Monday, 27 June, 2022
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LAC की बंजर भूमि की जगह भारत को असली खतरे ‘चीन’ से निपटना होगा

अक्साई चीन पर कब्जे का सपना देखने की जगह भारत को एक स्पष्ट सोच अपनाने की जरूरत है कि वो कौन सी सीमाएं हैं जिनके लिए लड़ा जाना चाहिए और उन्हें बचाने के लिए किस चीज़ की जरूरत है.

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‘हमारे पास पांच किलोमीटर जमीन ज्यादा है या पांच किलोमीटर कम है- ये अहम नहीं है,’ ये शब्द निकिता ख्रुश्चेव ने 1959 में माओ से-तुंग से कहे थे, जब उनकी ऊंची आवाज़ गार्डन ऑफ एबंडेंट बेनिफिसेंस में फैल गई थी और उनके बीच असहमति बढ़ गई थी. मुद्दा था भारत. ख्रुश्चेव ने कहा कि अपनी सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए सोवियत संघ ने उसके एवज में अपनी कुछ जमीन, पर्शिया और टर्की के लिए छोड़ दी थी. भारत के खिलाफ माओ का बल प्रयोग, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अमेरिका की अगुवाई वाले शीत-युद्ध खेमे की ओर धकेल रहा था.

उस तर्क के तीन हफ्ते से भी कम समय में एक भारतीय गश्ती टुकड़ी पर जिसका नेतृत्व डिप्टी-सेंट्रल इंटेलिजेंस ऑफिसर करम सिंह कर रहे थे, उस समय घात लगाकर हमला कर दिया गया, जब वो कुग्रांग त्सांगपो नदी के मुहाने पर दाखिल हो रही थी, जो उस जगह के करीब है जहां से अब वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) होकर गुजरती है. दस पुलिसकर्मी मार डाले गए और सात को बंदी बना लिया गया.

पिछले हफ्ते, विदेश मंत्री वांग यी भारत आए, जो 2020 के जानलेवा गलवान संघर्ष के बाद किसी वरिष्ठ चीनी अधिकारी का पहला दौरा था. उनके पास न तो पेट्रोल प्वॉइंट 15 पर अभी भी उबल रहे सैन्य तनाव को खत्म करने का कोई प्रस्ताव था, जो 1959 में हुई हत्याओं की जगह के करीब है और न ही देपसांग मैदानों या डेमचोक के लिए कुछ था. उसकी बजाय विदेश मंत्री ने कहा कि भारत को सीमा विवाद को उसकी ‘उपयुक्त जगह’ पर रखकर दूसरे मुद्दों पर बात करनी चाहिए.

हालांकि कई महीनों तक भारत ने यही करने की कोशिश की है. नई दिल्ली के बयान लजाते हुए ‘घर्षण बिंदु’ की बात करते हैं, उस क्षेत्र की नहीं जो चीन ने कब्ज़ा लिया है. भारत पैंगॉन्ग लेक तथा गोगरा में विषम रूप से पीछे हटने पर सहमत हो गया. चीन के साथ व्यापार तेज़ी से बढ़ गया है और नई दिल्ली ने यूक्रेन पर चतुर्भुज सुरक्षा संवाद में अपने सहयोगियों से अलग रुख इख्तियार किया है. इसके बावजूद, वांग के दौरे से जाहिर होता है कि चीन, एलएसी पर अपना कड़ा रुख छोड़ने के लिए तैयार नहीं है.

इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को उस सलाह को मान लेना चाहिए, जिसे माओ ने ठुकरा दिया था. एलएसी पर रणनीतिक रूप से बेमानी कुछ किलोमीटर के इलाके पर अड़े रहने की बजाय, उसे चीन के साथ वास्तव में रक्षा योग्य सीमा को परिभाषित करना चाहिए और उसे बनाए रखने के लिए संसाधन जुटाने चाहिए.

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बातचीत से लड़ाई तक

‘कोई ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ नारे नहीं,’ अप्रैल 1960 में अपनी डायरी में उस समय ये लिखा था कि युवा भारतीय राजनयिक के नटवर सिंह ने, जो बाद में विदेश मंत्री बने, जब चीनी प्रधानमंत्री ज्होऊ एनलाई नई दिल्ली दौरे पर आए थे. ‘उनका स्वागत ठंडा नहीं, तो बुझा हुआ जरूर था’. 1959 के टकराव के महीनों बाद तक नेहरू चीन की उच्च-स्तरीय वार्ता की मांग को ठुकराते रहे. फिर उन्होंने एक जोखिम उठाने का फैसला किया. प्रधानमंत्री ने ख्रुश्चेव के लिखा था, ‘हालांकि बातचीत के लिए फिलहाल कोई आधार नहीं है लेकिन एक निजी मुलाकात आमतौर से फायदेमंद रहेगी’.

वांग यी के दौरे और इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुईं कई शिखर बैठकों से ज़ाहिर होता है कि दरअसल ऐसा नहीं है. 1959 के संघर्ष और 1962 के युद्ध के बीच की अवधि में किए गए राजनयिक प्रयासों की नाकामी से कुछ अहम सबक हासिल किए जा सकते हैं.

1959 के टकराव के बाद चीनी नेताओं ने संकेत दिया था कि वो भारत की चिंताओं को समझ रहे थे. 1960 में विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह के साथ एक बैठक में चीनी विदेश मंत्री चेन यी ने स्वीकार किया कि 1959 में घात लगाकर किए गए हमले ने, ‘भारतीयों को बेचैन कर दिया था और उन्हें अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया था’.

दोनों पक्षों ने टकरावों को रोकने के प्रबंध करने का प्रस्ताव दिया, जिसमें इलाके के एक बड़े हिस्से का असैनिकीकरण करना शामिल था लेकिन कोई भी दूसरे की शर्तें मानने के लिए तैयार नहीं था.

इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने दर्ज किया है कि 1960 की नेहरू-ज्होऊ एनलाई शिखर बैठक की तैयारियों के दौरान, दोनों पक्ष नाटकीय रियायतें देने पर विचार कर रहे थे. अप्रैल के आरंभ में उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ब्रिटिश उच्चायुक्त मैलकम मैकडॉनल्ड से कहा कि उत्तरपूर्व में भारत के सीमाओं के दावे अडिग थे. हालांकि उनकी मान्यता के एवज में नई दिल्ली इसके लिए तैयार थी कि चीन ‘उस इलाके पर व्यावहारिक कब्जा बनाए रख सकता है, जिसे अब उन्हें कब्जा लिया है’.

अपनी ओर से ज्होऊ ने एक अदला-बदली का सुझाव दिया. नेहरू के साथ बातचीत में चीनी विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों देश ब्रिटिश साम्राज्य की मैकमोहन रेखा के दोनों ओर खड़े हैं, जिसे भारत पूर्व में अपनी सीमा होने का दावा करता है. लद्दाख में चीन उस लाइन पर खड़ा था, जो कराकोरम से कोंगका ला पास तक जाती है, जो 1959 के संघर्ष की जगह थी. उसका कहने का तात्पर्य था कि दोनों पक्ष अदला-बदली कर सकते थे.

1959 के टकराव के बाद जनता के गुस्से और चीन के इरादों पर अविश्वास के मद्देनज़र, नेहरू ने उस सौदे को ठुकरा दिया. बर्टिल लिटनर जैसे विद्वानों ने दिखाया है कि अपनी ओर से माओ चीन के क्षेत्रीय आधिपत्य के सामने आने वाली, किसी भी चुनौती को मिटा देने के लिए दृढ़ संकल्पी था.


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आगे की नाकाम नीति

गतिरोध को देखते हुए भारत ने लद्दाख में अपनी मौजूदगी जताने के लिए छोटी-छोटी चौकियां स्थापित करनी शुरू कर दी. 1961 में इंटेलिजेंस ब्यूरो ने प्रसन्नतापूर्वक दर्ज किया, ‘चीनी लोग 1960 के अपने उस दावे तक आने की कोशिश करेंगे, जहां हमारा खुद का कब्जा नहीं था. लेकिन जहां हमारे एक दर्जन लोग भी मौजूद हैं, चीनी सैनिक वहां से दूर रहे हैं’. सेना भी उससे सहमत थी. चीफ ऑफ जनरल स्टाफ ने युद्ध से पहले रक्षा मंत्रालय को बताया, ‘चीनी हमारी किसी भी पोज़ीशन पर हमला नहीं करेंगे, भले ही वो उनके मुकाबले में कमज़ोर हों’.

1962 की गर्मियों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को गलवान घाटी की गश्त लगाते हुए पता चला कि भारतीय सेना उनसे पहले वहां पहुंच चुकी थी. 8 गोरखा रेजिमेंट की पहली बटालियन के करीब 30 सैनिक वहां पहले से मौजूद थे. इधर एक राजनयिक विरोध नोट नई दिल्ली पहुंचा, उधर 350 पीएलए सैनिकों ने 10 जून 1962 को चौकी को घेर लिया.

फिर, 20 अक्टूबर की सुबह पीएलए सैनिकों ने पूरे लद्दाख सेक्टर पर हमला कर दिया. तोपखाने और मोर्टार की भारी बमबारी के सामने, जिसने मिनटों के अंदर उनके जर्जर आसरों को मिट्टी में मिला दिया, गलवान के सैनिक आखिरी गोली तक लड़ते रहे और 36 जवान वीरगति को प्राप्त हुए. दूसरी चौकियों के वीरतापूर्ण प्रतिरोध के बावजूद भारतीय सेना को कुचल दिया गया.

गोलाबारी के सामने भारत की आगे की नीति हिचकोले खाने लगी. रक्षा मंत्रालय के अभी तक गोपनीय 1962 युद्ध के आधिकारिक इतिहास में दर्ज है, ‘एक-एक इंच बचाने की कोशिश में भारत ने उतना सब गंवा दिया, जिसकी जरूरत नहीं थी’.


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आगे के खतरे

हालांकि भारत ने एलएसी पर जो रियायतें दी हैं, उन्होंने आक्रामक रुख रखने वालों को नाराज किया है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया में एक रणनीतिक समझ नज़र आती है. एलएसी पर पैदा हुए संकट में बेतहाशा संसाधन लग गए हैं, इतने सारे सैनिक और साज़ो-सामान कि जिसका कोई स्पष्ट अंत नज़र नहीं आता. पहले पाकिस्तान सीमा पर तैनात बलों को हल्का करना पड़ा है, जिनमें दो इनफेंट्री डिवीज़ंस भी हैं, जो पहले 1 स्ट्राइक कोर को समर्पित थीं.

भारत के सैनिकों की बढ़ती संख्या से ये समस्या हल नहीं होगी. लॉजिस्टिक्स एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि चीन की तेज़ रफ्तार रेल और सड़कों की मदद से पीएलए एक हफ्ते के भीतर अपने सात डिवीज़न्स के बराबर फॉरमेशंस को तिब्बत पहुंचा सकती है और एक महीने में 32 डिवीज़ंस भेज सकती है.

समुद्रों में भी भारत का रुख कुछ ज्यादा राहत पहुंचाने वाला नहीं है. वित्तीय समस्याओं के चलते नौसेना को मजबूरन, अपने बेड़े को बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजनाओं को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा है. पश्चिमी सहयोगियों से सहायता मिलने की उम्मीदें भी अभी तक फलीभूत नहीं हुई हैं. पेंटागन के ग्लोबल पॉश्चर रिव्यू ने पिछले साल फैसला किया कि इस क्षेत्र में और अधिक संसाधन नहीं लगाए जाएंगे. अमेरिकी नौसेना को विस्तारित करने की 1 ट्रिलियन डॉलर की एक योजना भी ठंडे बस्ते में है.

खतरा ये है कि लद्दाख- जहां ऊंचे पहाड़ों के सामने, भारत पीएलए के मुकाबले, जो एक पठार पर है, कठोर भौगोलिक नुकसान में है- एक ऐसे अंधे कुएं में बदल सकता है, जो हमारे पहले ही आवश्यकता से अधिक खिंचे हुए संसाधनों को निगलता रहेगा.

अक्साई चीन पर कब्जे का सपना देखने की जगह भारत को एक स्पष्ट सोच अपनाने की जरूरत है कि वो कौन सी सीमाएं हैं जिनके लिए लड़ा जाना चाहिए और उन्हें बचाने के लिए किस चीज की जरूरत है. 1962 की तरह फिर से एक वास्तविक खतरा है कि भारत एलएसी पर खुद को फंसा सकता है. हालांकि यूक्रेन में चल रही लड़ाई से हमने सीखा है कि लड़ाइयां बड़ी नहीं बल्कि स्मार्ट सेनाएं जीतती हैं. भारत में जरूरत है कि युद्ध लड़ने के क्रियात्मक तरीकों पर विचार किया जाए, वो कौन सी टेक्नोलॉजीज़ हैं जिनसे ऐसा हो सकता है और कैसी अर्थव्यवस्था हो जो इन दोनों को आगे बढ़ा सके.

लॉरेंस फ्रीडमैन रणनीति पर अपने प्रामाणिक कार्य में इसे इस प्रकार परिभाषित करते हैं: ‘उद्देश्यों की पहचान करना, और ऐसे उद्देश्यों को हासिल करने के लिए संसाधनों और तरीकों की तलाश करना’. भारत की असली रणनीतिक समस्या वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ लगी बंजर भूमि नहीं है, बल्कि एक बढ़ती हुई महाशक्ति है, जिसके पास अपेक्षाकृत कहीं अधिक आर्थिक और सैन्य संसाधन हैं.’

(प्रवीण स्वामी दिप्रिंट के नेशनल सिक्योरिटी एडिटर हैं. उनका ट्विटर हैंडल है @praveenswami. यहां व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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