केवाईसी यानी ‘अपने ग्राहक को जानें नियमन की एक ऐसी जरूरी प्रक्रिया है जिसके जरिए बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थान अपने ग्राहकों की पहचान की जांच करते हैं ताकि पैसे का कोई घोटाला न हो, आतंकवादियों को पैसे न मिलें, और दूसरी तरह के आपराधिक लेन–देन न हो पाए. वित्तीय व्यवस्था की सुरक्षा के इरादे से तैयार की गई केवाईसी प्रक्रिया का मकसद वैश्विक जरूरतों को पूरा करते हुए बैंकिंग व्यवस्था की शुद्धता को कायम रखना था.
लेकिन जिसे मूलतः एक सुरक्षा उपाय के रूप में शुरू किया गया था वह अब जटिल प्रक्रिया में तब्दील हो गई है, जनता की सेवा के लिए बने संस्थानों द्वारा यातना देने के एक उपाय के रूप में.
बैंकों ने केवाईसी को एक अतिवादी और अनुचित दखल की प्रक्रिया बना दिया है, जो सुरक्षा से ज्यादा परेशानी देती है, रेगुलेटर से सहयोग के नाम पर ग्राहक के भरोसे को तोड़ती है.
केवाईसी बना अत्याचार
1984 से भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एक ग्राहक, पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम को पिछले सप्ताह ऐसा अनुभव हासिल हुआ जो केवाईसीकी प्रक्रिया के साथ बढ़ती परेशानियों का सटीक उदाहरण है.
एसबीआई की संसद एनेक्सी शाखा ने उन्हें लगातार एसएमएस भेजना शुरू किया कि वे अपनी केवाईसी के ब्योरे का नवीकरण करवा लें. जरूरी दस्तावेज़, जिनमें दिल्ली और चेन्नै के उनके पतों के सबूत शामिल हैं, जमा करवाने के बावजूद बैंक ने उन्हें सूचित किया कि उन्होंने अधूरी जानकारियां दी है इसलिए वे और दस्तावेज़ जमा करें. लगातार किए जा रहे फोन और भेजे जा रहे संदेशों से परेशान मेरे पिता ने बैंक के एक प्रतिनिधि से कहा कि वह उनके दफ्तर आ जाए और कागजात ले जाए. वह प्रतिनिधि आया तो, मगर उसे यही नहीं पता था कि उसे क्या चाहिए. पहचान के लिए जरूरी आधार–कार्ड और पासपोर्ट आदि देने के बावजूद मेरे पिता को काफी उत्पीड़न का अनुभव हुआ.
दिल्ली में मेरे एक साथी को भी इसी तरह का व्यवहार मिला. उन्हें राजस्थान में उनके बैंक की स्थानीय शाखा में खुद आकर केवाईसी करवाने के लिए संदेशों की बमबारी जैसी की गई. अपनी व्यस्तता के कारण जब वे वहां न जा सके तो उनके बैंक ने उनके खाते को ‘फ्रीज़’ (स्थगित) कर दिया, उन्हें अपना पैसा निकालने से वंचित कर दिया. इसे सीध–सीधे केवाईसी ब्लैकमेल का मामला ही कहा जाएगा, जब कि ग्राहकों को गैरज़रूरी बोझिल प्रक्रिया से अनावश्यक रूप से बार–बार गुजरने के लिए कहा जाता है.
मेरे एक दूसरे साथी ने अपनी 80 साल की दादी प्रमिला मुकती की बेहद दुखद कहानी बताई, जिनके खाते को महज इसलिए ब्लॉक कर दिया गया था क्योंकि वे खुद आकर केवाईसी की प्रक्रिया पूरी करने में असमर्थ थीं, बावजूद इसके कि उनके खाते से संबंधित किसी ब्योरे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. श्रीमती मुकती अपनी उम्र और शारीरिक सीमाओं के कारण बिना किसी मदद के बैंक जाने में असमर्थ थीं. लेकिन बैंक ज़ोर दे रहा था कि वे खुद आकर केवाईसी की प्रक्रिया पूरी करें. इस तरह वह सहानुभूति और पेशेगत कौशल की कमी का ही प्रदर्शन कर रहा था.
इस तरह के उदाहरण यही दर्शाते हैं कि ग्राहक की पहचान की पुष्टि की सरल प्रक्रिया किस तरह एक कष्टदायक और नौकरशाही प्रक्रिया बन गई है. इसका मूल मकसद सुरक्षा और नियमन था मगर यह उत्पीड़न की प्रक्रिया बन गई है— खासकर वृद्ध, शारीरिक रूप से लाचार, और व्यस्तता अथवा आर्थिक सीमाओं के कारण लाचार लोगों के लिए.
रिजर्व बैंक के निर्देशों का पालन करें
इस संदर्भ में, रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल में बैंकों को निर्देश दिया है कि वे ग्राहकों से बार–बार केवाईसी के दस्तावेज़ न मांगें. उन्होंने ज़ोर दिया कि वे केंद्रीय डाटाबेस का उपयोग करके जरूरी जानकारियां आसानी से हासिल कर सकते हैं और ग्राहकों पर बोझ को कम कर सकते हैं. मल्होत्रा ने ज़ोर दिया कि वे ग्राहकों की शिकायतों का सही वर्गीकरण करें और ग्राहक सेवाओं को और बेहतर बनाएं ताकि उनका भरोसा बढ़े और इस उद्योग के मानकों का पालन किया जा सके.
कई बैंक अभी भी इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं. केवाईसी का काम तीसरे पक्ष से करवाना भी एक मसला है, क्योंकि वह बिना सोचे–समझे ग्राहकों से दस्तावेज़ मांगने के संदेशों की बमबारी करने के लिए जाने जाते हैं. यह गुस्सा पैदा करने वाली बात है और संवेदनशील निजी डाटा के लिए गंभीर खतरा है.
रिजर्व बैंक के निर्देश सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, जिनका बैंकों को सख्ती से पालन करना चाहिए. केवाईसी डाटा की बार–बार मांग करके ग्राहकों को परेशान करने या डाटा सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले संस्थानों को कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए. केवाईसी सेवा देने वाले तीसरे पक्ष की गहन जांच की जानी चाहिए ताकि ग्राहकों के डाटा को सुरक्षित रखा जाए और उन्हें कानूनी सुरक्षा भी हासिल हो.
हालांकि सुरक्षा के लिए केवाईसी जरूरी है, लेकिन यह एक बेकार बोझ बन गया है. बैंकों को कड़े नियमों, ज़िम्मेदारी, और ग्राहक के अनुकूल प्रक्रियाओं के जरिए रिजर्व बैंक के निर्देशों का पालन करना चाहिए. केवाईसी उत्पीड़न के युग का समापन जरूरी है.
कार्ति पी चिदंबरम शिवगंगा से सांसद और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं. वे तमिलनाडु टेनिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी हैं. उनका एक्स हैंडल @KartiPC है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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