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Monday, 2 March, 2026
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जेल से जापान तक: फूलन देवी की अनकही दुनिया

उनकी ऑटोबायोग्राफी बॉर्डर पार करके अलग-अलग भाषाओं में छपी. वह समझती थीं कि उन्हें कैसे फंसाया जा रहा है और उन्होंने उन जगहों का इस्तेमाल खुद के लिए बोलने के लिए किया.

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क्या हम फूलन देवी की जिंदगी के एक अहम पहलू को नजरअंदाज कर रहे हैं? हम अक्सर उन्हें पीड़िता बनाम डकैत की बहस तक सीमित कर देते हैं और उन दुनियाभर के मंचों को भूल जाते हैं जहां वह पहुंचीं. भारतीय जनता और मीडिया ने उन्हें हमेशा या तो पीड़ित या अपराधी की नजर से देखा.

अपनी आत्मकथा “आई, फूलन देवी: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ इंडियाज़ बैंडिट क्वीन” में वह लिखती हैं, “मेरे बारे में इतने लोगों ने बात की, जबकि मुझे खुद अपने लिए बोलने का मौका नहीं मिला. इतने लोगों ने मेरी तस्वीर ली और उसे अपने मतलब के लिए तोड़-मरोड़ दिया. उस छोटी गांव की लड़की को, जिसे यातना दी गई और अपमानित किया गया, लेकिन जो टूटी नहीं, उसे कई लोगों ने तुच्छ समझा. पत्रकार मेरी कहानी जानना चाहते थे, फिल्म निर्देशक मुझे फिल्म में कैद करना चाहते थे. वे सब ऐसे बात करते थे जैसे मैं हूं ही नहीं, जैसे मुझे सम्मान का कोई अधिकार ही नहीं है.”

यह बताता है कि उनके खिलाफ हिंसा सिर्फ शारीरिक नहीं थी, बल्कि उन्हें बिना सुने परिभाषित करने में भी थी. ऐसा करके हमने उस महिला को नजरअंदाज कर दिया जो अपने सपने और अपनी इच्छा शक्ति रखती थी.

जब भारतीय समाज ने उन्हें सीमित कर दिया, तो देवी ने अपनी कहानी अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाई. उनकी आत्मकथा सीमाओं को पार कर अलग-अलग भाषाओं में छपी. वह समझती थीं कि उन्हें किस तरह पेश किया जा रहा है और उन्होंने उन्हीं मंचों का इस्तेमाल खुद बोलने के लिए किया. वह सिर्फ विषय नहीं रहीं, बल्कि अपनी कहानी खुद गढ़ी. दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में उन्हें ऐसे लोग मिले जिन्होंने उनके संघर्ष से जुड़ाव महसूस किया.

एक अनोखी दोस्ती

जेल में रहने के दौरान, फूलन देवी को एक ब्रिटिश लेखक, रॉय मोक्सहैम से एक अचानक खत मिला, जो उस समय पासमोर एडवर्ड्स म्यूज़ियम में किताब और पेपर कंजर्वेटर के तौर पर काम कर रहे थे. मोक्सहैम ने उनकी कहानी द इंडिपेंडेंट में पढ़ी थी, जिसमें जेल से लड़ा गया उपचुनाव और उनकी जिंदगी का संक्षिप्त जिक्र था. इसे पढ़कर वह भावुक हो गए और उन्होंने उन्हें पत्र लिखने का फैसला किया, हालांकि उन्हें यकीन नहीं था कि पत्र पहुंचेगा या जवाब मिलेगा. लेकिन जवाब आया. अगले दो साल तक दोनों के बीच कई पत्रों का आदान-प्रदान हुआ, जिसने जेल में उनके अकेलेपन के दौरान उन्हें जुड़ाव और सहारा दिया.

फूलन देवी की आत्मकथा जापान में भी खूब पढ़ी गई. 1995 में जब उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया, तो जापानी शाही परिवार की इतो मिचिको नागपुर के दीक्षाभूमि में आयोजित समारोह में शामिल हुईं. यही वह जगह है जहां डॉ. बीआर आंबेडकर ने 1956 में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया था.

जनवरी 1999 में देवी जापानी संसद को संबोधित करने के लिए जापान गईं. वहां उन्होंने टोक्यो और क्योटो का दौरा किया. उनकी आत्मकथा का जापानी अनुवाद वहां काफी लोकप्रिय हुआ और पाठकों ने उनके प्रति सहानुभूति दिखाई. उन्हें इन दोनों शहरों से खास लगाव हो गया. वह स्थानीय बाजारों में गईं और खुशी के साथ जापानी भोजन का स्वाद लिया.

एशिया में राजनीति की प्रोफेसर चिहारू ताकेनाका ने अपने लेख “जेंडर्ड वायलेंस एंड बियॉन्ड: सिचुएटिंग फूलन देवी इन इंडियन डेमोक्रेसी” में लिखा है, “फूलन की मृत्यु डकैत के रूप में नहीं हुई. आश्चर्यजनक रूप से वह सांसद के रूप में मरीं. उनका जीवन हमें दिखाता है कि भारतीय लोकतंत्र में हिंसक अपराधों को वर्ग संघर्ष के कच्चे रूप से आगे बढ़कर पार करने की क्षमता है. आज जापान भारत को 21वीं सदी के एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक अहम साझेदार के रूप में देखता है. मुझे खुशी होगी अगर मेरी छोटी सी किताब भारत और जापान को पुराने लेकिन नए पड़ोसियों की तरह एक-दूसरे को समझने में मदद करे.”

अधूरे सपने

उसी दौर में देवी ने अपनी आत्मकथा के फ्रेंच संस्करण “मोई, फूलन देवी” के प्रचार के लिए फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन की यात्रा की.

रॉय मोक्सहैम अपनी किताब “आउटलॉ: इंडियाज़ बैंडिट क्वीन एंड मी” में लिखते हैं कि पेरिस में उनके रहने के दौरान उनकी एक महिला डॉक्टर से गहरी दोस्ती हो गई थी, जिनसे वह अपने स्त्री रोग संबंधी समस्याओं पर नियमित सलाह लेती थीं. वह फ्रेंच ब्रेड को भी बहुत पसंद करती थीं.

उसी साल बाद में उन्होंने दुबई में एक जनसभा को संबोधित किया और कहा, “मैंने कई बार आत्महत्या करने के बारे में सोचा, मर जाने के बारे में सोचा. लेकिन फिर मैंने सोचा कि हर दिन हजारों लड़कियां मरती हैं. लोग मुझे डकैत के नाम से जानते हैं, ‘डकैत फूलन देवी.’ बताइए, क्या मेरे चार हाथ-पैर हैं? वे कहते हैं, ‘वह चंबल घाटी से है, वह चंबल घाटी से है.’ क्या चंबल घाटी मेरे मां-बाप हैं? मेरा जन्म माता-पिता से हुआ. मेरा एकमात्र अपराध यह है कि मैं एक झोपड़ी में पैदा हुई, एक गरीब परिवार में जन्मी, एक उत्पीड़ित समाज में पैदा हुई. तो क्या मुझे जीने का अधिकार नहीं है?”

फूलन देवी लंबे समय से लंदन जाने की इच्छा जताती रही थीं. वहां उनके कई दोस्त और शुभचिंतक थे जो उन्हें अक्सर बुलाते थे. लेकिन सांसद के रूप में उनकी जिम्मेदारियों के कारण यह यात्रा टलती रही. उन्होंने रॉय मोक्सहैम से, जिन्हें वह दूर देश का भाई मानती थीं, यह वादा भी किया था कि जब वह लंदन जाएंगी तो उनके घर ठहरेंगी.

लंदन की यह यात्रा अधूरी रह गई. 2001 में उनकी हत्या ने उनके राजनीतिक जीवन और दुनिया भर में शुरू हुई यात्राओं को अचानक खत्म कर दिया.

रॉय मोक्सहैम ने बाद में याद किया कि दोस्ती के शुरुआती वर्षों में उन्हें अक्सर डर रहता था कि देवी की हत्या हो सकती है. उन्हें उनकी पहली मुलाकात याद है, जब उनके घर को हथियारबंद पुलिस ने घेर रखा था. एक अधिकारी उन्हें छत पर ले गया था और मशीनगन रखने की जगह दिखाई थी. समय के साथ उनकी सुरक्षा कम होती गई. चित्रकूट की एक यात्रा में उनके साथ सिर्फ एक बॉडीगार्ड था. कुछ हद तक वह खुद भी ऐसा चाहती थीं. वह सामान्य जीवन जीना चाहती थीं. फिर भी उन्हें पता था कि उनके दुश्मन बदला ले सकते हैं. वह अक्सर कहती थीं कि उनकी हत्या हो सकती है. मोक्सहैम ने देखा कि बाद के वर्षों में उन्हें मौत का डर वैसा नहीं रहा जैसा जेल में था. शायद उन्हें लगा कि वह कुछ हद तक अपना मकसद पूरा कर चुकी हैं. अगर किस्मत में होगा तो होगा.

अपनी आत्मकथा में देवी लिखती हैं, “अब पहली बार मेरे समुदाय की एक महिला अपने जीवन की सच्चाई बता पाई है और सार्वजनिक रूप से उस अन्याय की गवाही दे पाई है जिसे हम सबने झेला. मुझे उम्मीद थी कि मेरी गवाही दूसरों की मदद करेगी, दूसरी महिलाओं की, मेरी बहनों की जिन्हें अपमानित किया गया, और मेरे भाइयों की जिनका शोषण हो रहा है. मैं साबित करना चाहती थी कि हम सबकी इज्जत है, चाहे हमारा जन्म कहीं भी हुआ हो, हमारी जाति, हमारी त्वचा का रंग या हमारा लिंग कुछ भी हो. मैं सम्मान चाहती थी. मैं चाहती थी कि लोग कहें, ‘फूलन देवी एक इंसान हैं.’ क्योंकि तब वे यही बात दूसरों के बारे में भी कहेंगे.”

“मेरे कर्मों का गीत गाओ.

मेरी लड़ाइयों की कहानी सुनाओ.

कैसे मैंने धोखेबाज़ दानवों से मुकाबला किया.

मेरी गलतियों को माफ करो.

और मुझे शांति प्रदान करो.”

रितेश ज्योति, बेंगलुरु की अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी से डेवलपमेंट में मास्टर डिग्री कर रहे हैं. वह फुले-आंबेडकरवादी आंदोलन और कांशीराम की राजनीति पर पढ़ते-लिखते हैं. वह @Riteshjyotii पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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