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Wednesday, 4 March, 2026
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ईरान की तानाशाही की निंदा होनी चाहिए थी, लेकिन अमेरिका-इज़राइल के हमले इलाज नहीं

एक बार ‘रेजीम चेंज’ को सही मान लिया जाए, तो यह सोच फैलने लगती है. प्रभाव और ताकत को लेकर ईर्ष्या रखने वाली और पश्चिम पर शक करने वाली प्रतिद्वंद्वी शक्तियां भी इसी तर्क का इस्तेमाल दूसरी जगहों पर करेंगी.

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अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रूथ सोशल’ पर 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान की घोषणा करते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान की जनता से कहा, “अपनी सरकार को अपने हाथ में ले लो.” ये शब्द बहुत कुछ बताते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति असल में एक संप्रभु देश—ईरान—की जनता को यह बता रहे थे कि उन्हें किस तरह का राजनीतिक नतीजा निकालना चाहिए.

एक देश का नेता—अमेरिकी राष्ट्रपति खुले तौर पर दूसरे देश का राजनीतिक भविष्य तय करने की बात कर रहा था.

हां, ईरान की सरकार दमनकारी और तानाशाही है. महिलाओं पर उसका अत्याचार और नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमले बहुत निंदनीय हैं और 21वीं सदी के नागरिक जीवन के नियमों में उनकी कोई जगह नहीं है.

लेकिन क्या आप किसी देश पर हवाई हमले करें और साथ ही यह दावा भी करें कि आप वहां लोकतंत्र ला रहे हैं? यही बड़ी ताकतों का अभिभावक जैसा रवैया और साम्राज्यवाद है.

अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर सैन्य हमले, जिनका साफ उद्देश्य तेहरान की सैन्य ताकत को कमज़ोर करना और आखिर में सरकार बदलना है, सिर्फ पश्चिम एशिया की उथल-पुथल का एक और अध्याय नहीं हैं. ये द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से एक खतरनाक पीछे हटना है, जिसका मकसद आक्रामक युद्ध को रोकना और सभी देशों की संप्रभुता की रक्षा करना था. यह व्यवस्था 1945 में संयुक्त राष्ट्र के आधार पर बनाई गई थी, ताकि एक और विश्व युद्ध रोका जा सके.

ट्रंप के ईरान अभियान, जिसे “Operation Epic Fury” नाम दिया गया है, में पहले ही ईरान के सर्वोच्च नेता अली हुसैनी खामेनेई, जो मौजूदा राष्ट्र प्रमुख थे, की लक्षित हत्या की जा चुकी है और पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद भी मारे जा चुके हैं. इस अभियान जिससे क्षेत्र में ईरान की व्यापक जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई, को आंशिक रूप से इस बयान से सही ठहराया गया कि ईरानी लोग “अपनी सरकार अपने हाथ में लें.”

ट्रंप का बयान विदेश नीति की सबसे पुरानी और खतरनाक सोच को सामने लाता है: यह विश्वास कि ताकत के बल पर समाजों को दूर बैठे पश्चिमी देशों की पसंद के मुताबिक बदला जा सकता है, या ‘हवा से रेजीम बदला जा सकता है.’ तानाशाही असहनीय होती है, यह सही है. लेकिन विदेशी ताकतों द्वारा छेड़ा गया युद्ध उसका भरोसेमंद इलाज नहीं है.

अमेरिका-इज़राइल के हमले गैरकानूनी

यह सिद्धांत—बाहरी सैन्य कार्रवाई के जरिए “रेजीम चेंज”—सिर्फ अनैतिक ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गैरकानूनी भी है. साफ शब्दों में कहें तो यह एक घिनौना सिद्धांत है. संयुक्त राष्ट्र चार्टर, जो दो विश्व युद्धों की भयावहता के बाद बना, ताकत के इस्तेमाल को केवल आत्मरक्षा या सुरक्षा परिषद की अनुमति तक सीमित करता है. यह किसी ताकतवर देश, जैसे अमेरिका, को यह अधिकार नहीं देता कि वह सिर्फ इसलिए किसी दूसरे देश की राजनीतिक व्यवस्था पर युद्ध घोषित कर दे क्योंकि उसे वह व्यवस्था नापसंद है.

फिर भी, ताकतवर देशों ने बार-बार नैतिक कारणों का हवाला देकर सैन्य हस्तक्षेप को सही ठहराया है और उसके नतीजे लगभग हमेशा विनाशकारी रहे हैं.

2003 में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इराक पर इस बहाने से हमला किया कि वहां बड़े पैमाने पर विनाश के हथियार हैं, जो कभी मिले ही नहीं. सद्दाम हुसैन की सरकार जल्दी गिर गई, लेकिन उसके बाद लंबा अराजक दौर शुरू हुआ. सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी, शासन कमज़ोर हुआ, देश बिखर गया, और लाखों आम नागरिक मारे गए.

2011 में, लीबिया में गृहयुद्ध के दौरान उत्तरी अटलांटिक हवाई ताकत ने संयुक्त राष्ट्र के मानवीय आदेश के तहत उसके सैन्य शासक मुअम्मर गद्दाफी को हटाने में मदद की, लेकिन राजनीतिक बदलाव या सुरक्षा की ठोस योजना के बिना, लीबिया टूट गया. अलग-अलग मिलिशिया ने ताकत संभाल ली. गृहयुद्ध छिड़ गए. गुलामों के बाज़ार तक दिखने लगे. सरकार हटाने से स्थिरता नहीं आई. इससे बिखराव, शरणार्थी संकट और अस्थिरता पैदा हुई, जो उस देश से बाहर तक फैल गई जिसका “रेजीम” बदला गया था.

और अब, फिर से पश्चिम एशिया में वही तर्क दोहराया जा रहा है. यह सोच कि किसी सरकार को अवैध घोषित कर देना ही सैन्य कार्रवाई के लिए काफी है. यह कानून नहीं है; यह मानवीय भाषा में लिपटा साम्राज्यवाद है.

यह विनाशकारी पैटर्न सिर्फ कल्पना नहीं है. खुद अमेरिकी अधिकारी टीवी बहसों में देश के भीतर की शंका को स्वीकार कर रहे हैं और यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अमेरिका-इज़राइल के हमले तेहरान में सरकार गिरा पाएंगे. ईरान एक प्राचीन, जटिल और विकसित राष्ट्र है और उसकी संस्थाएं मजबूत और टिकाऊ हैं. केवल नेताओं को हटाने से राज्य की ताकत खत्म नहीं होती—अक्सर ऐसी दखलअंदाजी और भी कठोर और हिंसक ताकतों को मजबूत कर देती है.

भारत के लिए चिंताजनक नतीजे

अगर “रेजीम चेंज” यानी सरकार बदलने की यह सोच सामान्य बना दी जाती है, तो यह उस आधार को कमज़ोर कर देगी जो सभी देशों को बाहरी दबाव से बचाता है. एक बार “रेजीम चेंज” को सही मान लिया गया, तो इसे लेकर खुली छूट वाली सोच फैलने लगेगी. प्रभाव को लेकर ईर्ष्या रखने वाली और पश्चिम पर शक करने वाली दूसरी ताकतें भी इसी तर्क का इस्तेमाल दूसरी जगहों पर करेंगी. एक दखल के जवाब में दूसरी दखल होगी. दुनिया में अव्यवस्था ही नया सामान्य बन जाएगी.

और भारत के लिए “रेजीम चेंज” के बहुत ही चिंताजनक नतीजे हो सकते हैं. अगर ताकत ही सब कुछ है, तो क्या विस्तारवादी सैन्य महाशक्ति चीन भारत की ज़मीन पर और दावे करने को सही ठहरा सकता है? क्या चीन के समर्थन वाला पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत आजमाने के लिए भारत के उन हिस्सों पर दावा कर सकता है जिन्हें वह अपना मानता है?

भारत एक बड़ा लेकिन संवेदनशील पोस्ट-कोलोनियल लोकतंत्र है, जो मुश्किल पड़ोस में आगे बढ़ रहा है. हमारी संप्रभुता लंबे और कठिन आजादी के संघर्ष के बाद हासिल हुई है. हमारी सीमाएं ऐसे पड़ोसियों से घिरी हैं जो पूरी तरह दोस्ताना नहीं हैं. “विवादित क्षेत्रों” और बाहरी दखल की कहानियां बार-बार अलग-अलग लोग दबाव और हस्तक्षेप को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल करते हैं. अगर ताकतवर देशों को नापसंद सरकारों को गिराने की खुली छूट मिल जाती है, तो भारतीय संप्रभुता की रक्षा करने वाला नियम कमजोर हो जाएगा. जो पहले मना था, वह अब मनमर्जी बन जाएगा.

भारत की विदेश नीति—जवाहरलाल नेहरू की गरिमापूर्ण गुटनिरपेक्षता से लेकर बाद की सरकारों की रणनीतिक स्वायत्तता तक—हमेशा संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को मुख्य सिद्धांत मानती रही है.

भारत का एकमात्र बड़ा हस्तक्षेप, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में और बांग्लादेश के निर्माण के दौरान हुआ था. उस समय बड़ी शरणार्थी समस्या और भारत की सीधी सुरक्षा चुनौती थी, न कि सिर्फ राजनीतिक बदलाव थोपने के लिए कदम उठाया गया था.

लेकिन दुर्भाग्य से, नरेंद्र मोदी सरकार भारत की लंबे समय से चली आ रही साहसी विदेश नीति के सिद्धांतों से पीछे हट रही है और इस “रेजीम चेंज” सिद्धांत की निंदा न करके नैतिक कमजोरी दिखा रही है, जो देशों की संप्रभुता का उल्लंघन करता है. नेहरू के बाद हर भारतीय सरकार संयुक्त राष्ट्र के नियमों पर मजबूती से खड़ी रही है.

केवल मोदी सरकार ने, प्रधानमंत्री मोदी की हाल की गलत समय पर की गई इज़राइल यात्रा के साथ, और ट्रंप द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के युद्धविराम का श्रेय लेने या अमेरिका द्वारा भारत पर थोपे गए व्यापार समझौते को चुनौती न देकर, भारत की गर्वित और स्वतंत्र विदेश नीति की विरासत को छोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई है और खुद को खुले तौर पर अमेरिका का समर्थक बना लिया है.

ईरान जैसी तानाशाही सरकारें सच में सार्वभौमिक निंदा की हकदार हैं. ईरान की जनता दशकों से बहुत कष्ट झेल रही है. तानाशाही असहमति को दबाती है, विरोधियों को जेल में डालती है और नागरिकों से उनके मानवाधिकार छीन लेती है. ऐसी सरकारों को अंतरराष्ट्रीय अलगाव, जांच, प्रतिबंध, कूटनीतिक दबाव और मानवाधिकार की पैरवी का सामना करना चाहिए. लेकिन युद्ध कोई भरोसेमंद इलाज नहीं है. युद्ध संस्थाएं नहीं बनाता; वह उन्हें तोड़ देता है.

दुनिया भर में कई लोग मोदी सरकार को एक ऐसी सरकार के रूप में देखते हैं जो नागरिक अधिकारों को दबाती है. क्या इसका मतलब यह है कि भारत की संप्रभु सरकार को बाहर से ताकत लगाकर अस्थिर किया जाना चाहिए? नहीं, बिल्कुल नहीं. “रेजीम चेंज” के भीतर एक बहुत परेशान करने वाला सवाल छिपा है: कौन तय करेगा कि कौन-सी सरकार रहे और कौन-सी जाए? कौन फैसला करेगा? कौन तय करेगा कि कौन-सी सरकार टिके और किसे हटाया जाए? क्या हिंसक दखल आगे और ज्यादा हिंसक दखल को जन्म नहीं देती, जहां ताकत ही सब कुछ बन जाती है?

भारत को समझदारी से चुनना होगा

ईरान के अंदर उसकी अपनी राजनीतिक व्यवस्था को लेकर चल रही बहस को देखिए. 2025 और 2026 की शुरुआत में हज़ारों लोगों ने दमन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया; प्रदर्शनकारियों की मौत दुखद और निंदनीय थी. लेकिन घरेलू असहमति का समर्थन करने का सही तरीका बाहरी सैन्य कार्रवाई नहीं है. जब बाहरी ताकतें ईरानियों से कहती हैं कि वे अपनी ही संस्थाओं को गिरा दें, तो वे इस सोच को बढ़ावा देती हैं कि हिंसक उथल-पुथल तय है और ऐसा करके वे कूटनीति और कानूनी सीमाओं के लंबे और कठिन काम से पीछे हट जाती हैं.

नैतिक विरोधाभास और गहरा है: जिन हस्तक्षेपों का दावा होता है कि वे लोगों की रक्षा के लिए हैं, वे अक्सर और ज्यादा जानें ले लेते हैं. बम भेदभाव नहीं करते. सटीक हमले भी खंडहर छोड़ जाते हैं. घर नष्ट हो जाते हैं. स्कूल ढहा दिए जाते हैं, और बच्चे मारे जाते हैं. ईरान के मिनाब में, अमेरिका के सैन्य अभियान में 100 से ज्यादा स्कूली लड़कियों की मौत हो गई, जिसे जाहिर तौर पर महिलाओं की आजादी की रक्षा के लिए बनाया गया था. “रेजीम चेंज” की कोशिश में, इंसानी कीमत किसी भी नीति लक्ष्य से कहीं ज्यादा भारी पड़ती है.

कुछ सरकारों ने इस खतरे को पहले ही पहचान लिया है. कुछ यूरोपीय नेताओं ने इन हमलों से दूरी बना ली है, और बढ़ते तनाव और संघर्ष के बाद की साफ योजना न होने पर चिंता जताई है. रूस ने अमेरिका-इज़राइल की कार्रवाई को एक संप्रभु देश पर हमला बताया है, लेकिन विस्तारवादी मॉस्को खुद भी यूक्रेन पर कब्जा करने के अपने लगातार अभियान में “रेजीम चेंज” के सिद्धांत का इस्तेमाल करता है.

बाहरी हमले से शुरू हुआ युद्ध एक बात साफ कर देना चाहिए: लोकतंत्र बाहर से थोपा नहीं जा सकता, लोकतंत्र को 30,000 फीट की ऊंचाई से गिराया नहीं जा सकता. इसे बम और मिसाइलों से तैयार नहीं किया जा सकता. मजबूत राजनीतिक व्यवस्था अंदरूनी वैधता से पैदा होती है, बाहरी साम्राज्यवादी आदेशों से नहीं. गांधी का अहिंसा का रास्ता कमजोरी नहीं है; यह रणनीतिक संयम है और लंबे समय की स्थायी वैधता का मार्ग है.

भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उसे कानून और संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए—उसे छोड़ना नहीं चाहिए. हमें इस सोच को ठुकराना चाहिए कि ताकतवर देश तय करेंगे कि किसे किस पर शासन करना चाहिए. हमें कूटनीति, कानूनी संयम और बहुपक्षीय व्यवस्था पर जोर देना चाहिए. ताकत के बल पर रेजीम चेंज आजादी नहीं है. यह अराजकता की खुली छूट है. भारत को “रेजीम चेंज” के सिद्धांत को साफ और सार्वजनिक रूप से ठुकराना चाहिए. एक “विश्वगुरु” चुप नहीं रह सकता.

लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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