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Friday, 19 July, 2024
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बॉर्डर पर चीन के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा हथियार है- ह्यूमन फोर्स

भारतीय सेना को एक-एक करके इस बात पर ध्यान देना होगा कि चीन की सेना क्या कर सकती है और उसी के हिसाब से अपनी ऑपरेशनल तैयारियां करनी होंगी

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हिमालय में सैन्य टुकड़ी को सिर्फ दिखावे के लिए तैनात कर देना – जो कि चीन करने की कोशिश कर सकता है – मायने नहीं रखता, इसके बजाय, सैनिकों को लॉजिस्टिक रूप से वहां पर बनाए रखने की क्षमता मायने रखती है, पर उस क्षमता पर छोटे सैन्य टुकड़ियों द्वारा भी दबाव बनाया जा सकता है.

सेना प्रमुख जनरल मनोज पाण्डेय ने 15 जनवरी को सेना दिवस से पहले दिल्ली में मीडिया को संबोधित किया. उन्होंने बताया कि उत्तरी सीमा पर स्थितियां, स्थिर और नियंत्रण में हैं, लेकिन कभी भी कुछ भी हो सकता है.

जनरल पाण्डेय ने घोषणा की कि भले ही चीन ने पूर्वी सीमा पर अपने सैनिकों को बढ़ाया है लेकिन सेना पूरी तरह से तैयार है और किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है. यह एक आश्वासन है जिसका संभवत: समय रहते परीक्षण हो जाएगा.

सेना के लिए ऑपरेशनल तैयारी इस बात पर निर्भर करती है कि सैनिकों के पास कितने उपकरण, कैसा इन्फ्रास्ट्रक्चर और कैसी तकनीक है.

नौसेना और वायु सेना की समुद्र या वायु क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए तकनीक पर निर्भरता अधिक है, पर इसके विपरीत वॉरफेयर लैंड की प्रकृति के कारण आर्मी की उच्च-तकनीक पर निर्भरता अपेक्षाकृत कम है.

लेकिन फाइटिंग स्पिरिट सबसे बड़ा हथियार है, और युद्ध को लेकर इतनी तकनीकी प्रगति के बावजूद, ह्यूमन फोर्स सबसे महत्त्वपूर्ण है – खासकर उत्तरी सीमा पर जो स्थिति बनी हुई है उसे देखते हुए.

उत्तरी सीमाओं पर हिमालय में सैन्य टकराव हो रहा है, जहां कड़ाके की ठंड और ऑक्सीजन की कमी की वजह से वहां किसी भी तरह की एक्टिविटी कर पाना अपने आप में एक चुनौती है, हालांकि गर्म कपड़ों और शेल्टर्स पहले से बेहतर हो जाने की वजह से ये मुश्किलें थोड़ी कम हुई हैं.

लेकिन जो चीज़ नियंत्रण में नहीं है और न ही कभी होगी वह है- बर्फीले तूफान, हिमस्खलन और बर्फीली हवाओं का चलना. रणनीतिक दृष्टि से, ऑपरेशनल और लॉजिस्टिक तौर पर, हिमालय में एक बड़ी सेना को तैनात करके रख पाना सपने जैसा है.

इसलिए भारतीय सेना को एक-एक करके इस बात पर ध्यान देना होगा कि चीन की सेना क्या कर सकती है और उसी के हिसाब से अपनी ऑपरेशनल तैयारियां करनी होंगी, यानी की ‘सलामी स्लाइसिंग’ करनी होगी.

‘सलामी स्लाइसिंग’ एक ऐसा शब्द है जिसे विवादित क्षेत्र के कुछ भागों या ‘स्लाइस’ पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया को बताने के लिए किया जाता है और कई दशकों से इसका प्रयोग किया जा रहा है.

चीन के ऑपरेशनल डिजाइन से स्पष्ट है कि सेना के लिए सबसे बेहतर तैयारी यही है कि जैसे-को-तैसा जवाब देने की तैयारी रखी जाए.

इसके अलावा अन्य तैयारियों में सड़क के बुनियादी ढांचे का निर्माण और लॉजिस्टिक सपोर्ट को सुनिश्चित करते हुए जमीन से फायर पावर और एयर प्लेटफॉर्म्स के ऑपरेशनल सपोर्ट के जरिए सेना को कुछ सीमित तौर पर आक्रामक रवैया अपनाने की भी तैयारी करनी चाहिए.


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सीमित संसाधनों का असीमित उपयोग करें

अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, सीओएएस ने कहा कि सेना के 41 प्रतिशत उपकरण पारंपरिक हैं, और केवल 12-15 प्रतिशत हथियार ही अत्याधुनिक हैं, हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि परिस्थितियां 2030 तक बदल जाएंगी.

इसलिए, यह बात साफ है बेहतर उपकरणों को निकट भविष्य में शामिल किए जाने की उम्मीदें कम हैं. लेकिन, ऐसा नहीं है कि हथियारों का जखीरा किसी काम का नहीं है.

साथ ही, युद्ध क्षेत्र से सटे हुए एरिया में सड़क और सुरंग निर्माण के जरिए कनेक्टिविटी में भी सुधार हुआ है. हालांकि, कार्य अभी भी प्रगति पर है.

हिमालय में भारी निर्माण से पैदा हुए पर्यावरणीय जोखिम की स्थिति हाल ही में उत्तराखंड के जोशीमठ में भूमि के धंसने से उजागर हुई.

इस तरह के खतरे चल रहे बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्रभावित कर सकते हैं. हालांकि, सैन्य रूप से, सीमित संसाधनों का असीमित उपयोग करने की गुंजाइश है. यह कुछ ऐसा है जो केवल कल्पना की शक्ति और अनुभव व तकनीक का प्रयोग करके प्राप्त किया जा सकता है.

भारत को ऊंचाई पर युद्ध लड़ने का अधिक अनुभव है

ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भारत का युद्ध का अनुभव चीन की तुलना में कहीं ज्यादा है. आखिरकार, सियाचिन ग्लेशियर ने लगभग पिछले 30 वर्षों से इस तरह का निरंतर अनुभव दिया है. अगर सभी के अनुभव को मिला कर रणनीति तैयार की जाए तो ऑपरेशनल प्रभावशीलता काफी बढ़ जाती है.

बेशक, उत्तरी सीमा पर काफी बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती है, लेकिन अनुभव से सीखना सैन्य नेतृत्व का रोजमर्रा का काम है. तकनीक और अनुभव का प्रयोग करके युद्ध के नए तरीके ईजाद करना ही मिलिट्री लीडरशिप की पहली चुनौती है.

इनोवेशन से दूर होंगी कमियां

मनोवैज्ञानिक रूप से इससे ज्यादा तोड़ देने वाला कुछ नहीं हो सकता कि जब सेना ज्यादा ऊंचाई पर डटी हुई हो और उसे पता चले उसके मिलने वाले लॉजिस्टिक्स में कमी कर दी गई है.

स्पेशल फोर्सेज और लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश स्काउट्स जैसे स्थानीय स्काउट्स इन हाई-रिस्क मिशनों के लिए विशेष रूप से अनुकूल हैं. संभवतः, ऐसे उपाय पहले से ही किए जा रहे हैं और उन्हें मजबूत भी किया जा रहा है.

हालांकि, यह दिखाता है कि भले ही सेना में उपकरणों, सपोर्टिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीक के मामले में कुछ कमी है पर इनोवेशन के जरिए इन्हें बेहतर बनाया जा सकता है.

इनोवेटिव टैक्टिक्स के लिए लेफ्टिनेंट, कैप्टन और मेजर लेवल के अधिकारियों की एक हाई-क्वालिटी जूनियर लीडरशिप की जरूरत होगी.

इस मामले में कर्नल रैंक के कमांडिंग ऑफिसर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सौभाग्य से, यह भारतीय सेना की पारंपरिक ताकत बनी हुई है, जो ऐतिहासिक रूप से सिद्ध हो चुकी है.

देश के लिए समर्पित और जान देने को तैयार सैनिकों का कुशल नेतृत्व करके इस फायदे को और भी बढ़ाया जा सकता है.

यह हमें बढ़त देता है जो कि युद्ध में काफी महत्त्वपूर्ण है. यदि अच्छे से मैनेज किया जाए, तो अग्निवीरों की भर्ती भी युद्ध क्षमता को बढ़ाने में काफी मददगार साबित हो सकती है क्योंकि इससे सेना में युवा सैनिकों की संख्या बढ़ेगी.

बेशक, हम अपनी पुरानी सफलता से संतुष्ट होकर और इसे अपनी शक्ति मानकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ नहीं सकते. हायर लीडरशिप को अपर्याप्त संसाधनों के जरिए सैना की जरूरतों को पूरा करने के रास्ते तलाशने होंगे.


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ह्यूमन स्ट्रेंथ: सेना का सबसे शक्तिशाली हथियार

शीर्ष अधिकारियों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं, जिसमें से सेना के सामने भौतिक कमियों को पूरा किया जा सकता है. इन समस्याओं को हल किया जा सकता है, अगर यह मान लिया जाए कि ह्यूमन स्ट्रेंथ सेना का सबसे महत्वपूर्ण शक्तिशाली हथियार है.

सेना दिवस इस कहावत को याद करने और युद्ध के बादल गहराने पर अपने संप्रभु राज्य की रक्षा के लिए खुद को फिर से समर्पित करने का एक उपयुक्त अवसर है.

अनिश्चितता, खतरा, और जीवन व शरीर को क्षति पहुंचना; सेना में एक सैनिक की जिंदगी से जुड़ा होता है. यह सेना ही है जो अक्सर इन खतरों के सबसे नजदीक से देखती है.

मैंने बेंगलुरु में सेना दिवस परेड देखी जो कि पहली बार दिल्ली के बाहर आयोजित की गई थी. पुराने दिनों की याद ने एक खुशी और गर्व की अनुभूति कराई जो कि ऑलिव ग्रीन वर्दी पहनने के साथ आता है.

भारतीय सेना, आने वाले भविष्य में, जब भी आवश्यक हो बलिदान की भावना के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करेगी, जो कि इसका गौरवपूर्ण कथन है.

[लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) प्रकाश मेनन (रिटायर) तक्षशिला संस्थान में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक; राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. उनका ट्विटर हैंडल @prakashmenon51 है. व्यक्त विचार निजी हैं]

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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