पिछले कुछ सालों में भारत की व्यापार नीति ज्यादा बाहरी देशों की ओर हो गई है.
यूनाइटेड किंगडम के साथ व्यापार समझौता 2025 में पूरा हुआ और यूरोपीय फ्री ट्रेड एसोसिएशन के साथ समझौता पहले से लागू है. यूरोपीय यूनियन के साथ लंबे समय से चल रही बातचीत के बाद अब समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं और यह जल्द लागू होगा. इन समझौतों में टैरिफ (आयात शुल्क) कम किया जा रहा है और दूसरी व्यापार बाधाएं भी घटाई जा रही हैं, ताकि भारत का निर्यात बढ़े और भारत के उत्पाद दुनिया के बाज़ार से जुड़ सकें.
इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के साथ आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते में भी टैरिफ काफी कम करने की तैयारी दिखाई गई थी. संदेश साफ है: भारत निर्यात के सहारे विकास करना चाहता है और दुनिया के व्यापार से ज्यादा जुड़ना चाहता है, लेकिन एक मुश्किल सवाल पर कम बात होती है.
जब भारत व्यापार समझौतों के तहत टैरिफ कम करता है, तो क्या इसका फायदा सच में बाज़ार तक पहुंचता है?
अभिषेक आनंद और नवीन जोसेफ थॉमस का विस्कोस स्टेपल फाइबर (वीएसएफ) पर हाल का एक वर्किंग पेपर इस मुद्दे को समझने में मदद करता है. उनकी स्टडी में बताया गया है कि ASEAN-India Trade in Goods Agreement (AITIGA) के तहत टैरिफ कम तो किया गया, लेकिन बाद में दूसरी नीतियों के जरिए उसका असर खत्म कर दिया गया. यानी टैरिफ कम हुआ, लेकिन असली सुरक्षा में कोई खास बदलाव नहीं हुआ.
सुरक्षा का घुमाव
विस्कोस स्टेपल फाइबर आधुनिक कपड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाला एक बहुत महत्वपूर्ण कच्चा माल है. AITIGA के तहत, भारत ने इंडोनेशिया से आयात पर टैरिफ खत्म करने का वादा किया था, लेकिन तय समय पर टैरिफ कम करने के साथ-साथ, 2010 में एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगा दी गई और बाद में इसे बढ़ाया भी गया. 2018 में Most Favoured Nation (MFN) टैरिफ बढ़ा दिया गया. 2021 में इन ड्यूटी को हटाने के बाद, 2023 में क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर लागू कर दिया गया. यानी तरीके बदलते रहे—टैरिफ, व्यापार से जुड़े उपाय और नियम, लेकिन नतीजा वही रहा: विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा जारी रही.
इस दौरान, घरेलू बाज़ार पर ज्यादातर एक ही उत्पादक का नियंत्रण था, जिसका जांच के समय 94 प्रतिशत खपत पर कब्ज़ा था. घरेलू कीमतों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों से तुलना करके, स्टडी ने अनुमान लगाया कि इस सुरक्षा की वजह से 2010 से 2024 के बीच 2.5 अरब डॉलर से 3.1 अरब डॉलर का अतिरिक्त फायदा हुआ. एकाधिकार में सुरक्षा से प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ती, बल्कि कीमत तय करने की ताकत और मजबूत होती है. इसका नीचे के सेक्टर पर बड़ा असर पड़ा. एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने के बाद, दुनिया में विस्कोस यार्न के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी तेजी से गिर गई और एक दशक से ज्यादा समय तक कम ही रही.
समय भी बहुत कुछ दिखाता है. यह गिरावट उसी समय हुई जब कच्चे माल को सुरक्षा दी जा रही थी. ऊपर के स्तर पर दी गई यह सुरक्षा, श्रम-आधारित निर्यातकों पर एक छिपे हुए टैक्स की तरह काम कर रही थी.
ASEAN में फंसा हुआ ढांचा
हालांकि, फाइबर की कहानी सिर्फ बड़े मुद्दे का एक छोटा हिस्सा है.
भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापार पर किसी दूसरी रिसर्च में, मैंने देखा कि भारत किस तरह के सामान इंडोनेशिया को बेचता है.
इसके नतीजे काफी चौंकाने वाले थे.
इंडोनेशिया की जीडीपी का भारत के निर्यात पर बड़ा असर पड़ता है. इसका मतलब है कि जब इंडोनेशिया की मांग बढ़ती है, तो भारत का निर्यात भी बढ़ता है, लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत ज्यादातर साधारण और कम तकनीक वाले प्रोडक्ट ही निर्यात करता है. भारत के निर्यात का औसत स्तर भी नकारात्मक (लगभग -0.12) पाया गया.
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि भारत ज्यादा मात्रा में आसान और कम वैल्यू वाले प्रोडक्ट का निर्यात करता है और कम मात्रा में उन्नत और ज्यादा वैल्यू वाले प्रोडक्ट. भारत के निर्यात में पेट्रोलियम उत्पाद, साधारण केमिकल और आयरन ज्यादा हैं, जबकि दवाइयां और एडवांस मशीनरी जैसे उत्पाद बहुत कम हैं.
इसका मतलब है कि टैरिफ कम होने के बाद भी, व्यापार अपने-आप बेहतर और उन्नत नहीं बनता.
अगर इसे फाइबर सेक्टर से जोड़कर देखें, तो जब भारत मानव-निर्मित फाइबर बनाने वाली कंपनियों को सुरक्षा देता है और उनकी कीमतें दुनिया से ज्यादा बनी रहती हैं, तो इससे उन कंपनियों को नुकसान होता है जो इनसे सामान बनाकर निर्यात करती हैं. उनकी लागत बढ़ जाती है और वे दुनिया में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पातीं. इससे भारत ASEAN देशों में ज्यादातर सस्ते और कम वैल्यू वाले उत्पाद ही बेचता रहता है.
इससे एक चक्र बन जाता है: ऊपर की कंपनियों को सुरक्षा मिलती है, नीचे की कंपनियां कमज़ोर हो जाती हैं और भारत कम वैल्यू वाले प्रोडक्ट ही निर्यात करता रहता है.
यह समस्या सिर्फ एक फाइबर तक सीमित नहीं है. पॉलिएस्टर फाइबर में भी यही हुआ है. वहां भी एंटी-डंपिंग ड्यूटी और टैरिफ से ऊपर की कंपनियों को बचाया गया, लेकिन नीचे की कंपनियों को नुकसान हुआ. यानी ऊपर सुरक्षा, नीचे परेशानी.
अब वक्त आ गया है कि हम समझें कि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट सिर्फ टैरिफ कम करने के लिए नहीं होते, बल्कि उनका मकसद व्यापार और उद्योग को मजबूत बनाना भी होता है. अगर टैरिफ कम करने के बाद भी दूसरे नियम और नीतियां लागत बढ़ाती रहें, तो ऐसे समझौते सिर्फ कागज पर ही रह जाएंगे, असली फायदा नहीं होगा.
भारत का लक्ष्य साफ है: दुनिया के साथ ज्यादा व्यापार करना, ज्यादा फैक्ट्री बनाना और ASEAN देशों के साथ संबंध मजबूत करना, लेकिन यह मुश्किल है, अगर कुछ कंपनियों को बचाया जाए और बाकी निर्यातकों से उम्मीद की जाए कि वे दुनिया से मुकाबला करें.
टैरिफ कम करना आसान है, लेकिन असली प्रतिस्पर्धा के लिए सही नीतियां ज़रूरी हैं. भारत के नए व्यापार समझौते सफल तभी माने जाएंगे, जब भारत पेट्रोलियम और साधारण केमिकल के बजाय दवाइयां, मशीनरी और उन्नत उत्पाद ज्यादा निर्यात करेगा.
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक उदारीकरण सिर्फ कागज़ पर दिखेगा, असल में नहीं.
बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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