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Thursday, 29 February, 2024
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एजुकेशन लोन या कार लोन, किससे देश का भला होता है

यह जरूरी है कि भारत एजुकेशन लोन खासकर विदेशों में पढ़ने के लिए लिये गये लोन के बारे में एक नीति बनाये. मेधावी और बढ़िया डिग्री पाने वालों को यहां समायोजित करे.

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देश में शिक्षा का प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन हायर एजुकेशन के लिए उतने संस्थान नहीं खुल पाये जितना कि एडमिशन चाहने वालों की तादात थी. इसके अलावा बेहतर और टेक्निकल एजुकेशन की तलाश जारी रही. डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, रिसर्च वगैरह के लिए स्टूडेंट विदेश जा रहे हैं. उनकी तादात कोविड के बाद अब फिर बढ़ने लगी है और ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस साल लगभग डेढ़ लाख भारतीय स्टूडेंट विदेशों में एजुकेशन के लिए जा चुके हैं. यह संख्या आने वाले समय में और बढ़ेगी.

यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान हमने देखा कि 20,000 से भी ज्यादा मेडिकल स्टूडेंट भारत लौटे. ये स्टूडेंट भारत के मेडिकल कॉलेजों में सीटें पाने में असफल रहने के बाद यूक्रेन चले गये जहां कई सारे कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई होती है. भारत में मेडिकल और यहां तक कि अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेजों की, जनसंख्या की तुलना में भारी कमी है. ऐसे में भारतीय स्टूडेंट बड़ी तादात में अपनी बेहतर शिक्षा की जरूरत पूरी करने बाहर जाते थे, लेकिन इसके साथ ही एजुकेशन पूरी करके विदेशों में कहीं बेहतर जिंदगी या ज्यादा धन कमाने की इच्छा भी मन में रहती है. इसलिए बहुत बड़ी तादात में भारतीय स्टूडेंट शिक्षा पूरी करके वहीं रुक जाते हैं, खासकर अमेरिका, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में. लेकिन इनमें से बहुत से ऐसे हैं जो वहां रहकर भी भारत की पताका विदेशों में फहरा रहे हैं. दुनिया भर में उनके चर्चे होते हैं.

लेकिन यह सब उतना आसान भी नहीं है जितना कहने-सुनने में लगता है. एक तो अच्छे कॉलेजों या यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने में बहुत पापड़ बेलनी पड़ती है तो दूसरी ओर इस पर बहुत पैसा खर्च होता है और अगर पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अच्छी नौकरी नहीं मिली तो फिर लोन चुकाना भी भारी पड़ जाता है. स्टूडेंट से लेकर मां-बाप तक कर्ज में डूबे रहते हैं. यह स्थिति इसलिए पैदा हुई कि हमारे देश में एजुकेशन लोन से भी पैसे कमाने की वित्तीय संस्थाओं में प्रवृत्ति रही है.


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भारी-भरकम ब्याज दरें न केवल स्टूडेंट्स को बल्कि उनके अभिवावकों को भी तकलीफ देती हैं. लेकिन बैंकों को इससे क्या? उन्हें तो अपने ब्याज से मतलब है. सरकार का भी ध्यान इस ओर नहीं है और उसका कारण यह है कि यह न तो चुनावी मुद्दा है और न ही इसका कॉरपोरेट सेक्टर से कोई लेना-देना है जिसे खुश रखने का प्रयास सभी सरकारें करती रही हैं. इस मामले में भारत में यह एक उपेक्षित सेक्टर है जिसके बारे में नीति निर्धारक जरा भी नहीं सोचते.

भारत में विदेशी शिक्षा का कितना क्रेज है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल यानी 2021 में लगभग साढ़े चार लाख स्टूडेंट विदेश पढ़ने के लिए गये. यह संख्या 2020 की तुलना में लगभग 40 फीसदी ज्यादा है. अभी कोविड के बाद स्थिति पूरी तरह से सामान्य नहीं हुई है और अमेरिका जाने के लिए वीजा की लंबी कतार लगी हुई है. यह सामान्य होने के बाद इसमें और भी इज़ाफा होगा, यह तय है. वे इस पर भारी-भरकम रकम खर्च करते हैं.

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एसोचैम के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में भारतीय स्टूडेंट ने विदेशों में पढ़ाई पर 13 अरब डॉलर खर्च किये. अब जबकि उनकी तादात बढ़ती जा रही है, यह राशि भी बढ़ती जा रही होगी. विदेशों में पढ़ने का क्रेज बढ़ता ही रहेगा लेकिन इसके लिए मोटी रकम खर्च करनी ही होगी. इसके लिए स्टूडेंट बैंकों से लोन ले रहे हैं. यहां पर ही उन्हें बहुत निराशा होती है. पहली समस्या तो होती है कोलेटरल यानी गिरवी रखने के लिए कोई संपत्ति की और दूसरे भारी ब्याज दरों की.

देश में इस समय होम लोन और कार लोन के लिए जो ब्याज दरें हैं उनसे कहीं ज्यादा एजुकेशन लोन की है. इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस समय देश में कार लोन 7.95 फीसदी से शुरू होता है जबकि होम लोन 8.50 फीसदी के आसपास है. देश में आवास को बढ़ावा देने के लिहाज से यह दर तो उचित है लेकिन कार लोन की कम दरों को देखकर हैरानी होती है क्योंकि देश के बैंक अपनी ब्याज दरें एजुकेशन लोन की राशि के मुताबिक ही रखते हैं.

कम राशि पर तो ब्याज दरें कम हैं लेकिन ज्यादा राशि पर तो प्रभावी ब्याज दरें 10 फीसदी से ज्यादा हैं. यह लोन ऐसा है जिसे बच्चे अपने बेहतर भविष्य के लिए भी खर्च करते हैं जिससे देश का भविष्य भी जुड़ा हुआ है. विदेशों में पढ़ने वाले स्टूडेंट बड़ी रकम उधार लेते हैं क्योंकि विदेशों में फीस यहां से ज्यादा होती है. एक अच्छे कोर्स की पढ़ाई के लिए अमेरिका में अच्छी यूनिवर्सिटी में औसतन 50,000 डॉलर का खर्च होता है. अब पिछले कुछ समय से डॉलर की कीमतें बढ़ने से भारतीय स्टूडेंट पर दबाव बढ़ गया है और अब उन्हें कहीं ज्यादा लोन लेना पड़ रहा है.

अमेरिका में रहने की लागत भी इसी वजह से बढ़ गई है. शुरू में जब तक कोई पार्ट टाइम जॉब न मिल जाये तब तक स्टूडेंट को अपने ही पैसे खर्च करने होते हैं. यह सारा खर्च लोन के जरिये ही होता है. इतनी ज्यादा ब्याज दरों के कारण वह काफी समय तक कर्ज में डूबा रहता है. अगर वह भारत लौटकर आता है तो उसे उतनी सैलरी नहीं मिल पाती जिससे वह लोन आसानी से चुका दे.

लेकिन इस मामले में हमारे प्रतिद्वंद्वी देश चीन ने बहुत ही लचीली पॉलिसी बना रखी है. वहां एजुकेशन लोन पर ब्याज दरें काफी कम हैं. वहां की सरकार अपने बच्चों को विदेशों में जाकर पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है. उन्हें कम ब्याज देना होता है और विदेशों से पढ़कर वापस आने का बॉन्ड भरने वालों का तो कई मामलों में लोन ही माफ कर दिया जाता है. अपने बच्चों को विदेश भेजकर टेक्निकल पढ़ाई करवाने की चीन की नीति बहुत सफल रही. उसने साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में जो सफलता पाई उसके पीछे ये स्टूडेंट ही रहे जो वहां से स्पेशलाइज्ड कोर्स करके चीन लौटे. इनमें से तो बहुतों ने अमेरिका में हाई रिसर्च भी किया और उसका फायदा भी उठाया. मेधावी स्टूडेंट्स के लिए चीन में कई तरह की स्कॉलरशिप है, जिसके जरिये वह उन्हें विदेशों में हायर एजुकेशन के लिए भेजता है, लेकिन भारत में ऐसी कोई पॉलिसी नहीं बनाई गई.

दरअसल, चीन ने अपने यहां हायर एजुकेशन को सस्ता और सुलभ बनाये रखा और विदेशों में पढ़ने के लिए स्टूडेंट को प्रेरित किया है. न केवल वहां की सरकार बल्कि कॉर्पोरेट भी उन्हें प्रोत्साहित करते रहते हैं ताकि उनके पास टैलेंट हो.

यह जरूरी है कि भारत एजुकेशन लोन खासकर विदेशों में पढ़ने के लिए लिये गये लोन के बारे में एक नीति बनाये. मेधावी और बढ़िया डिग्री पाने वालों को यहां समायोजित करे, उन्हें उनके लोन पर सब्सिडी दे, या ब्याज दरें घटाये और कॉरपोरेट क्षेत्र को उन्हें जॉब देने के लिए प्रोत्साहित करे. इसमें ही सब का भला है, नहीं तो विदेशों में पढ़े बच्चे वहां की दुकानों में सेल्समैन का काम करते दिखाई देंगे, जैसा अभी दिख रहा है.

(मधुरेंद्र सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल रणनीतिकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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