमुख राज्य गैर भाजपा शासित हैं. मध्य प्रदेश भी ऐसा ही कानून बनाने पर विचार कर रहा है.

लिंचिंग और भीड़ की हिंसा को दंडनीय अपराध बनाने के इरादे से झारखंड विधान सभा ने पिछले साल दिसंबर में ‘भीड़ हिंसा और मॉब लिंचिंग निवारण विधेयक’ पारित किया है. विधेयक को राज्यपाल की संस्तुति मिलने के बाद यह कानून का रूप ले लेगा. इस कानून का मकसद राज्य में लोगों को हिंसक भीड़ की कारगुजारियों से प्रभावी सुरक्षा प्रदान करना है.

सदन से पारित इस विधेयक में लिंचिंग के अपराध के लिए अधिकतम उम्र कैद और 25 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है. प्रस्तावित कानून में भीड़ हिंसा के दोषी पाए जाने वालों के लिए जुर्माना और संपत्तियों की कुर्की के अलावा तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है. इसके अलावा, प्रस्तावित कानून में जाति, धर्म, वर्ण, लिंग और राजनीतिक संबद्धता आदि के आधार पर शत्रुतापूर्ण वातावरण बनाने के अपराध के लिए भी तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है.

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख

लिंचिंग की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता कि न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने गोवध में शामिल होने के संदेह में दिसंबर, 2018 में बुलंदशहर में एक पुलिस अधिकारी की गोली मारकर हत्या किये जाने की घटना के आरोपी योगेश राज की जमानत पर रोक लगा दी.

आरोपी योगेश राज बजरंग दल का जिला संयोजक है और उसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 25 सितंबर, 2019 को इस आधार पर जमानत दे दी थी कि इस मामले में अन्य आरोपियों को पहले ही जमानत पर रिहा किया जा सका है.

इस आदेश को दिवंगत पुलिस निरीक्षक सुबोध सिंह की पत्नी रजनी सिंह ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी. शीर्ष अदालत ने तीन जनवरी को Rajni Singh v. State of Uttar Pradesh and Anr प्रकरण में दो पेज के आदेश में कहा कि एक पुलिस अधिकारी की लिंचिंग बहुत ही गंभीर मामला है. पहली नजर में यह लोगों द्वारा कानून अपने हाथ में लेने का मामला है.

उच्चतम न्यायालय ने लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में Tehseen S. Poonawalla Vs. Union of India प्रकरण में 17 जुलाई, 2018 को अपने फैसले में विस्तृत दिशा निर्देश दिये थे लेकिन इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ.

शीर्ष अदालत ने लिंचिंग और भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए अनेक निर्देश दिये थे. इनमें लिंचिंग से पीड़ित के लिए मुआवजा योजना तैयार करने, राज्यों के प्रत्येक जिले में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष त्वरित अदालतें गठित करने, इस तरह के अपराध करने या इनमें शामिल होने अथवा नफरत और उन्माद पैदा करने वाली बातें या बयान फैलाने में संलिप्त संभावित व्यक्तियों के बारे में गोपनीय रिपोर्ट तैयार करना आदि शामिल था.

केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदम

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जुलाई 2021 को संसद को बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के आलोक 23 जुलाई और 25 सितंबर, 2018 को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए उपाय करने के परामर्श दिये गए थे. गृह मंत्रालय का कहना था कि केंद्र ने भीड़ को हिंसा और लिंचिंग के लिए प्रेरित करने की क्षमता रखने वाली फर्जी खबरों और अफवाहों पर निगाह रखने के लिए सेवा प्रदाताओं को भी संवेदनशील बनाने के लिए कदम उठाये हैं.

यही नहीं, लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं को लेकर गौहाटी उच्च न्यायालय में भी एक जनहित याचिका दायर की गयी थी. उच्च न्यायालय ने भी Seema Bhuyan vs The Union Of India प्रकरण में 28 फरवरी, 2020 को इस याचिका पर विचार करने से इंकार करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही इस बारे में विस्तृत दिशा निर्देश प्रतिपादित कर चुका है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि चार राज्यों की तरह ही दूसरे राज्य भी लिंचिंग के अपराध की गंभीरता को महसूस करेंगे और इससे निपटने के लिए कठोर कानून बनायेंगे. इसके साथ ही राज्यों को ऐसे मामलों के प्रति पुलिस को भी अधिक संवेदनशील बनाने की आवश्यकता होगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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