scorecardresearch
Friday, 23 January, 2026
होममत-विमतदेश की न्यायपालिका नागरिकों को निराश कर रही है. जब आज़ादी खतरे में होती है, तब जज आंखें फेर लेते हैं

देश की न्यायपालिका नागरिकों को निराश कर रही है. जब आज़ादी खतरे में होती है, तब जज आंखें फेर लेते हैं

अगर आप पर ऐसे अपराध का आरोप लगता है जिसके लिए सबूत का एक भी टुकड़ा नहीं है, तो भी जज आपको जेल भेज देगा.

Text Size:

भारत में लोग सरकार से इतना डरकर क्यों रहते हैं? हम इस बात से क्यों डरते हैं कि बदले की भावना से भरे या भ्रष्ट अधिकारी हमारे साथ क्या कर सकते हैं.

और इससे भी अहम सवाल यह है कि यह डर तब भी क्यों बना रहता है, जब हमें पता होता है कि हमने कुछ भी गलत नहीं किया है. जब हमें मालूम होता है कि हमारे खिलाफ सबूत का एक भी टुकड़ा नहीं है.

इसका छोटा सा जवाब यह है कि भारत में प्रक्रिया ही सजा बन जाती है. न्यायिक व्यवस्था इतनी ज्यादा बोझ से दबी हुई है कि मुकदमे तक पहुंचने में ही सालों लग जाते हैं. और जब आखिरकार मुकदमा शुरू होता है, तो हमें पता होता है कि सबूतों की कमी के कारण अभियोजन का मामला खारिज हो जाएगा. लेकिन तब तक हमारी जिंदगी बर्बाद हो चुकी होती है. पुलिस और दूसरे अधिकारियों के चक्कर काटने में अनगिनत घंटे खर्च हो जाते हैं. वकीलों पर लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं. हमारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है. हममें से कई लोग अपनी नौकरी खो देते हैं या अपनी आय का बड़ा हिस्सा गंवा बैठते हैं.

यह व्यवस्था नागरिक के खिलाफ और भ्रष्ट या दुर्भावनापूर्ण पुलिस या राजस्व अधिकारियों के पक्ष में इतनी ज्यादा झुकी हुई है कि निर्दोष लोगों के पास वास्तव में कोई मौका नहीं बचता.

राज्य की दमनकारी ताकत का एक बड़ा हिस्सा यह क्षमता है कि वह लोगों को किसी भी अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से बहुत पहले जेल में डाल सकती है. और कई मामलों में तो यह भी नहीं होता कि वे कभी दोषी पाए जाएं या मामला अदालत तक पहुंचे.

यह वह स्थिति नहीं थी, जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी. उनके बनाए लगभग हर कानून में निर्दोष होने की धारणा छिपी हुई थी. औपनिवेशिक उत्पीड़न झेल चुके इन लोगों की आखिरी इच्छा यह नहीं थी कि एक दमनकारी साम्राज्यवादी राज्य की जगह एक घरेलू तानाशाही सरकार खड़ी कर दी जाए.

फिर भी, कुछ मायनों में हम ठीक वही बन चुके हैं.

जेल ही नियम बन गया है?

जो लोग वास्तव में छापे डालते हैं या गिरफ्तार करते हैं, उनके अलावा दो और वर्ग हैं जिन्होंने हमें इस हालत में पहुंचाया है.

पहला वर्ग उन नेताओं का है, जो खुशी-खुशी ऐसे कानून पास कर देते हैं, जो निर्दोष होने की धारणा को इतनी बुरी तरह कमजोर कर देते हैं कि उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाता.

बेशक, मौजूदा सत्ताधारी दल के नेता इसके लिए जिम्मेदार हैं. लेकिन कांग्रेस और अन्य दल भी सत्ता में रहते हुए निर्दोष होने की धारणा को छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार रहे हैं. तब जो कारण दिए गए, वे ऊंचे आदर्शों से भरे हुए लगते थे. कहा गया कि ये दमनकारी कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. भारत को मनी लॉन्ड्रिंग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी है. और भी ऐसे तर्क दिए गए.

आज पीछे मुड़कर देखें तो लगता है कि जब इन कानूनों का प्रस्ताव रखा गया था, तब हममें से कई लोगों को ज्यादा जोरदार विरोध करना चाहिए था. एक नेक इरादों वाला नेता भी एक दयालु तानाशाह जैसा होता है. कोई भी तानाशाह ज्यादा समय तक दयालु नहीं रहता. और सभी नेता देश से पहले अपने हितों को रखते हैं. इसलिए शुरू से ही यह साफ होना चाहिए था कि इन कानूनों का दुरुपयोग होगा.

लेकिन एक वजह यह भी थी कि हम उतने चिंतित नहीं थे, जितना होना चाहिए था, क्योंकि हमें न्यायपालिका पर भरोसा था. हमें लगता था कि जज हमारी आज़ादी की रक्षा करेंगे और नागरिकों को प्राथमिकता देंगे.

अब यह सोच इतनी पुरानी और भोली लगती है कि बच्चों की परीकथाओं जैसी हास्यास्पद प्रतीत होती है.

अक्सर न्यायपालिका आम नागरिक को निराश करती है और उत्पीड़न करने वालों के साथ खड़ी दिखती है. अगर आप पर ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है, जिसके पक्ष में एक भी सबूत नहीं है, तब भी जज आपको जेल भेज देते हैं. अगर अभियोजन का मामला पूरी तरह मनगढ़ंत हो, तब भी जज उसे गंभीरता से लेते हैं और आपको जेल में डाल देते हैं.

सिद्धांत रूप में जजों को ऐसा नहीं करना चाहिए. उन्हें मुकदमा अदालत में आने तक आपको जमानत देनी चाहिए. जमानत न देने के कुछ हालात हो सकते हैं. जैसे यह डर कि आप जेल से बाहर रहकर फिर कोई अपराध कर सकते हैं. यह आशंका कि आप फरार हो सकते हैं. यह खतरा कि आप सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं या गवाहों को डरा सकते हैं. लेकिन जब तक यह साबित न हो जाए कि ऐसे हालात मौजूद हैं, तब तक जमानत आपका स्वतंत्रता का अधिकार है.

कुछ दिन पहले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मैंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ से पूछा कि हालात इतने खराब कैसे हो गए. उन्होंने कुछ हद तक सही बात कहते हुए कहा कि उनकी सुप्रीम कोर्ट ने जितना माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा मामलों में जमानत दी है. उन्होंने पवन खेड़ा और तीस्ता सेतलवाड़ से जुड़े मामलों का उदाहरण दिया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया था.

लेकिन मैंने उनसे पूछा, फिर उमर खालिद का क्या.

क्या यह गलत नहीं है कि एक आदमी पांच साल से जेल में है और मुकदमे की कोई तारीख नजर नहीं आ रही है. जहां सुप्रीम कोर्ट उसे जमानत देने से इनकार करता है और यह तक कह देता है कि उस गरीब आदमी को जमानत पर दोबारा विचार होने से पहले एक साल और जेल में रहना चाहिए.

चंद्रचूड़ ने कहा कि वह उस अदालत के फैसलों की आलोचना करने से बचना चाहते हैं, जिसकी उन्होंने दो साल पहले तक अगुवाई की थी. लेकिन उन्होंने साफ किया कि उमर खालिद को जमानत न देने के फैसले से वह सहमत नहीं हैं. (इस पूरी बातचीत की रिपोर्ट दिप्रिंट ने की थी.)

उनका यह बयान पूरे भारत में सुर्खियां बना, क्योंकि इससे कोई संदेह नहीं रहा कि अगर यह मामला उनके सामने आया होता, तो वह खालिद को जमानत दे देते. इसी के साथ यह विवाद भी खड़ा हुआ कि अगर ऐसा था, तो मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने यह मामला पहले ऐसे जज को क्यों सौंपा, जो लगभग तय तौर पर जमानत देने से इनकार कर देता, अगर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पूरी सुनवाई होती.

एक भ्रष्ट न्यायपालिका

लेकिन तथ्यों पर गौर कीजिए. एक आदमी को बिना किसी मुकदमे के पांच साल से जेल में बंद रखा गया है. मेरे पास उन जजों जैसी न्यायिक समझ नहीं है, जिन्होंने खालिद को जेल में बनाए रखा है. फिर भी पूरे सम्मान के साथ मुझे कहना होगा कि खालिद के खिलाफ जो सबूत हैं, वे न सिर्फ भरोसे लायक नहीं हैं, बल्कि बेहद कमजोर और दयनीय हैं.

यह पूरी तरह संभव है कि मैं गलत हो सकता हूं. लेकिन अगर ऐसा है, तो फिर मुकदमा अब तक शुरू क्यों नहीं हुआ. हमें सबूत दिखाइए. उसे खुद का बचाव करने का मौका दीजिए. जैसा कि चंद्रचूड़ ने कहा, इस तरह की देरी न सिर्फ स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है, बल्कि शीघ्र सुनवाई के अधिकार का भी हनन करती है.

ऐसी देरी न केवल कानून के शासन को कमजोर करती है, बल्कि नागरिकों को दी गई संवैधानिक गारंटियों को शर्मसार करती है और सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता की छवि को भी नुकसान पहुंचाती है. हालांकि, इससे सरकार को फायदा जरूर होता है.

लेकिन बात सिर्फ शीर्ष अदालत तक सीमित नहीं है. निचली न्यायपालिका का क्या, जो सरकार और अधिकारियों द्वारा उसके सामने लाए गए किसी भी व्यक्ति को बिना हिचक जेल भेज देती है.

चंद्रचूड़ ने माना कि निचली अदालतें अक्सर जमानत देने में जरूरत से ज्यादा हिचकती हैं. लेकिन उन्होंने इसके बचाव में तर्क दिया कि जज और मजिस्ट्रेट इस बात से डरते हैं कि कहीं यह न कहा जाए कि उन्होंने जमानत देने के लिए रिश्वत ली है, इसलिए वे फैसला ऊपरी अदालत पर छोड़ देना बेहतर समझते हैं. यह वजह कुछ हद तक समझ में आती है, लेकिन इससे यह नहीं समझाया जा सकता कि फिर इसी तरह की बदनामी का डर साफ तौर पर भ्रष्ट फैसले सुनाने से क्यों नहीं रोकता.

हालांकि, निष्पक्षता के लिए यह कहना जरूरी है कि चंद्रचूड़ ने यह भी स्वीकार किया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है.

उमर खालिद मामले को लेकर जिस तरह की रुचि और जन आक्रोश देखने को मिला है, उससे लगता है कि अब भारत के लोग कह रहे हैं कि बहुत हो गया. निर्दोष नागरिक सरकार से उस तरह डर रहे हैं, जैसा किसी भी लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए. पुलिस और राजस्व एजेंसियों पर भरोसा खतरनाक रूप से कम हो गया है. यह स्थिति आपातकाल के बाद से नहीं देखी गई थी.

राजनेता डरे हुए नागरिकों के साथ शायद खुश रह सकते हैं. लेकिन न्यायपालिका का क्या. लंबे समय से भारतीय नागरिक इसे संविधान की भावना से जुड़ी हमारी आखिरी काम करने वाली कड़ी मानते रहे हैं.

क्या हमारे जज इस बात को लेकर चिंतित नहीं हैं कि जब इतिहास लिखा जाएगा, तो यह दर्ज होगा कि जब न्याय और स्वतंत्रता खतरे में थे, तब उन्होंने मुंह फेर लिया.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ईरान के विद्रोह ने क्यों बेनकाब की लिबरल राजनीति की उलझन


 

share & View comments